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17 जून 2020

क्या आत्महत्या पलायन है ?

यह बात न मैं पहली बार सुन रहा न शायद आप सुन रहे होंगे कि
आत्महत्या पलायन है.

पहली बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि यह जीवन हमने मर्ज़ी से नहीं चुना होता, हमें किन्हीं और लोगों ने अपनी ख़ुशी के लिए जन्माया होता है। जो जीवन हमने चुना ही नहीं, वह पसंद न आने पर हम उसे अपनी मर्ज़ी से छोड़ तो सकते ही हैं। अरे, कुछ तो अपनी मर्ज़ी से भी कर जाएं!

दूसरी बात, मुझे बिलकुल भी नहीं लगता कि आत्महत्या करना आसान है. मैं अपने संदर्भ में कहूं तो तक़रीबन तीस साल तक तो, आए दिन मुझे आत्महत्या के ख्याल आते थे लेकिन जैसे ही मैं आत्महत्या के तरीक़ों पर ग़ौर करना शुरु करता, मेरी हवा निकलना शुरु हो जाती. फ़िर मैं बहाने करने लगता कि जिसने सताया है जब तक उसका कुछ न करो तब तक क्यों मरना ? यह बात भी सच थी लेकिन आत्महत्या की सोच आने पर यह बहाने का काम करती.

तीसरी बात, जो लोग यह कहते हैं कि आत्महत्या कायरता है, कभी आपने उनका जीवन ग़ौर से देखा है ? क्या आप समझते हैं कि वे कोई बहुत बहादुरी का जीवन जी रहे हैं ? आत्महत्या कायरता है तो क्या ‘कास्टिंग काउच’ पवित्रता है ? क्या भीड़ के रीति-रिवाज और चाल-चलन अपना लेना बहादुरी है ? क्या झूठ बोल-बोलकर व्यापार जमा लेना बहुत बड़ा साहस है ? क्या, जो बड़ों ने और पड़ोसियों ने बताया उसे करने में बहुत दम लगता है ? जो परंपरा से चला आया वो करने में कोई दिमाग़ चाहिए ? जिसको लोग सफ़लता कहते हैं उसपर हमें संदेह भी हो तो भी भीड़ की और मान्यताओं की वजह से वही करते जाने के लिए कोई हिम्मत चाहिए ? क्या समाज को ऊंच-नीच और जातियों में बांटने के लिए किसी संवेदना की ज़रुरत है ? क्या अंदर से मर जाने और बाहर बस नाम के लिए ज़िंदा रहने के लिए बहुत कलेजा चाहिए ?

पहला पलायन तो यही है.

मैं किसी विशेष आत्महत्या के बारे में बात नहीं कर रहा.

-संजय ग्रोवर
17-06-2020   



3 नव॰ 2019

भीड़ और हम

मज़े की बात है कि जब प्रशंसा में तालियां बजतीं हैं तब आदमी नहीं देखता कि तालियां बजानेवालों की भीड़ कैसे लोंगों के मिलने से बनी है !? उसमें पॉकेटमार हैं कि ब्लैकमेलर हैं कि हत्यारे हैं कि बलात्कारी हैं कि नपुंसक हैं कि बेईमान हैं कि.......

लेकिन जैसे ही इसका उल्टा कुछ होता है तो व्यक्ति को भीड़ में तरह-तरह के दोष दिखाई देने लगते हैं......

शायद मैं उस वक़्त बी.कॉम. कर रहा था, सर्दियों में एक दिन छत पर गया तो देखा कि पीछे मिल में एक आदमी एक कमज़ोर-से आदमी को पेड़ से बांधकर बेल्ट से पीट रहा था। मैंने इतना ही देखा कि भीड़ में अमीर भी थे, ग़रीब भी थे, पढ़े-लिखे भी थे.....सब एक ही तरह से हंस रहे थे......तमाशा देख रहे थे.......

इससे ज़्यादा मुझसे देखा नहीं गया......

और कुछ किया भी नहीं गया.....

पीटनेवाला अमीर आदमी था और पिटनेवाला एक ग़रीब चोर था जो मुझे बाद में पता चला....

किसीने नहीं कहा होगा कि तुम ख़ुद क्यों पीट रहे हो ? चोरी की है तो पुलिस को बुलाओ, क़ानून हाथ में क्यों ले रहे हो.........

ज़्यादातर लोग उस अमीर आदमी के चमचे थे........

.......जैसाकि अभी भी होता है... 

मैंने मॉब-लिंचिंग जैसी जो भी घटनाएं देखी संभवतः एक ही धर्म के लोगों की भीड़ के लोगों द्वारा अपने ही धर्म के किसी कमज़ोर या अकेले पड़ गए या फंस गए या फंसा लिए गए व्यक्ति को पीटे जाने की देखीं.......

जैसी मैं इसलिए कह रहा हूं कि उन में किसीकी जान तो नहीं ली गई लेकिन बेरहमी से मारा गया और अधमरा करके छोड़ दिया गया।



बाद में मुझे पता चला कि यह आदमी किसी अहिंसा की बात करनेवाली विचारधारा से जुड़ा है........हो सकता है कि अब इसी विचारधारा का ठेका कुछ दूसरी तरह के लोगों के पास हो......

आज मुझे हंसी आती है जब लोग विचारधारा के पक्के होने की बात करते हैं.....

भीड़ पर वे तरह-तरह की राय देते हैं पर ख़ुद भीड़ को लुभाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.........

(जारी)
#संजयग्रोवर
03-11-2019


28 अप्रैल 2019

पैरालिसिस और मैं

आज पूरा एक महीना हो गया जब मुझे पैरालिसिस का दूसरा अटैक हुआ था। एक हफ़्ते तक तो मैंने किसी को बताया ही नहीं। मुझे लग रहा था कि मैं ऐसे ही ठीक हो जाऊंगा। एक हफ़्ते बाद मेरी बहिन का फ़ोन आया तो मैंने बताया। डॉक्टर ने कहा कि अब तो कुछ नहीं हो सकता, उसी समय बताते तो ठीक हो जाता। अभी मैं दवा दे रहा हूं जिससे ये और ज़्यादा नहीं होगा, जितना है उतने तक ही रहेगा, बाक़ी भगवान की मज़ी। आपको मालूम है कि भगवान को तो मैं मानता नहीं। तो चारा यह बचा कि या तो घिसटने-मरने के लिए तैयार हो जाओ या अपने ऊपर विश्वास करो। इस दौरान मैं एक हाथ से शायरी वगैरहा लिख-लिख कर फ़ेसबुक, ट्विटर एवं पिंटरेस्ट पर लगाता पर लगाता रहा।
अब मैं 90 प्रतिशत ठीक हो चुका हूं। पहला अटैक तक़रीबन डेढ़-दो साल पहले हुआ था। उसपर भी लिखूंगा।
अभी इतना ही।

15 जन॰ 2019

....तो मैंने कहा था मुझे पैदा करो.....

....तो मैंने कहा था मुझे पैदा करो.....

आखि़र एक दिन तंग आकर मैंने पापाजी से कह ही दिया...

उस वक़्त मुझे भी लगा कि मैंने कोई बहुत ही ख़राब बात कह दी है....

कोई बहुत ही ग़लत बात....

लेकिन यह तो मुझे ही मालूम है कि वो रोज़ाना मुझसे किस तरह की बातें कहते थे, कैसे ताने देते थे, क्या-क्या इल्ज़ाम लगाते थे....

मैं क्या करता....

पूरी ईमानदारी से कहूं तो मैंने जबसे होश संभाला, मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही बात महसूस करता था...
कि इस दुनिया में पैदा होकर मैं एक अजीब-से जंजाल में फंस गया हूं....

.......और इससे बड़ा सच क्या होगा कि मैं अपनी मर्ज़ी से पैदा नहीं हुआ था....

कोई बच्चा अपनी मर्ज़ी से पैदा नहीं होता...

फिर इस तरह की बातें कि अहसान मानो कि मां-बाप ने तुम्हे पैदा किया...

कि इतनी सुंदर दुनिया तुम्हे देखने को मिली...

कि ज़िंदगी तुम्हारे ऊपर मां-बाप का कर्ज़ है....

ये क्या बकवास है ?

पहले बच्चे से पूछ तो लो कि दुनिया उसे कितनी सुंदर लगती है ?

मैं मानता हूं कि मां-बाप को बच्चे का अहसान मानना चाहिए कि उसे तुम उसकी मर्ज़ी के बिना इस दुनिया में लाए फिर भी उसने कोई ऐतराज़ नहीं किया......

तुमने जो भी धर्म, मज़हब, अमीरी, ग़रीबी, घर, मकान, हालात...उसको दिए, उसने स्वीकार कर लिए....
ये तुम्हारा नहीं, बच्चे का कर्ज़ है तुम पर....

आज मैं महसूस करता हूं कि मैंने सौ फ़ीसदी सही बात कही पापाजी से....

वो भले आदमी थे.......मेहनती आदमी थे.....जितना उनके बस का था, ईमानदार भी थे....मुझे दुख हुआ कि मैंने उनसे ऐसा कहा....

पर कभी तो कोई कहेगा......सभी झूठ बोलते रहेंगे तो सच की हालत तो ख़राब ही रहेगी.....

वो बहुत दुखी हुए.....उन्हें काफ़ी ग़ुस्सा आ गया....उन्होंने मुझसे कहा-

‘अच्छा होता जो पैदा होते ही तुझे मार देता......’

लगता है कि उन्हें भी ऐसी बात की उम्मीद नहीं थी, कोई अप्रत्याशित बात सुन ली थी उन्होंने...उन्हें शायद गहरी चोट पहुंची थी......वरना ऐसी प्रतिक्रिया न करते.......

ये दुनियादार लोग, ये सफ़ल लोग, तथाकथित सामाजिक लोग, बिज़ी लोग......लगता है कि ज़िंदगी की कई सच्चाईयां कभी इनके ज़हन में आई ही नहीं.....इन्हें छूकर भी नहीं गुज़री.....

आज भी मैं देखता हूं...टीवी पर, फ़िल्मों में, डिबेट्स् में.....

क्या कहूं कि कैसा लगता है.....

लेकिन मैं हर हाल में सच बोलूंगा.... 

15-01-2019

पिछला

22 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-7

(पिछला भाग)


आजकल जगह-जगह सुनने को मिलता है कि औरतें तो समझदार हो गईं हैं अब तो बस मर्द को बदलना है।
क्या वाक़ई ऐसा है? क्या हम ज़रा-सा सच सुनने या पढ़ने को तैयार हैं ? वे कौन औरतें हैं जो यह सुनकर ख़ुश हो रहीं हैं कि ‘हर औरत का सम्मान करना चाहिए’ या ‘मैं स्त्रियों का बड़ा सम्मान करता हूं......’

झूठी तारीफ़ सुनकर ख़ुश हो जाना स्त्रियों और पुरुषों दोनों की कमज़ोरी है। मगर हर किसी का सम्मान करना क्या व्यवहारिक रुप से संभव है ? क्या स्त्रियां स्वयं सभी स्त्रियों का सम्मान कर सकतीं हैं ? क्या पुरुष सभी पुरुषों का सम्मान करते हैं ? क्या सम्मान इतनी सतही और सस्ती चीज़ है ?

अगर ‘मैं सभी स्त्रियों का सम्मान करता हूं’ जैसे जुमले छोड़नेवाले लोग बहुत महान और स्त्रीवादी हैं तो वे कौन लोग थे जो ‘स्त्रियां त्यागी होतीं हैं’, ‘स्त्रियां संतोषी होतीं हैं’, ‘स्त्रियां समर्पिता होतीं हैं’ जैसे झांसे दे-देकर स्त्रियों से सालोंसाल मुफ़्त में काम निकालते रहे? और वे कौन लड़के थे जो लड़कियों को ‘फंसाने/पटाने’ के लिए कैसा भी झूठ बोलने को तैयार रहते थे ? क्या ये सब स्त्रीवादी थे ?

अगर आप किसीसे ज़बरदस्ती आदर लेंगे, उसपर अपनी इच्छाएं थोपेंगे तो क्या वह आपसे ख़ुश होगा? ख़ुद स्त्रियां जिन्हें ज़बरदस्ती मर्द का आदर करना पड़ा, अब मौक़ा मिलते ही मर्दों को भर-भरके ग़ालियां दे रहीं हैं।

और ज़बरदस्ती के इस 'स्त्री-सम्मान' के परिणाम भी कुछ अलग़ होंगे, मुश्क़िल ही लगता है।

आखि़र आप ख़ामख्वाह हर किसीसे सम्मान चाहते ही क्यों हैं ? ऐसा क्या कर दिया आपने ? अगर कोई आपका सम्मान नहीं कर रहा तो इसका मतलब यह कैसे हुआ कि वह आपका अपमान या नुकसान कर रहा है ?

उसे लगता है कि जिस भी किसीको, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, अकारण ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से सम्मान पाने की चाह है, उसे एक बार मनोचिकित्सक से भी मिल लेना चाहिए।

क्या वे स्त्रियां भी समझदार हो गईं हैं जो स्त्रीविरोधी कॉमेडी शोज़ में पूरे उत्साह के साथ शामिल होतीं हैं !? यह कैसी समझदारी है कि आपकी स्त्रीमुक्ति में जागृति सिर्फ़ वहां-वहां उभरकर आती है जहां कुछ बोलने में कोई ख़तरा नहीं है!? या जिन लोगों/वर्गों/वर्णों को जलील करना आसान है, जिनका उपहास लोग इस तरह करते आ रहे हैं जैसे उन्हें उपहास के लिए ही बनाया गया हो, उन्हींके सामने एकाएक आपमें सारी नारीमुक्ति जागृत हो जाती है ? इसकी एक वजह है कि भारत में स्त्रियां अकसर धार्मिक हैं इसलिए जातिवादी भी हैं। एक दिन उसने अथीज़्म शब्द यूट्यूब में डालकर सर्च किया तो पाया कि अच्छी-ख़ासी मात्रा में  दुनिया-भर की स्त्रियां नास्तिकता पर खुलकर चर्चा करतीं हैं जबकि भारतीय पुरुषों तक के वीडियो वहां गिनी-चुनी मात्रा में हैं।

क्या वे स्त्रियां भी समझदार हैं जो हर वक्त सारा दोष पुलिस और नेताओं को देतीं हैं? क्या उन्हें इतना भी नहीं पता कि ऐसी क़िताबें जिनमें ‘एक मर्द की गवाही दो औरतों के बराबर होती है’, पुलिसवालों ने नहीं लिखी ? क्या उन्हें यह नहीं पता कि आज तक ऐसी कोई घटना देखने में नहीं आई जहां किसी नेता ने किसी आम आदमी को दहेज़ लेने या देने को मजबूर किया हो ?

आजकल कई जगह यह भी पढ़ने में आ रहा कि पुरुष बड़े बदतमीज़ हैं, वे रास्तों पर हमारे क्लीवेज़ देखने लगते हैं। हो सकता है बहुत-सी स्त्रियों ने क्लीवेज का फ़ैशन सिर्फ़ स्त्रियों को दिखाने के लिए अपनाया हो, मगर यह जानने में कोई बुराई नहीं है कि देखना, घूरना, छेड़ना और बलात्कार करना सब अलग़-अलग़ बातें हैं। किसी व्यक्ति या ऑबजेक्ट के किसी हिस्से को हमें देखना चाहिए या नहीं देखना चाहिए, यह निर्णय भी तो आप तभी लेंगे जब एक बार देख लेंगे। क्या स्त्रियां अच्छे मसल्स् या सिक्स पैक एब्स् वाले पुरुषों को ग़ौर से नहीं देखती? वैसे क्लीवेज़ जैसे फ़ैशन स्त्रियां सिर्फ़ स्त्रियों को दिखाने को करती होंगी, यह मानना ज़रा मुश्क़िल ही है।

एक ही वक़्त में आप तरह-तरह के (विरोधाभासी) फ़ायदे एक साथ अपने लिए चाहेंगे तो क्या यह संभव हो पाएंगा ?

एक विज्ञापन में एक स्त्री एक शर्मीले पुरुष को प्रेमनिमंत्रण की पहल करने के लिए उकसाते हुए कहती है-‘बी अ मैन’! क्या आपको लगता है कि इस स्त्री का आशय यहां ‘मानव’ या ‘इंसान’ से है? यह स्त्री जब इतना कह सकती है तो ख़ुद पहल क्यों नहीं कर सकती ? ‘मर्दानगी’ ने पहले ही दुनिया-भर की मुसीबतें खड़ी कर रखीं हैं और आप आगे फ़िर वही हरक़तें कर रहे हो ?

निर्भया कांड के कई महीने बाद तक एक विज्ञापन दिखता रहा जिसमें कोई मशहूर युवा आयकन कह रहा था कि ‘मर्द वही है जो स्त्री की रक्षा करे।’ इसमें क्या नई बात कहदी आपने ? यह तो वही पुरानी बीमारी है। मर्द से मतलब क्या है आपका? जिसका शरीर तगड़ा है? बाक़ी जिनका नहीं है वे यूंही खि़सक जाएं !? स्त्रियां, स्त्रियों की रक्षा न करें क्या ? वे तो मर्द हैं नहीं। ये आप उनका उत्साह बढ़ा रहे हैं कि डिस्करेज कर रहे हैं ? और जो किन्हीं कारणों से स्त्री की रक्षा नहीं कर पाते वे सब नामर्द हैं क्या? यह क्या कंपलसरी है कि हर मर्द को सड़क पर होनेवाले हर लफ़ड़े, झगड़े, दंगे में पड़ना ही पड़ना चाहिए ? लोगों को और भी बहुत-से काम होते हैं।

वैसे भी विज्ञापन या फ़िल्म में स्त्री की रक्षा करने और उनके बाहर, वास्तव में रक्षा करने में फ़र्क़ होता है। आंकड़ों के शौक़ीन चाहें तो पता लगा सकते हैं कि हीरो लोग वास्तविक ज़िंदग़ी में कितनी रक्षाएं वगैरह करते हैं। सड़क पर स्त्री की रक्षा की साल-भर में इक्का-दुक्का ख़बरें पढ़ने को मिलतीं हैं। सारी रक्षा रेडियो-टीवी पर चलती है।

और यह किसने कहा कि स्त्री की तरफ़ बोलनेवाला हर मर्द महान, संवेदनशील इंसान होता है, स्त्रीमुक्ति की गहरी समझ रखता है?

उसे याद आती है एक घटना जब वह एक भीड़वाले रुट पर रोज़ सफ़र करता था। कई बार कुछ लड़कियां दिखाई देतीं थी जो आराम से जाकर कंडक्टर के पास बैठ जाया करतीं थी। उनकी उससे दोस्ती रही होती होगी या जो भी संबंध होता होगा। ऐसे ही एक दिन एक लड़की उठकर पिछले दरवाज़े से उतरने को बढ़ी। बस के जो नियम हैं उनके अनुसार भी यह ग़लत था और भीड़ भी भयानक थी। एक प्रौढ़ आदमी अनचाहे ही उस लड़की के रास्ते में इस तरह फंस गया कि उसके हटे बिना निकलना संभव ही नहीं था। मगर वह भी इस क़दर बुरी तरह फंसा था कि उसके लिए हिलना भी संभव नहीं था। धीरे-धीरे भीड़ उस आदमी के पीछे पड़ने लगी। लड़की सुंदर थी, कंडक्टर का सपोर्ट था और हर कोई हीरो बन रहा था। अंत में जब लगा कि लोग उसे पीटने लगेंगे तो सरल ने हस्तक्षेप किया। बिलकुल रुंआसे हो गए उस आदमी ने बहुत आभार माना कि एक आदमी तो उसकी तरफ़ बोला।

इसी तरह एक बार जब वह परिवार के साथ कहीं जाने के लिए बस में बैठा था कि एक मां-बाप एक बहुत ख़ूबसूरत बेटी के साथ बस में चढ़े। सीट ढूंढते हुए वे वहीं आ पहुंचे जहां सरल के आगेवाली सीट पर एक कमज़ोर फ़टेहाल शराबी बेसुध पड़ा था। मां-बाप अभी कुछ सोच ही रहे थे कि पड़ोस की सीट से अचानक एक ‘हीरो’ उठा और उस मरियल शराबी को तड़ातड़ थप्पड़ मारने शुरु कर दिए। फिर प्रभावशाली डायलॉगबाज़ी करते हुए उस मरियल, ग़रीब, बेसुध शराबी को बस से बाहर धकेल दिया। पता नहीं उसकी इस ‘हीरोपंती’ से लड़की  इम्प्रैस हुई या नहीं मगर सरल इस बात से कई दिन निराश रहा कि उस दिन वह कुछ बोल ही नहीं पाया।

समझदार स्त्रियां किन लोगों से प्रभावित होतीं हैं, कैसे पुरुषों को पसंद करतीं हैं ? सामान्यतः लड़कियां उन लड़कों को पसंद करती पाई जातीं हैं जो उनके काम तुरत-फ़ुरत करवा कर दे दें। और ऐसे काम बेईमान और जुगाड़ू लोग ही करा पाते हैं, ईमानदार आदमी इस मुल्क़ में अपने ही काम नहीं निपटा पाता, दूसरों के लिए क्या कर पाएगा ? आपको यह तरीक़ा, ऐसे लोग पसंद हैं तो इसका भी आपको पूरा हक़ है। मगर तब भ्रष्टाचार-विरोध के कार्यक्रमों में ईमानदारी के नारे लगाते हुए आप अजीब-से लगते हैं। दूसरों से, पुलिस से, नेताओं से क़ानून को ठीक से लागू करने की मांग करते हुए भी आप विचित्र ही लगते हैं।

क्या समस्याएं झूठ बोलने और अव्यवहारिक बातें करने से हल हो जाएंगी !?

22-04-2015

(जारी)

(अगला भाग)

7 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-6

(पिछला भाग)


इस वीडियो में ज़्यादा आपत्तिजनक तो कुछ नहीं है मगर नया भी कुछ नहीं है। दुनिया-भर में, भारत में भी पत्र-पत्रिकाओं, इंटरनेट की बहसों और टीवी सीरियलों में पिछले कई सालों से ये बातें कही जा रहीं हैं और इस वीडियो से बेहतर ढंग से कही जा रहीं हैं। इस वीडियो का सबसे कमज़ोर पहलू यह है कि इतने गंभीर और जटिल मुद्दे पर कहीं भी तर्क देने की कोई ज़रुरत ही नहीं समझी गई है। बल्कि पुराने ब्राहमणवादी अंदाज़ में घोषणाएं की गईं हैं। इतने ख़र्चे और इतनी तैयारी के साथ थोड़ा ध्यान ‘रीज़निंग’ पर भी दिया गया होता तो वीडियो का प्रभाव शायद कुछ और होता। इसे देखते हुए, अनायास ही चीची गोविंदा का पुराना हिट गीत ‘मेरी मर्ज़ी’ बार-बार याद आता रहा।


अंततः जब दीपिका कहतीं हैं कि ‘आय एम द यूनिवर्स....’ तो यह वीडियो पूरी तरह ब्राहमणवादी अमूर्त्तन को टक्कर देने लगता है और डर लगने लगता है कि इतने सारे मर्द-भगवानों के बोझ-तले करा रहे भारत को क्या अब कुछ नयी स्त्री-भगवानों को भी झेलने की तैयारी कर लेनी चाहिए। चाहे सचिन तेंदुलकर हों, भारत का तथाकथित ‘सबसे अक़्लमंद बच्चा’ कौटिल्य हो या कार्टूनिस्ट त्रिवेदी हों, अपने लोगों को तुरत-फ़ुरत आयकन या भगवान बना देने का ब्राहमणवाद का यह शौक़ भारतीयों को बहुत भारी पड़ता रहा है। यूं भी पिछले काफ़ी समय से यह देखने में आ रहा है कि फ़िल्मइंडस्ट्री बदलाव के आगे कम और पीछे ज़्यादा चलती है। और अपने आर्थिक पक्ष का ख़ास ख़्याल रखती है।

शादी से पहले, शादी के समानांतर या शादी के बाद यौन-संबंध बनाने का हक़ किसीको भी हो सकता है, मगर भारतीय शादी का काँसेप्ट चूंकि अलग तरह का है इसलिए ये बातें प्रेमसंबंधों के दौरान या अरेंज्ड् मेरिज में रिश्ता तय करते समय साफ़ कर ली जाएं तो बेहतर होगा। वरना अब तक भारतीय शादी को लेकर जो मान्यताएं और धारणाएं रहीं हैं, उनके चलते किसीको भी ऐसे संबंधों पर आपत्ति और कष्ट हो सकता है। और उस आपत्ति और कष्ट को नाजायज़ कतई नहीं कहा जा सकता।

इसमें कोई शक़ नहीं कि पुरुष भी अब तक ऐसी हरक़तें बिना बताए करते आए हैं मगर बेहतर तो यही होगा कि पिछली भूलों से सबक लेकर आगे जो रास्ते बनाए जाएं वो पहले की तरह उलझे हुए, भ्रमित करनेवाले, कन्फ़्यूज़ करनेवाले न हों बल्कि ज़्यादा से ज़्यादा स्पष्ट, साफ़-संुथरे और पारदर्शी हों।

(जारी)

07-04-2015

(अगला भाग)

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-5


(पिछला भाग)
यहां देखिए, नायिका को सीधी बात में मज़ा नहीं आ रहा, वह चाहती है कि नायक कुछ घुमा-फिराकर कहे। यह तो फ़िल्मी सिचुएशन है मगर बाहर की दुनिया में भी घुमाने-फिराने को बड़ी प्रतिष्ठा मिली हुई है। घुमाने-फिराने के सबसे ज़्यादा शौक़ीन हमारे कवि और साहित्यकार हैं। इन्होंने पक्का मान लिया है कि घुमाना-फिराना बड़ी कला है। हुज़ूरेवाला, घुमाना-फिराना सिर्फ़ कला नहीं है, यह ठगी भी है, धोखाधड़ी भी है, बदमाशी भी है। हो सकता है लड़कियों को यह अच्छा लगता हो, हालांकि आज की स्त्रियां उन सब बातों से इंकार कर रहीं हैं जिन्हें कल तक स्त्रियों की पसंद बताया जाता रहा, फ़िर भी मान लें कि लड़कियों को यह अ़च्छा लगता है मगर किन्हीं लड़कों को यह ‘कला’ नहीं आती तो वे इसका कोर्स करने जाएं क्या !? आखि़र सीधी बात में दिक्क़त क्या है ? सही बात तो यह है कि भारतीय समाज की स्थिति ऐसी नहीं है कि ज़्यादा ‘कलाबाज़ी’ दिखाई जाए। यहां तो साहित्य और प्रेम, दोनों जगह सीधी-साफ़ बात और नीयत की ज़रुरत है।

ईश्वर पर न जाने कितनी कविताएं और लघुकथाएं उसने ऐसी पढ़ीं हैं कि कुछ समझ में ही नहीं आता कि रचनाकार कहना क्या चाहता है, ईश्वर है, कि नहीं है, कि छुट्टी पर गया है, कि सामने नहीं आना चाहता, कि शर्मीला है, कि नहाने गया है.......!? या कि रचनाकार डरपोक है, अपने डर को छुपाने के लिए बिंबों, उपमाओं, प्रतीकों और अलंकारों का सहारा ले रहा है!? दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया पर लोग साफ़ बात कर रहे हैं और उसका असर भी दिख रहा है। जो समाज ‘घुमाने-फिराने’ की ‘कलाबाज़ी’ की ही वजह से पतन के कगार पर पहुंच गया हो और आगे पारदर्शिता की चाह रखता हो उसमें साफ़ बात करनेवालों की क़द्र ज़्यादा हो तो क्या बेहतर नहीं होगा? जिनको ‘कला’ पसंद है वे ‘कला’ देखें-दिखाएं।
(गीतविशेष से कोई दुश्मनी नहीं है, अपनी बात कहने के लिए जो भी पहला गीत याद आया, ले लिया है)

07-04-2015
कई बार तो लगता है कि लोग मुद्दों को भी घुमाए-फिराए दे रहे हैं। वर्णव्यवस्था से बड़ा वी आईपी का, छुआछूत से बड़ा काले-गोरे का और दहेज़ से बड़ा लाल बत्ती का मुद्दा हो गया है। टीवीवाले असली मुद्दों से घबराते क्यों हैं ? भारतीय न्यूजचैनलों पर ब्राहमणवाद, नास्तिकता, वर्णव्यवस्था, छुआछूत जैसे शब्द सुनाई ही नहीं पड़ते! धर्म से जुड़े मुद्दों से ये चैनल बचते क्यों हैं ? एक कारण यह भी हो सकता है कि जिस वर्णविशेष के कब्ज़े में सारा मीडिया है, धर्मविरोधी बहसें चलीं तो उस वर्णविशेष की सत्ता उखड़ जाने की पूरी संभावना है। क्योंकि धर्म से नब्बे प्रतिशत फ़ायदे उसी वर्णविशेष के लोगों को मिलते दिखाई देते हैं।

रंगभेद पर एक स्टिंगनुमां कार्यक्रम में ज़्यादातर स्त्रियां रंगभेद के विरोध में यह दलील देतीं सुनाई पड़ीं कि ‘हमें तो भगवान ने काला बनाया है’। ऐसी दलीलें अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी हैं। सामनेवाला भी कह सकता है कि हमें भी रंगभेद करने की मानसिकता भगवान ने दी है, हम क्या कर सकते हैं। वैसे भी, जैसाकि बताया जाता है, धार्मिक पुस्तकों में जो कुछ लिखा है वह स्त्री के विरोध में ही ज़्यादा है, उसे ग़ुलाम या सामान बनाए रखने का हिसाब-क़िताब है। यूं अपनी-अपनी तरह से तर्क देने को हर कोई स्वतंत्र है।

इधर 'मेरी मर्ज़ी' यानि ‘माई चॉइस’ का ऐलान करता दीपिका पादुकोण का एक वीडियो आया है।

(जारी)

07-04-2015

(अगला भाग)


4 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-4


हे देश के पवित्र महात्मागणों, फूफा-फूफिओं, दादा-दादिओं, नाना-नानिओं, जीजा-जीजिओं, पिताओं-माताओं, तुम जो ये झंडे ले-लेके एकाएक क्रांतिकारी हो उठे हो, ये न सोच बैठना कि जो लोग बलात्कार नहीं करते वे बहुत महान हैं। उन्हींमें से बहुत-सारे लोग सरिता-मुक्ता-मेट्रो नाऊ के कॉलमों में घुसे बैठे हैं। उनके अलावा बहुत-सारे तुम्हारे वे पारंपरिक पुत्र हैं जो लड़की पटाने का पारंपरिक हुनर और ‘धैर्य’ रखते हैं। जो ‘प्यार और युद्ध में सब जायज़ है’ नामक भजन पर पूरी श्रद्धा रखते हैं, किसी राम की मर्यादा की बात भी करते हैं और साथ-साथ किसी कृष्ण के नुस्ख़े भी आज़माते रहते हैं। व्यक्तित्व के इसी विघटन/दोमुंहेपन को सीज़ोफ्रीनिया कहा जाता है। दूसरों को कुछ समझाने से पहले ख़ुद ठीक से समझ लो कि हर कोई इतना पाखंड एक साथ नहीं साध सकता। तुम कितने भी अच्छे नाम इन्हें दो पर दरअसल ये बेईमानों के हुनर हैं। तुमने तो खिड़कियों-रोशनदानों के ज़रिए अपना काम निकाल लिया पर जो तुम्हारी तरह पाखंडी, बेईमान और सीज़ोफ्रीनिक नहीं हैं वो क्या करेंगे ? 
तुम क्या करते रहे वो तुम ज़रा इस गीत में देखो। ‘भारत की बेटियां’ में आज का कथित सबसे बड़ा अपराधी जो कह रहा है, यह गीत उससे कितना अलग है? तुम्हारी फ़िल्में, तुम्हारी कहानियां, तुम्हारे उपन्यास ऐसी मानसिकता से भरे पड़े हैं। ऊपर से अब यही लोग उपदेश भी बांच रहे हैं।


याद करो वे चुटकुले जो रिश्तों की मर्यादा, पवित्रता की बात करनेवाले दोस्त और सहेलियां अकेले में मज़े ले-लेकर सुनाते थे कि किस तरह एक आदमी कहीं से एक छूत की बीमारी लेकर लौटा और कैसे वो बीमारी कुछ ही दिन में सारे परिवार में फैल गई। अंदर जिस चीज़ में तुम रस लेते रहे, बाहर उसीके खि़लाफ़ नारे लगाने लगे? इसीको सीज़ोफ्रीनिया कहते हैं महामनाओं। ज़रा ध्यान से देख लो, तुम्हारे आस-पास क्रांति की तख़्तियां लिए खड़े लोग वही चुटकुले सुनाकर तो नहीं निकले।

आज तुम्हे, पुलिस और क़ानून की बड़ी याद आ रही है कि पुलिस और क़ानून कुछ नहीं करते, नेता कुछ नहीं करते। मगर तुम्हे यह याद नहीं आ रहा कि तुम्हारे बच्चे पुलिस ने नहीं पाले। ख़ुद पुलिसवाले तुम्हारे ही जैसे किन्हीं घरों में पले हैं। और तुम्हे दहेज़ लेते-देते वक़्त तो क़ानून याद नहीं आता ? तुम्हे गली और सड़क पर दूसरों के रास्ते में कमरे बनाते और दुकान बढ़ाते वक़्त तो क़ानून याद नहीं आता ? तुम्हे सड़क पर गड्ढे खोदकर तम्बू तानते समय तो क़ानून याद नहीं आता ? न तुम्हे टैक्स मारते में क़ानून की याद आती है! न तुम्हे टीए डीए के नक़ली बिल बनाते हुए क़ानून याद आता है! क्या तुम्हारे अख़बारों में रचना छापने को लेकर कोई स्पष्ट नियम-क़ानून हैं ? तुम्हारा कौन-सा चैनल है जो अख़बार में विज्ञापन निकालता हो कि हमें फ़लां-फ़लां विषयों पर डिबेट के लिए फ़लां-फ़लां योग्यता वाले डिबेटर चाहिएं? सबने ख़ुद धक्कमपेल चला रखी है और दूसरों को ईमानदारी सिखा रहे हैं!?

ख़ुद कोई क़ानून मानेंगे नहीं और अपने लिए बिलकुल ठीक-ठीक न्याय चाहिए!? क्यों चाहिए !? तुमने क़ानून का पालन करनेवालों का कितनी बार साथ दिया जो अब दूसरों से शिक़ायत कर रहे हो कि दूसरे साथ नहीं देते ? तुम्हे याद है कि क़ानून का पालन करनेवालों की तुम क्या-क्या कहकर हंसी उड़ाते रहे-भोंदू, अव्यवहारिक, फ़ालतू, पागल, निठल्ला, सनकी!

अब ख़ुद यही सब बनना चाहते हो!?

(जारी)

04-04-2015


2 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-3

(पिछला भाग)

जब सानिया मिर्ज़ा जीतती हैं, साइना नेहवाल जीतती हैं, सचिन तेंदुलकर रिकॉर्ड बनाते हैं, धोनी वर्ल्ड कप दिलाते हैं तो तुम कहते हो कि ये हमारे आदमी हैं, हमें इनपर गर्व है। तुम्हारे बेटे-बेटी क्लास में सबसे ज़्यादा नंबर लाते हैं, अच्छी नौकरी पाते हैं तो तुम कहते हो कि अहा देखा हमारे बच्चे कितने होनहार हैं। तुम मोहल्ले और देश में मिठाईयां बांट-बांटकर खाते हो। मगर जब ममता कुलकर्णी अफ़्रीका में ड्रग्स के धंधे में पकड़ी जातीं हैं तब वो तुम्हारी नहीं होती क्या ? तब वो किसी और की हो जाती है !? जब तिवारी जी डीएनए टेस्ट में पकड़े जाते हैं तो वो तुम्हारे क्यों नहीं होते ? जब कोई बच्चा छेड़छाड़ या बलात्कार के केस में पकड़ा जाता है तो वो तुम्हारा ही आदमी क्यों नहीं होता ? मिठाई तुम बांटकर खाओगे और सज़ा कोई और भुगतेगा ? सज़ा में भी थोड़ा हिस्सा बंटाओ ना।

तुम्हारे घर में तकिए के नीचे से जो मनोहर कहानियां और सत्यकथा की प्रतियां बरामद होतीं थीं वो वहां कौन रखकर जाता था ? क्या कोई भूतप्रेत ? कोई चमत्कारी बाबा ? तुम ख़ुद ही लेकर आते थे कहीं न कहीं से, अंकलजी, आंटीजी। दीदीजी और भैयाजी। चाचाजी और चाचीजी। ताऊजी और ताईजी। मामाजी और मामीजी। तुम क्यों पढ़ते थे उन्हें ? उनमें बलात्कारों या अन्यत्र यौन-संबंधों के चटख़ारेदार विस्तृत वर्णन के सिवाय और क्या होता था ? तुमने कभी ऐसी कोशिश की क्या कि आदमी की सहज-सामान्य प्राकृतिक इच्छाएं सीधे और पारदर्शी तरीक़ों से पूरी हो जाएं, उसे किन्हीं टेढ़े-मेढ़े अंधेरे रास्तों पर न भटकना पड़े!?

और वो ‘सरिता’, ‘मुक्ता’, ‘मेरी सहेली’, ‘तेरी सहेली’ क्या बच्चे फेंक जाते थे घरों में!? जिनके ‘कांसे कहूं’, ‘आपकी समस्याएं’ कॉलमों में अस्सी प्रतिशत समस्याएं इनसेस्ट संबंधों की होतीं थीं। ये कखग और एक पाठक के नाम से छपनेवाली समस्याएं क्या संपादक ख़ुद ही लिख लेते थे!? अगर हां तो समझ लीजिए कि संपादक कैसे होते थे। और अगर नही ंतो साफ़ ज़ाहिर है कि आधे से ज़्यादा लोग अपने ही आसपास कहीं अंधेरे कोनों में अपने लिए आसान रास्ते ढूंढ लेते थे। किसी-किसी को कभी अपराधबोध होने लगता था, या रंगे हाथ पकड़े जाते थे या नौबत ब्लैकमेल की आ जाती थी तो वे एबीसी बनकर ऐसी पत्रिकाओं में समाधान ढूंढने लगते थे। यहां याद रखने की बात यह भी है कि ऐसे सभी लोग शिक्षित नहीं होते, हों तो सबकी पहुंच पत्रिकाओं तक नहीं होती, हो भी तो सब चिट्ठियां नहीं भेजते यानि कि ऐसे लोगों की संख्या जितनी पत्रिकाओं में दिखती थी/है उससे ज़्यादा ही रही होगी।

मगर सामने समाज में तो कहीं वे दिखते नहीं! यहां तो जिसको देखो वही बलात्कार और भ्रष्टाचार का विरोध कर रहा है!

तो फिर इस देश में भ्रष्टाचार और व्याभिचार(!) के बीज आखि़र डाले किसने ?

कहां ग़ायब हो गया है वह आदमी ?

(जारी)

02-04-2015

(अगला भाग)


सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-2

(पिछला भाग)

चंद रोज़ पहले उसने सुना कि एक भीड़ ने क़ानून अपने हाथ में लेकर एक बलात्कारी की हत्या कर दी। सोचने की बात यह है कि हत्या और बलात्कार में फ़र्क़ क्या है ? दोनों ही तरह के लोग बातचीत में या तो यक़ीन नहीं रखते या उनमें इतना धैर्य नहीं होता। कहीं न कहीं उन दोनों में दूसरों को लेकर एक मालिक़ाना रवैय्या है, जैसे दूसरे इंसान नहीं हैं, सामान हैं। यह भाव कहां से आया ? यह क्या एक ही दिन में पैदा हो गया ? नहीं, कुछ न कुछ बुनियादी गड़बड़ है। अगर यह पूरी भीड़ बलात्कार की विरोधी थी तो उस आदमी की हिम्मत ही कैसे हुई कि वह ऐसा सोच भी लेता ?

क्या कोई बच्चा जन्म से यह तय करके पैदा होता होगा कि मैं एक दिन बलात्कार करुंगा!? तो !?

बच्चे के पास अपनी कोई सोच नहीं होती। वह सब कुछ इसी दुनिया से सीखता है। उसके मां-बाप, रिश्तेदार, टीचर, पड़ोसी, अख़बार, पत्रिकाएं, फ़िल्में, धर्म, धर्मगुरु, राजनीति......ये सब मिलकर एक बच्चे का व्यक्तित्व बनाते हैं। सही बात तो यह है कि जिस भीड़ ने बलात्कारी को मारा वो पूरी भीड़ उस बलात्कार में हिस्सेदार थी।
मज़े की बात, असलियत समझने का अब से अच्छा मौक़ा कभी आया ही नहीं। अभी 3-4 साल पहले इस देश में एकाएक आंदोलन शुरु हो गया जिसे एक साथ सभी न्यूज़-चैनलों ने रात-दिन दिखाना शुरु कर दिया। तथाकथित भ्रष्टाचार-विरोधी इस आंदोलन के करनेवाले कह रहे थे कि देश की पूरी सवा अरब जनता भ्रष्टाचार-विरोधी है और सब हमारे साथ हैं।

तो भैय्या फिर भ्रष्टाचार कर कौन रहा है ?

ये लोग भ्रष्टाचार-विरोध को ईश्वर से जोड़ रहे थे, धर्म की दुहाई दे रहे थे, सभ्यता और संस्कृति का हवाला दे रहे थे। इनकी एक-एक हरक़त से साफ़ दिखता था कि ये उन्हीं लोगों के प्रतिनिधि हैं जिन्होंने इस देश पर एक सड़ियल और अतिपाखंडी संस्कृति थोपी है जिसकी वजह से एक लगभग पूरा समाज सीज़ोफ़्रीनिक हो चुका है।

केबल टीवी और इंटरनेट जैसे माध्यमों से जनता के रुख़ में आए बदलाव को भांपकर अब यही लोग बदलाव का क्रेडिट लेने में जुट गए हैं।

वरना जिस देश के सवा अरब लोग और पूरा मीडिया भ्रष्टाचार-विरोधी हो वहां भ्रष्टाचार घुस भी कैसे सकता है ?


(जारी)
02-04-2015

(अगला भाग)


1 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा

एन डी टी वी इंडिया अकसर रविवार को मुहिम जैसा कुछ चलाता रहता है।

साल-भर हुआ होगा शायद। स्त्रियों की स्थिति को लेकर बातचीत चल रही थी।

किसी गांव में मौजूद एक संवाददाता स्टूडियो में मौजूद अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की बातचीत किसी ख़ाप पंचायत के मुखिया से करा रहा था। मुखिया हैरान-परेशान सुन रहा था। प्रियंका टीचर की तरह उसे समझा रहीं थीं। सरल को यह खटक रहा था।

मुखिया संभवतः अनपढ़ रहा होगा। वह गांव के बाहर की दुनिया को कितना जानता होगा ? जो कुछ उसने बचपन से अपने गांव-घर में देखा-सीखा, वही वह कर रहा होगा। अगर वह आधुनिक होना चाहे तो उसे यह अतिरिक्त प्रयास करके अर्जित करना होगा। वह इस उम्र में क्या-क्या सीख पाएगा ? क्या-क्या सोच-समझ पाएगा ?

ख़ुद प्रियंका की जो आधुनिकता है उसमें से कितनी उनकी ख़ुदकी अर्जित की हुई है और कितनी माहौल और परिवार से तोहफ़े में मिली हुई !?

संभवतः वह कांवेट में पढ़ीं हैं।

फ़िर फ़िल्म इंडस्ट्री में तो स्कर्ट पहनना उतना ही सामान्य है जितना गांव में धोती पहनना। इस इंडस्ट्री में मित्रता या अन्यत्र यौनसंबंध बनाने में कोई साहस या प्रगतिशीलता जैसी बात है ही नहीं। वहां तो पचासियों सालों से लोग एक-दूसरे के दोनों गाल चूमकर स्वागत करते हैं।

और प्रियंका व अन्य नायिकायों को कपिल शर्मा के शो में क्या हो जाता है !? वहां कपिल अपनी पत्नी के होंठों और रिश्तेदारों का मज़ाक़ उड़ाते नहीं थकते। उनकी एक बुआ है जो शादी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है। एक दादी है जो शराब पीकर अजीब हरक़तें करती है। वहां जितने भी स्त्री-पात्र हैं, लगता है जैसे स्त्री-अस्मिता का मज़ाक़ उड़ाने के लिए ही रखे गए हैं। मगर वहां कोई फ़िल्मकार चूं भी नहीं करता। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम नारी-मुक्ति के मुद्दों और प्रयासों का आकलन भी जातिवाद का फ़िल्टर लगाकर कर रहे हों!

सही बात तो यह है कि दूर-दराज़ के किसी गांव के अनपढ़ मुखिया का रुढ़िवादी व्यवहार नितांत स्वाभाविक है (ठीक वैसे ही जैसे रजत शर्मा का अपनी विचारधारा(!) वाली सरकार से पुरस्कार ले लेना स्वाभाविक है ; आपत्तिजनक तो यह है कि तथाकथित प्रगतिशील/वामपंथी रोज़ाना ‘फ़ासीवाद आ गया’, ‘फ़ासीवाद आ गया’ चिल्ला रहे हैं और प्रगतिशील(!) व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी उसी सरकार से पुरस्कार ले रहे हैं. ‘मैं वामपंथी हूं इसलिए कलाकार हूं’ वाले अपनी ‘हैदर’ के लिए पुरस्कार ले रहे हैं) मगर रोज़ाना देश-विदेश घूम रहे और अपने शो में हीरोइनों के साथ उन्मुक्त व्यवहार कर रहे कपिल शर्मा द्वारा अपने स्त्री-पात्रों को इस भद्दे ढंग से पेश करना निहायत आपत्तिजनक है। और ध्यान देने लायक बात यह है कि यह सब कर चुकने के बाद प्रोग्राम के अंत में गुडनाइट के साथ वे यह भी कहते हैं कि ‘स्त्रियों का सम्मान कीजिए’।

(अगला भाग)

01-04-2015
(जारी)



14 सित॰ 2013

काश! यह रात कभी ख़त्म न हो!


वह बिस्तर में पड़ा है, आंखें बंद हैं।

आंखें बंद कर लेने से क्या नींद आ जाती है ? रात किस वक्त आंख लगती है, कितना वक्त नींद आती है, कुछ समझ में नहीं आता। बस सुबह मन होता है कि सोया रहे, अभी तो नींद आनी शुरु ही हुई थी और......। यूं भी कोई चुस्ती-फुर्ती उसे अपने बदन में महसूस नहीं होती, फ़िर सुबह-सुबह तो बिलकुल ही थका-थका सा महसूस करता है ख़ुदको।

उठे भी तो किसलिए ?

जैसे-तैसे तैयार होकर स्कूल के लिए निकलेगा। सारे रास्ते आंखें नीची किए, सर झुकाए चलेगा। चलेगा कि घिसटेगा ! मौसम कैसा भी हो, हाथ-पांव पसीने से भरे रहेंगे। रास्ते में कहीं कोई कुत्ता दिख गया तो वह डरेगा, भौंक पड़ा तो बुरी तरह डर जाएगा। लड़कों का कोई झुण्ड दिख गया तो डरेगा, कहीं किसीसे नज़र न मिल जाए। पता नहीं कोई क्या कह दे, कोई ग़ाली न दे दे, कोई अजीब-सा इशारा न कर दे। स्कूल पहुंचेगा तो डरेगा कि कहीं कोई टीचर प्रेयर पढ़नेवाले तीन बच्चों में खड़ा न कर दे। कहीं अपनी क्लास की लाइन में आगे न खड़ा होना पड़ जाए। पीछे भी खड़ा है तो घबराया है कि कोई देख न ले कि वह प्रेयर नहीं बोल रहा है। बोलना तो दूर, उसके होंठ भी ठीक से नहीं हिल रहे।

फ़िर क्लास में!

किसी टीचर ने कुछ पूछ लिया तो ! उसे आता है कि नहीं आता, यह बड़ा सवाल नहीं है। मुश्क़िल यह है कि बोलेगा कैसे ? मुंह से आवाज़ निकलेगी कि अंदर ही कहीं फ़ंसी रह जाएगी !

आज तीसरा घंटा ख़ाली है। गणित वाले मास्साब नहीं आए हैं। सब बच्चे ख़ुश हैं। वे चिल्ला रहे हैं, कूद-फांद मचा रहे हैं। वह भी ख़ुश है। आज मास्साब का डर नहीं है। मगर अब एक नया डर उसके सामने है-बच्चों का डर।

ननुआ उसका हाथ मरोड़ेगा, वह कुछ भी नहीं कर पाएगा, बस कुनमुनाता रहेगा।

वह दादा टाइप लड़की आज फ़िर उसे धमकाकर उससे चॉक छीन लेगी। वह चुपचाप दे देगा।

हाफ़टैम (हाफ़टाइम/इंटरवल) में दूसरे बच्चों की तरह ही वह खाना खाने घर आएगा। और जब लौटकर वापिस जाएगा तो देखेगा, बस्ते में से उसका पैन ग़ायब है। आए दिन कोई उसका पैन चुरा लेता है, फ़िर भी आए दिन वह पैन बस्ते में ही छोड़कर खाना खाने चला जाता है।

स्कूल जाने के बाद पहले घंटे से आखि़री घंटे तक उसका एक-एक पल जैसे इसी इंतज़ार में बीतता है कि कब घंटा ख़त्म होगा, कब इंटरवल होगा, कब छुट्टी होगी।

छुट्टी होगी तो उसकी जान में ज़रा-सी जान आएगी।

खाना-वाना खाकर उसे नया पैन ख़रीदने भी जाना है। पैन के लिए मौक़ा देखकर माताजी या पापाजी के बक्से में से एक या दो रुपए, जो भी मिलें, निकाल लेने हैं। स्टोर में अकेले जाने में जान निकलती है। न जाने क्या-क्या सामान पड़ा है वहां। लाइट जलाई तो कोई देख लेगा। यूंही घुसा तो उसकी घबराहट अंधेरे को और घना कर देगी। पर पैसे तो निकालने हैं। बिना पैन के कल स्कूल कैसे जाएगा ?

पापाजी-माताजी को बताए क्या ? बताने से होगा क्या ? वे तो यही कहेंगे कि ‘होशियार बनते हैं ; ऐसे कैसे कोई पैन चुरा लेता है’। डांट भी सकते हैं कि ‘फ़लां लड़के को देख कितना तेज है, उससे कुछ सीख’। सरल के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं है। यह उसे भी मालूम है कि होशियार होना चाहिए, तेज होना चाहिए। पर वह इसका क्या करे कि लाख सोचते रहने के बावजूद वह कोई कोशिश तक नहीं कर पाता!

वह डरता हुआ नमन की दुकान तक जाएगा, क्योंकि उसे मालूम है कि वहां भीड़ लगी होगी। सारे बच्चे और उनके मां-बाप कापी-पैन ख़रीदने वहीं आते हैं। वहां जाकर भीड़ के पीछे खड़ा हो जाएगा। फिर इंतज़ार करता रहेगा कि कब नमन की नज़र उसपर पड़ जाए और वह उससे पूछे कि हां, तुझे क्या चाहिए ? वह परेशान है कि आखि़र कब नमन की नज़र उसपर पड़ेगी और कब वह उससे पूछेगा! वह डर भी रहा है कि कहीं नमन की नज़र उसपर न पड़ जाए और वह उससे पूछ न ले! अगर पूछ लिया तो क्या वह तुरंत बता पाएगा कि उसे क्या चाहिए ? क्या उसकी आवाज़ नमन तक पहुंचेगी ? कहीं नमन उसकी हंसी तो नहीं उड़ाएगा कि तेरे मुंह में आवाज़ नहीं है? तू लड़की है क्या ?

वह डरा हुआ खड़ा है। एक डर उसे यह भी है कि कोई जान-पहचान वाला न यहां आ जाए और यह न देख ले कि वह डरा हुआ खड़ा है।

दिन इसी तरह निकलता है।

रात को बिस्तर में घुसता है तो आधी रात यही कामना करते बीतती है कि वक्त किसी तरह यहीं ठहर जाए। काश! यह रात कभी ख़त्म न हो!

(जारी)

14-09-2013

5 सित॰ 2013

पापई की शराफ़त भी आफ़त है!

पापाजी कभी-कभी हंसते हैं। अकसर गंभीर दिखाई देते हैं। दिखाई भी कितना देते हैं ! हमेशा तो बिज़ी रहते हैं।

पहले तो सभी कमरों में बल्ब लगे थे जो पीली-पीली रोशनी देते थे। एक-एक करके पापाजी ने सभी कमरों में ट्यूबलाइट लगवा दीं हैं। ट्यूबलाइट, स्विच ऑन करते ही बल्ब की तरह तुरंत नहीं जलती ; पहले फ़ड़फ़ड़ाती है। ज़्यादा देर फ़ड़फ़ड़ाए तो डर लगता है, आज जलेगी कि नहीं, वोल्टेज पूरे आ रहे हैं कि नहीं ! जल जाती है तो कितना अच्छा लगता है। अब कुछ भी काम करो, करने में मन लगेगा, मज़ा आएगा।

पापाजी हंसते हैं तो घर रोशनी से भर जाता है। सब भाई-बहिनों के दिल में जैसे लट्टू जलने लगते हैं। पापाजी कितने अच्छे हैं ! शराब नहीं पीते! सिगरेट नहीं पीते! ग़ाली नहीं बकते! किसीसे लड़ते नहीं। सफ़ेद कमीज़ और सफ़ेद पाजामा। हंसते हैं तो पता चलता है कि दांत उनसे भी ज़्यादा सफ़ेद हैं। शरीर इकहरा है और पेट एकदम सपाट है। और हो भी क्यों नहीं। कितना तो पैदल चलते हैं पूरा दिन। सुबह पांच बजे उठते हैं। बही-खाता लिखते रहते हैं। फ़िर दूध लाना, सब्ज़ी लाना..........दुनिया-भरके काम......दुकान पर जाना, ज़रुरत हो तो दोपहर में फ़िर घर आना...फ़िर जाना....रात को आना...खाना खाना....पौने नौ बजे के समाचार सुनना...और फ़िर बही-खाता.....पापाजी बस मेहनत, मेहनत, मेहनत, काम, काम और काम करते रहते हैं...फ़िल्म देखने भी नहीं जाते कभी। हां, किसीके घर शादी हो..... कोई मर गया हो.... कैसा भी अवसर हो, पापाजी की ज़रा भी जान-पहचान रही हो और पापाजी वहां न जाएं, हो ही नहीं सकता।

पापाजी जब पौने नौ के समाचार सुनते हैं तो सारे बच्चों को पता है कि अब बिलकुल भी नहीं बोलना। ज़रा कोई बोला नहीं कि ऐसी डांट पड़ेगी कि फ़िर रोटी खाए बिना सो जाने का मन होने लगेगा। पापाजी मारते हैं मगर न के बराबर। शायद साल में एक-दो बार, सिर्फ़ एक थप्पड़, पीछे गर्दन पर। थप्पड़ की ज़रुरत भी क्या है! वैसे ही जान निकली रहती है। एक बार तो भाई-बहिनों में से एक ने, दूसरे को यार बोल दिया था, पापाजी ने सुन लिया। ऐसी डांट लगाई कि बुरी तरह सहम गए सबके सब। लगा कि यार भी बहुत गंदी ग़ाली है, ठीक है, नहीं बोलेंगे अबसे।

बच्चे कुछ ऐसा मांग लें जो दिलाना पापाजी के लिए संभव न हो तो वे समझाते हैं कि लाल (बेटा/बच्चा) हमेशा अपने से नीचे लोगों को देखो। उन्हें देखो जिनके पास वो भी नहीं है जो तुम्हारे पास है। बच्चे चुप। वैसे तो बच्चे बोलते ही कभी-कभार हैं फ़िर पापाजी का अपना जीवन इतना सीघा-सादा है कि उनसें बोलें भी तो क्या बोलें! फ़िर ख़्याल भी तो कितना रखते हैं सबका। कोई बच्चा बीमार हो तो दिन में भी आते हैं दुकान छोड़कर। सरल तो आए दिन बीमार होता है। माताजी से दवाई नहीं लेता। माताजी से वैसे भी कोई ढंग से डरता नहीं है फ़िर सरल से दवाई खाई ही नहीं जाती। कोई एक दिन की बात हो तो भी बात है। जब देखो तब बीमारी। जब देखो तब मोटी-मोटी गोलियां, बड़े-बड़े कैपसूल-सबके सब कड़वे। हर बार पानी अंदर चला जाता है, गोली या तो बाहर आ जाती है या मुंह में ही कहीं चिपकी रह जाती है। इसलिए कई बार तो सिर्फ़ दवा खि़लाने के लिए दुकान छोड़कर घर आना पड़ता है पापाजी को। फ़िर सरल की नहीं चलती। पापाजी दोनों हाथ पकड़कर या पकडवाकर, चम्मच ज़बरदस्ती मुंह में घुसाकर, ऊंगली घुसाकर, कैसे न कैसे दवा खि़ला ही देते हैं। दवा खिलाने के वे बड़े पक्के हैं। कभी-कभी सुबह प्रोटीनेक्स या बोर्नविटा वाले दूघ के लिए भी ज़बरदस्ती करते हैं। मगर वो कभी-कभी की बात है। दवाई के मामले में पापाजी कोई समझौता मुश्क़िल से ही करते हैं। ख़ुद भी कई दवाईयां नियमित रुप से खाते हैं।

कई बार सुबह-सुबह जलेबी या तरबूज़ लेकर आते हैं और अपने हाथ से सबको देते हैं। वे कहते हैं कि तरबूज सुबह ही खाना चाहिए। वे ऐसी बातें बहुत बताते हैं। कभी कहते हैं कि खरबूज़े के ऊपर पानी नहीं पीते तो कभी कहते हैं कि रात को दही नहीं खाते। जब भी घर पर होते हैं ऐसा ही कुछ न कुछ बताते रहते हैं। क्या खाओ से ज़्यादा वे क्या न खाओ बताते रहते हैं। और बस दवाईयां और दवाईयां। कई बार वे रात को जब दूसरे सारे काम कर लेते हैं तो सरल के गले पर विक्स अपने हाथों से मलते हैं। सरल को उनका पास बैठना अच्छा लगता है पर बुरा यूं लगता है कि दवाईयां वे ज़्यादा ही घिस-घिसकर लगाते हैं। एक तो सरल की काया वैसे ही बहुत नाज़ुक है ऊपर से हर वक्त की बीमारियां। वह तंग आया रहता है फ़िर पापाजी के हाथ कभी-कभी ख़ुरदुरे से लगने लगते हैं, ख़ासकर जब वे ज़ोर-ज़ोर से दवा रगड़ते हैं। उसके गले में पहले ही भयानक दर्द है ऊपर से यह रगड़। यह दर्द घटा रही है कि बढ़ा रही है! मगर पापाजी के आगे वह वैसे ही बहुत कम बोलता है और विक्स वे कोई अपने लिए थोड़े ही लगा रहे हैं, उसीके भले के लिए लगा रहे हैं। दिन भर के थके हुए तो आते हैं फ़िर भी देर रात जागकर उसे विक्स लगा रहे हैं। वह क्या कहे ! चुपचाप पड़ा लगवाता रहता है। पापाजी सरल का बहुत ज़्यादा ध्यान रखते हैं।

‘ए पिंटू! कैंची रख दे! लग जाएगी हाथ में! पहले भी कितनी बार मना किया है! चल रख!’

सरल कांप जाता है।

‘ए पिंटू! खाट मत उठा! तुझसे नहीं उठेगी! चल छोड़ दे, मैं उठाता हूं।’

सरल घबरा जाता है।

सरल को कुछ-कुछ अच्छा तो लगता है कि पापई कितना ध्यान रखते हैं, पर अंदर कहीं शायद बुरा भी लगता है। कैंची उठाने में इतना ज़ोर से डांटने की क्या बात है! वे बात-बात में ऐसा क्यों कहते हैं कि तुझसे नहीं होगा! शायद वह अभी छोटा है, इसलिए कहते होंगे। वे उसका बुरा क्यों चाहेंगे? बुरा चाहने वाला आदमी क्या इतना ख़्याल रखता है!

दूसरे घरों में ‘नंदन’ या ‘चंदामामा’ जैसी पत्रिकाएं आतीं हैं जिनमें अकसर भूत-प्रेत या राजा-रानी की कहानियां होती हैं। मगर पापाजी ने उन्हें ‘पराग’, सरिता और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाएं लगाके दी हैं। ‘पराग’ सरल को बहुत अच्छा लगता है। उसमें जैसे बिलकुल उसीके जैसे बच्चों की कहानियां होती हैं। कई कहानियां तो बच्चों की समस्याओं पर भी होतीं हैं। पापाजी को कौन बताता है इतनी अच्छी-अच्छी क़िताबों के बारे में! वे बोलते इतना कम हैं कि समझ में नहीं आता उनके दिल में क्या-क्या भरा है। एक बार रात को जब दुकान से आए तो बही-खातों वाले थैले में से एक पार्सल जैसा निकाला। फ़िर बड़े आराम से उसे खोला। वे किसी काम में जल्दी नहीं मचाते, हर काम धीमे-धीमे, करीने से करते हैं। पार्सल में से एक रंग-बिरंगी, चमचमाती हुई क़िताब निकल आई है। पापाजी सामने न बैठे होते तो बच्चे देखते ही लड़ने लगते कि ‘पहले मैं पढ़ूंगी’, ‘नहीं पहले मैं पढ़ूंगा’। क़िताब का नाम है ‘योगीराज’। दिल्ली प्रेस का प्रकाशन। पता नहीं पापाजी ने कब इसके बारे में पढ़ा होगा, कहां पढ़ा होगा, क्यों उन्हें लगा होगा कि यह बच्चों के लिए अच्छी रहेगी, कब, कैसे उन्होंने ऑर्डर दिया होगा! हमें क्या! हमें तो अब पहले क़िताब पढ़नी है, बाद में कुछ और करना है। यह कहानी है एक ढोंगी बंदर की जो कहीं एक आश्रम बना कर, छोटे-मोटे चमत्कार दिखाकर भक्तों को ठगता है। एक दिन जंगल के दूसरे जानवर प्लान बनाकर उसकी पोल खोल देते हैं और वह पकड़ा जाता है।

हम सब बच्चों को ऐसी क़िताबें ख़ूब भातीं हैं। सरल की तो यह ख़ास पसंद है। पापाई कई बार हमें यूंही सरप्राइज़ दे देते हैं।

(जारी)

05-09-2013


2 सित॰ 2013

वह दूसरों के जैसा नहीं है!


सौ में से निन्यानवें बार ऐसा होता है। वे सब उसके खि़लाफ़ एक हो जाते हैं। जब कभी वह घर से निकलता है, गांडू-गांडू कहकर चिल्लाते हैं, पीछे आते हैं।

कस्बा जिसमें उसका जन्म हुआ, अखाड़ेबाज़ी और लौंडेबाज़ी के लिए मशहूर है। अखाड़ेबाज़ी के शौक़ीन लोगों में से कईयों को लौंडेबाज़ी की आदत हो जाती है, ऐसा माना और बताया जाता है। जो इस आदत का शिकार बनते हैं, उन्हें गांडू कहा जाता है। और डरपोक आदमी को भी यहां गांडू कहा जाता है।

मगर ये सब तो उसके दोस्त ही हैं जो उसे गांडू कहते हैं। हमेशा नहीं कहते। उसके साथ खेलते हैं, हंसते हैं, आते-जाते हैं, मिलते-जुलते हैं। मगर कभी-कभी एकाएक न जाने क्या होता है कि वे सब एक तरफ़ और वह एक तरफ़।

वह पीला, कमज़ोर, डरपोक, घुग्घू और भौंदू-सा बच्चा। उसे पता ही नहीं चलता कि ऐसा क्या हुआ कि एकाएक वे सब उसके खि़लाफ़ हो गए!

वह जब इस घर में आया था तो आते ही उसे टाइफ़ाइड हो गया था। और वह बहुत कमज़ोर हो गया था। पहले कैसा था उसे याद नहीं। मगर इतना याद है कि टाइफ़ाइड ठीक होने के बाद दोबारा चलना सीखा था उसने। मां हाथ पकड़कर ऐसे ही चलाती जैसे छोटे बच्चे को सिखाते हैं।

कभी-कभी दिलबर चुपचाप पीछे से आता है और उसकी टांग में अपनी टांग अड़ा देता है। वह धड़ाम से नीचे आ गिरता है। सब बच्चे हंसने लगते हैं। कोई भी दिलबर से नहीं कहता कि ऐसा क्यों कर रहे हो! एक तो बिना बात किसीको गिरा रहे हो। और पीछे से आकर धोखे से गिरा रहे हो! फ़िर हंस रहे हो!

कौन कहेगा! वे तो ख़ुद भी हंसते हैं। उनके बाप खड़े हों तो बाप भी हंसते हैं, मांएं खड़ी हों तो माएं भी हंसतीं हैं, बहिनें खड़ी हों तो बहिनें भी हंसतीं हैं।

उसका मन क्यों नहीं होता कि किसीको धोखे से गिरा दे और हंसे। क्या यह दुनिया उसके जैसे लोगों के लिए नहीं है! क्या उसके जैसा होना बुरी बात है, अपराध है, हंसने की बात है! क्या जीने के लिए उसे भी इनके जैसा बनना होगा !

02-09-2013

(जारी) 

26 अग॰ 2013

बीच घर में एक निर्जन टापू


चौखट के बिलकुल ऊपरी कोने में, दीवार के सहारे एक झिरी है जिससे अपनी बायीं आंख किसी तरह सटाकर वह दुनिया को देखता है। बना-बनाया मकान ख़रीदा है पिताजी ने, नया ही है मगर चौखटों में दीमक लग गई है। सरल धीमे से एक कुर्सी घसीटकर झिरी के नीचे लाता है, सावधानी से उसपर चढ़ता है और सांस रोक कर बाहर का दृश्य देखता है। उसके अहंकार को यह मंज़ूर नहीं कि कोई उसे देखता हुआ देखे। झिरी से घरके बाहरवाले आंगन का एक हिस्सा दिखाई देता है। आंगन के बराबर वह गली है जो घर के पीछेवाली मिल तक जाती है। मोहल्ले के बच्चे कभी-कभी खेलते हुए उनके आंगन तक आ जाते हैं, या गली से गुज़रते हुए मिल में जाते हैं। वही देखना चाहता है सरल। देखते हुए उसे कुर्सी पर शरीर का संतुलन भी बनाए रखना होता है और यह भी ध्यान रखना होता है कि कमरे की ओर आती किसी पदचाप को सुनते ही कुर्सी से उतरकर उसे वापस अपनी जगह टिका देना है। उसके लिए यह दूसरे बच्चों की तुलना में ज़रा मुश्क़िल काम है। चढ़ते और उतरते वक्त उसका शरीर इतने ज़ोर से कांपता है कि लगता है कुर्सी समेत उलट जाएगा। हांलांकि देखने में ख़ुशी कुछ नहीं मिलती उसे, तक़लीफ़ ही होती है कि दूसरी बच्चे किस उन्मुक्त भाव से खेल रहे हैं, और वह यहां इस कमरे में बंद है।

सरल ने ख़ुद ही बंद कर लिया है अपने-आपको। घरके अंदरवाले आंगन में भी थोड़ी धूप आती है, मगर वह वहां भी नहीं जाता। दूसरे घरों की छतें आंगन से लगीं हैं। वह डरता है कि अगर वे बच्चे अपनी छतों पर आ गए और उसे देख लिया तो उसपर हंसेंगे, चिढ़ाएंगे कि ‘देख, गांडू यहां छुपा बैठा है।’

घरके लोग परेशान हैं ; पिताजी सबसे ज़्यादा परेशान हैं कि आखि़र इसे हुआ क्या है? वे डांटते हैं, झिड़कते हैं, कभी-कभी प्यार से भी पूछते हैं कि क्या हुआ, क्यों नहीं घरसे निकलता। पिताजी के सामने पहले भी बोलना आसान नहीं था, दिन-प-दिन और मुश्क़िल होता जा रहा है। कभी-कभी पिताजी उन लोगों को भी ले आते हैं जो उन्हें अपने लगते हैं, समझदार और दुनियादार लगते हैं। वे लोग अपनी तरह से सरल को समझाते हैं। एक पूछता है, ‘क्या हुआ, किसीने चाकू-वाकू दिखा दिया क्या?’ दूसरा सरल को ज़बरदस्ती घर से बाहर ले जाने की कोशिश करता है।  सरल कभी खाट को तो कभी दरवाज़े को इतना कसके पकड़ लेता है कि उसे बाहर निकालना लगभग असंभव हो गया है। अंततः सब यही जानना चाहते हैं कि आखि़र एकाएक ऐसा क्या हुआ कि इसने ख़ुदको कमरे में बंद कर लिया।

सरल क्या बताए ? उसे ख़ुद कुछ ठीक से समझ में आए तो बताए भी। उसे नहीं पता कि क्या हुआ है। मगर यह ज़रुर पता है कि कुछ हुआ है, कुछ होता रहता है जो उसे लगातार परेशानी में डाले रखता है। लेकिन वह ठीक से बता पाने में असमर्थ है। बहुत बार उसे भी लगने लगता है कि वह ख़ामख़्वाह बहाना बना रहा है।

और फ़िर वही अपराधबोध जिसने शायद सरल के होश संभालने से पहले ही उसे जकड़ लिया है।

26-08-2013

(जारी)


22 अग॰ 2013

डर और डर की बातचीत



‘गोली मत मारना, मुझे कुछ बात......’

‘आहा, डरते हो, कुछ नहीं कर पाओगे जिंदग़ी में, डरपोक आदमी, हा हा हा .............’

‘हां डरता हूं, मुझे गोलियों में खेलने की आदत नहीं है भाई, पर उससे भी ज़्यादा मैं इसलिए डरता हूं कि तुम मुझसे भी ज़्यादा डरपोक हो। तुम डरके मारे, मुझे गोली मार दोगे और जो बात मैं करने आया हूं वो हो ही नहीं पाएगी।’

‘अरे वाह! तुम्हे घुसने क्या दिया, तुम तो सर पे ही चढ़ गए ; मैं कैसे डरपोक हूं!?’

‘तुम बातचीत से डरते हो। वरना बिना बातचीत किए गोलियां क्यों मारते फिरते हो? अभी आखि़री बार जिस आदमी को तुमने गोली मारी, उससे बात करने की कोशिश की क्या तुमने?’

‘वह आदमी इसी लायक था, मैंने उसे मार दिया, मैं बहुत ख़ुश हूं।’

‘मार दिया तो क्या तीर मारा ? तुम न मारते तो क्या वह मरता नहीं ? किसी ऐक्सीडेंट से मरता, बीमारी से मरता, वह क्या हमेशा ज़िंदा रहता !? रोज़ाना ही लोग मरते हैं। इसमें ख़ुश होने की क्या बात हुई ?’

‘मरते होंगे। लेकिन जैसे मैंने उसे मारा, लोगों को सबक मिलेगा, लोंग डरेंगे, उस आदमी के बताए रास्ते पर नहीं जाएंगे।’

‘डरे हुए लोग किसी भी रास्ते पर जाएं, उससे क्या फ़र्क पड़ता है?’ डरे हुए लोग फिर भी डरे हुए रहेंगे। तुम तो ख़ुद ही डरे हुए आदमी हो। तुम जिस रास्ते पर गए हो, क्या उसे तुमने ख़ुद चुना है? तुम्हे कैसे पता कि उसे मारने से लोग डर जाएंगे?’

‘मैं डरा हुआ नहीं हूं, मैं बलशाली आदमी हूं।’

‘बलशाली हो तो तुमने पहले उससे बात क्यों नहीं की ? तुम तो बात करने से भी घबराते हो। माफ़ करना, मगर सही बात यह है कि तुम कमज़ोर आदमी हो।’

‘किसीको मारना आसान काम नहीं है, मेरा ईश्वर मेरे साथ है इसलिए मैं यह कर सका।’

‘तुम ईश्वर को मानते हो ?’

‘बिलकुल मानता हूं। उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं हो सकता।’

‘तो फ़िर तुमने उस आदमी को मारा क्यों, ईश्वर पर छोड़ देते। तुमने तो यह साबित किया कि ईश्वर नहीं है। ईश्वर अगर तुम्हारे साथ है तो तुम लोगों को मारकर भाग क्यों जाते हो? ईश्वर तुम्हारे साथ है तो डरते किससे हो ? कलको तुम भी मरोगे, तुम क्या हमेशा ज़िंदा रहोगे !? या तुम्हे भी कोई मारेगा ; फिर कैसे तय करोगे कि ईश्वर किसके साथ है? तुमतो रहोगे ही नहीं, फिर कोई तय भी करेगा तो उससे तुम्हे क्या समझ में आएगा ?’

‘अबे.......तुम कहना क्या चाहते हो?’

‘जिनको तुम मार देते हो वे तो चले ही जाते हैं। फिर तुम्हारी बात समझता कौन है? अगर तुम्हारे पास समझाने के लिए कोई बात है तो समझाते क्यों नहीं! गोली क्यों मारते हो ? तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं है, इसलिए तुम लोगों को डराते हो।’

‘तो क्या करें, बिना डराए कोई मानता ही नहीं।’

‘डरा हुआ आदमी तो कोई भी बात मान लेता है। इससे तुम्हे यह कैसे पता लगता है कि तुम्हारी बात सही है या ग़लत ?’

21-08-2013


‘अरे भाई! बिना डराए कोई सामाजिक व्यवस्था चलती है क्या ? तुम तो कहोगे अपराधियों को भी मत पकड़ो, सबको ख़ुला छोड़ दो!’

‘मैंने कब कहा! लेकिन लोगों के अपराध और सज़ा तुम और मैं तय करेंगे !? कलको तुम कहोगे कि स्त्रियों को घरों में क़ैद रखने के लिए जो लोग छेड़खानी और बलात्कार करके डराते हैं, वो ठीक ही करते हैं ! तुम अपने बच्चों, दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोंसियों के साथ क्या करते हो !? वे तुम्हारी बात न मानें तो उन्हें गोली मार देते हो !? तुम्हे यह कैसे पता लगता है कि तुम्हारी ही बात सही है ?’

23-08-2013

‘अगर मैं कहूं कि ईश्वर गंदा है, घटिया है तो! गोली मार दोगे ?’

‘मार भी सकता हूं।‘

‘क्यों?’

‘मैं ईश्वर के खि़लाफ़ कुछ नहीं सुन सकता।’

‘क्यों? ईश्वर क्या सिर्फ़ तुम्हारा है ? जैसे हवा और पानी सबके हैं, जिसका जैसा मन आता है, इस्तेमाल करता है, वैसा ही तुम ईश्वर को बताते हो। मैं अपने हिस्से के ईश्वर से कुछ भी कहूं, तुम्हे क्या मतलब ? क्या ईश्वर पर तुमहारा कॉपी राइट है? कोई रजिस्ट्री करा ली है क्या तुमने ?’

‘मैं जिस ईश्वर की पूजा करता हूं उसके बारे में यह सब नहीं सुन सकता।’

‘तुम्हारे पूजा करने से मेरी भावनाएं आहत होतीं हैं, दिमाग़ तनाव से भर जाता है। तो क्या मैं तुम्हे गोली मार दूं? तुम ईश्वर का ठेका क्यों लिए बैठे हो आखि़र? क्या ईश्वर को तुमने बनाया है ?’

‘तुम पागल हो क्या ? ईश्वर को कोई कैसे बना सकता है ?’

‘अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा और मेरा ईश्वर एक ही है या अलग-अलग़ है ?

‘.................’

‘अगर अलग़-अलग़ है, तो मैं अपने ईश्वर से कुछ भी कहूं-सुनूं, तुम्हे लेना क्या ? अगर एक ही है तो अकेले तुम क्यों उसपर कब्ज़ा किए बैठे हो ? तुम कौन हो यह तय करनेवाले कि ईश्वर से दूसरे लोग क्या संबंध रखें, क्या बात करें, उसके बारे में दूसरों से क्या बात करें ? इसका ठेका तुम्हे किसने दिया ? इसको प्रमाणित करनेवाला कोई अथॉरिटी लैटर, कोई क़ाग़ज़-पत्तर, कोई सबूत हो तो दिखाओ !’

‘अरे मेरे पास इतना फ़ालतू वक्त नहीं है। मुझे बहुत काम है।’

‘काम नहीं है, असल बात यह है कि गोली मारना आसान काम है, क़ायदे की बात करना, समझदारी की बात करना, अहंकार छोड़कर बात करना आसान काम नहीं है। तुम आसान काम के आदी हो।’


24-08-2013


(जारी)

(एक काल्पनिक बातचीत)


15 अग॰ 2013

कौन है जो इस्तेमाल नहीं होता !



‘‘राखी बंधवा ले बेटा, बात माना करते हैं, देख बहिनों का कितना मन है, कितनी उदास हो रहीं हैं ; बंधवा ले बेटा।’’ मां कहती है।

सरल कसमसा रहा है भीतर ही भीतर मगर बोल कुछ भी नहीं पा रहा। वह समझ नहीं पा रहा कि जो कुलबुलाहट उसके भीतर है, वह सही है या ग़लत, कहे कि न कहे, जैसा वह महसूस करता है, ठीक वैसा ही कह भी पाएगा क्या ?

उसकी आंखों के सामने बार-बार वे कलाईयां आ जातीं हैं जिनमें राखियां बांधीं जानी हैं, वह ख़्यालों में भी नहीं देखना चाहता वे कलाईयां-वे पतली और सूखी कलाईयां जिन्हें देखकर ही उसे घबराहट होने लगती है। इन कलाईओं में कई-कई राखियां लटकेंगी, वह झल्लाता रहेगा, फ़िर आधेक घंटे बाद सबको उतार फ़ेकेगा। क्या इन कलाईयों से वह बहिनों की रक्षा करेगा! अपना तो कुछ कर नहीं पाता। कोई भी आता है, ग़ाली दे जाता है, कोई भी आता है, हंसी उड़ा जाता है, कोई भी आता है, सही साइड में साइकिल चलाते सरल को टक्कर मारकर गिराता है, साथ ही दो उपदेश भी सुना जाता है। घृणा और ग़ुस्से से भर जाता है सरल, मगर मुंह से बोल नहीं फूटता।

‘बंधवा ले बेटा, देख बहन ख़ुश हो जाएगी।’

सरल जैसे-तैसे संभालता है ख़ुदको, संभालते-संभालते फट पड़े तो भी कुछ पता नहीं।

‘क्या मेरी ख़ुशी का कोई मतलब नहीं, मुझे राखी बंधवाने से कोई ख़ुशी मिलती है या नहीं, यह जानने की कोशिश कोई क्यों नहीं करता ? मैं क्या कोई खंबा हूं जिसपर आप कुछ भी बांधकर चले जाएंगे? आखि़र ये लोग कभी सोचते क्यों नहीं ?

किसी साल बंधवा लेता है तो कोई साल यूं ही गुज़र जाता है। नहीं बंधवाता तो बहिनों और रिश्तेदारों को उदास और नाराज़ करने के अपराधबोध में जीता है, परंपरा तोड़ने के अपराधबोध में जीता है। बंधवाता है तो बंधवाने के एवज में उनके लिए कर क्या पाएगा के अपराधबोध और हीनभावना के साथ जीता है।

उसे क्या मालूम कि दुनिया एक-दूसरे को इस्तेमाल करने से चलती है। बाद में कभी उसे समझ में आएगा कि यहां तो लोग मोहरों और कठपुतलियों की तरह ही जी रहे हैं। कुछ ताक़तवरों के मोहरे बन गए हैं तो कुछ अपने ही जैसे आदमी की बनाई मान्यताओं और धारणाओं के ग़ुलाम हैं। ग़ुलामी भी इतनी गहरी कि आम आदमी तो क्या बड़े-बड़े लेखक-चिंतक भी इसे ही आज़ादी समझते नज़र आते हैं।

‘‘लड़की के भाई को बुलाओ।’’

जब भी किसी बहिन की शादी होती है, रस्मों-रिवाजों के बीच पंडित का फ़रमान आता है। वह इससे बचने की कोशिश करता है, मगर कब तक बचेगा। कोई न कोई ढूंढ निकालता है। वह थोड़ी-बहुत रसमों में हिस्सा लेता है, हंसी-मज़ाक़ करके किसी तरह उस भीड़ का हिस्सा बनने की कोशिश करता है। हांलांकि भरी भीड़ में अपने-आपको सामने ले आना फिर हंसी-मज़ाक भी कर लेना, यह उसके लिए कुछ आसान काम नहीं है।

‘कन्या का भाई कन्या के साथ पीछे-पीछे चलेगा’, पंडित कहता है। फेरे शुरु हो गए हैं। सरल अब बिदक जाता है।

‘कन्या का भाई’
‘कन्या का भाई’
‘कन्या का भाई’
‘कन्या का भाई’

क्या उसके होने का कुछ भी मतलब नहीं है ? क्यों नहीं उससे कोई पूछता कि तुम्हे ये रीति-रिवाज पसंद हैं या नहीं !! तुम इनमें शामिल होना चाहते हो या नहीं !? ये कैसी दुनिया है!? कैसे लोग हैं !?

‘‘मैं नहीं चलूंगा।’’

धीरे से ही सही, मगर वह बोलता है। जैसे-तैसे बोलता है। और क़रीबी लोग जानते हैं कि अब सरल को चलाने का एक ही तरीक़ा है कि इसको ज़बरदस्ती उठाकर चलाया जाए। बोलेगा नहीं मगर शरीर को अकड़ा लेगा और न चलने की पूरी कोशिश करेगा। हास्यास्पद दृश्य हो जाएगा।

दूसरे किसी भाई का इंतज़ाम किया जाता है।

अब वह कई दिन अपराधबोध में जिएगा।

लेकिन वह भी क्या करे ! कितनी चीज़ें हैं जो होतीं हैं, कुछ तो आए दिन होतीं हैं, कई बार वह भी करता है ; मगर उनका औचित्य उसे समझ में नहीं आता, उनमें कोई ख़ुशी उसे नहीं मिलती।

लड़कीवालों का दास भाव उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता। उसे ख़ुद भी इसका हिस्सा बनना पड़े तो और ज़्यादा तक़लीफ़ होती है। लड़केवाले जब-जब भी बहिनों को देखने आते हैं, उसकी मुसीबत हो जाती है। वह बचना चाहता है मगर.....

‘लड़की का भाई’
‘लड़की का भाई’
‘लड़की का भाई’
‘लड़की का भाई’

वे सब एक बार लड़की के भाई को देखना चाहते हैं। लड़की को पता नहीं उस वक्त कैसा महसूस होता है, मगर सरल को बिलकुल अच्छा नहीं लगता। वह क्या कोई वस्तु है !? लड़की के भाई का क्या करना है तुम्हे!? उसे क्यों अनचाहे ही इस अजीबो-ग़रीब सरकस का हिस्सा बनना पड़ता है बार-बार !? लड़की उसने पैदा भी नहीं की, न उससे पूछकर पैदा की गई है, न समाज की रसमें उसने बनाई, न उसकी ऐसी कभी इच्छा रही कि वह भी कभी ऐसे रीति-रिवाजों के दुष्चक्र में फंसे किन्हीं मजबूरों की मजबूरी का फ़ायदा उठाएगा ; फ़िर क्यों उसे जबरन इन जंजालों में घसीटा जाता है !?

15-08-2013

इन सब लोगों के लिए जैसे फूल है, जैसे माला है, जैसे मंडप है, जैसे कुर्सियां हैं, जैसे हवन-सामग्री है वैसे ही लड़की का भाई है। माला को किसीके गले में भी डाल दो, डल जाएगी, इनकार नहीं करेगी ; कुर्सी उठाकर कहीं भी रखदो, किसीको भी उसपर बिठा दो, मना नहीं करेगी ; मोमबत्ती को घिसकर कहीं भी चिपका दो, जला दो, पिघल जाने तक वहीं खड़ी फड़फड़ाएगी। ऐसे ही लड़की का भाई है।

कितने लोग आए हैं इस समारोह में। अलग़-अलग़ शक्लें, अलग़-अलग़ कपड़े, अलग़-अलग़ पेशे, अलग़-अलग़ ओहदे..........सब हंस रहें हैं, भाग-दौड़ कर रहे हैं, जो बता दिया गया, कर रहे हैं, इनमें लड़केवाले भी हैं, लड़कीवाले भी हैं...........मगर क्या वाक़ई इनमें कुछ फ़र्क है !? क्या इनमें एक भी आदमी ऐसा होगा जो सरल को समझ पाएगा ? सरल जानता है, कोई कहेगा कि ये तो है ही बिगड़ा हुआ, कोई कहेगा अकेला लड़का है, आदतें ख़राब हो ही जातीं हैं, कोई कहेगा, कोई ख़ास बात नहीं, शर्मीला ज़्यादा है.........मगर इनमें शायद एक भी आदमी ऐसा नहीं होगा जिसकी कल्पना में भी यह आ जाए कि यहां एक आदमी ऐसा भी है जिसकी इस सबमें कोई रुचि नहीं है, जो असहमत है, जो उलझन में है, परेशानी में है, खींचतान में है.........

ये तो सब हंस रहे हैं, ठहाके भी लगा रहे हैं........और गंभीर भी हैं। एक बड़ा काम निपट गया। एक आदमी का एक और बोझ सर से उतर गया। उसमें इन्होंने भी सहयोग किया, किसीने काम कराया, किसीने पैसे दिए, लिफ़ाफ़े दिए, किसीने रिश्ता कराया....

लेकिन....वह सोचता है.....इसे बोझ बनाया किसने !? बोझ बनाए रखना कौन चाहता है !? यही लोग। जो बता दिया गया, जो सिखा दिया गया, वही सब करते चले जाने के अभ्यस्त लोग।

आज सोचता है सरल.....ये डरे हुए लोग हैं, एक-दूसरे से भी बुरी तरह डरे हुए लोग......अकेले में भी कोई अलग़, कोई नया ख़्याल मन में आ जाता होगा तो घबरा जाते होंगे, वह ख़्याल किसी तरह चला जाए, मिट जाए ; इसकी कोशिश करते होंगे, गाने चला देते होंगे, टहलने निकल जाते होंगे, कसरत करने लगते होंगे......और सरल भी तो यही करता रहा एक वक्त तक......लेकिन अब वह जानता है कि अपने-आपसे, नये या अलग़ तरह के ख़्यालों से इस तरह भागोगे तो फिर बदलाव का रास्ता किधर से निकलेगा, प्रगतिशीलता क्या कोई पेड़ पर उगनेवाली चीज़ है......

.....और वह देखता है कि लोग बदलते भी नहीं, बदले हुए दिखते ज़रुर हैं। कल हवा जिधर को चल रही थी वे भी उधर चल रहे थे, आज हवा बदली वे भी ‘बदल’ गए। कल लड्डू और हलवे को पकड़कर बैठे थे, उसके बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता था। आज केक को पकड़ लिया। अब केक वक्त पर न आए तो बर्थडे मनानेवाले बर्थडे सेलिब्रेट हुआ ही नहीं मान पाते।

वैसे छोड़ा अभी हलवे को भी नहीं है। सामनेवाले हाथ में केक है, हलवा पीछेवाले हाथ में चला गया है। क्या मालूम कब हलवे की हवा फ़िर चल निकले। तो क्या फ़र्क पड़ता है। फ़िर ‘बदल’ जाएंगे ; सामनेवाले हाथ को पीछे ले जाएंगे, पीछेवाले को आगे ले आएंगे।

इसे प्रगतिशीलता कहें कि पैंतरेबाज़ी !?

मूल मानसिकता वही है।

पकड़कर बैठ जाने की मानसिकता।

(जारी)

16-08-2013


11 जुल॰ 2013

पितृसत्ता का पिता पाखण्ड

10/11-07-2013

राजधानी आए सरल को शायद साल-भर हुआ होगा, कॉलोनी की एक शांत सड़क पर दोस्त के साथ टहल रहा था कि-

‘ओए, ए’

एक कड़क और बुलंद आवाज़। पुलिस जैसी कद-काठी वाली एक स्त्री ने एक स्कूटर-सवार को रोका। लड़का-सा ही था। स्त्री तड़ातड़ शुरु हो गई, वह लड़के को तमाचे पर तमाचे मार रही थी, ग़ालियां दे रही थी और चिल्ला-चिल्लाकर कुछ इल्ज़ाम लगा रही थी-स्साल्ले को स्कूटर दे रखा है, सारा ख़र्चा उठाती हूं, घर दे रखा है, खाना देती हूं, सब देती हूं....साला फिर भी दूसरी लड़कियों के साथ घूमता है..........

लोग अवाक्, स्तब्ध देख रहे थे और सुन रहे थे....

कम-अज़-कम 8 साल तो हो ही गए होंगे इस घटना को। शब्द थोड़ा इधर-उधर होंगे मगर मंतव्य लगभग यही था। वह स्त्री बिलकुल वही बातें कह रही थी जो कोई मर्दवादी मर्द अपनी आश्रिता से कहता है।

सरल ने स्त्री-सत्ता भी देखी है जीवन में, अघोषित स्त्री-सत्ता। दरबार जैसा लगा है, पुरुष भी आ-आकर स्त्री से सलाह ले रहे हैं, स्त्री के फ़ैसले बड़ी गंभीरता से लिए जा रहे हैं। मगर स्त्री फ़ैसले क्या ले रही है? फ़ैसले वह वही ले रही है जो कोई भी रुढ़िवादी पुरुष लेता है। घर में अन्य स्त्रियों की हालत क्या है? वह भी रुढ़िवादी घरों जैसी ही है। फ़र्क कोई है तो इतना कि खाना-कपड़ा अच्छा मिल रहा है, दूसरों की उपस्थिति में थोड़ा-बहुत दूसरे पुरुषों से हंसा-बोला भी जा सकता है.....

सरल आजकल पितृसत्ता से नाराज़ स्त्रियों के स्टेटस वगैरह देखता है, एक दिलचस्प समानता वहां दिखाई देती है, उनमें से कई अकसर अपने पिताओं की तारीफ़ करती पायी जातीं हैं, मांओं के नाम भी कहीं-कहीं आ जाते हैं भूले-भटके.....

पिता हीरो हैं, पितृसत्ता से घृणा है! बात कुछ अजीब तो लगती है।

पिछले दिनों एक विज्ञापन भी देखता रहा सरल जिसमें एक लड़की अपने ब्वायफ्रैंड या फ़ियांसी को बता रही है-‘मैंने लड़कों को भी छेड़ा है।’

सरल को आज तक यह नहीं समझ में आया कि जो आप अपने प्रति ग़लत समझते हैं वही दूसरे से करके नायकत्व कैसे महसूस कर सकते हैं!? कह सकते हैं कि स्त्रियों की तो अभी शुरुआत है, थोड़ी-बहुत बदले की भावना तो रहती है मन में। चलिए यह बात यहां छोड़ी।

कुछ दिन पहले फ़ोन पर एक मित्र से बात हो रही थी, उसका कहना था कि जो महिला कुछ जुगाड़बाज़ी करके कैरियर बनाती है, संभवतः एक क़ाबिल महिला का हक़ तो छीनती ही है। बात को ज़रा खोल कर समझें-एक स्त्री किसी मर्द के साथ सोकर अपना काम निकालती है, ठीक है, किसीको क्या लेना-दो का आपस का मामला है। समस्या वहां से शुरु होती है जब वह स्त्री ख़ुदको भारी संघर्षशील और विद्रोही की तरह प्रोजेक्ट करती है। पुरुष तो यह काम पहले से ही कर रहा है; थोड़ा-सा फ़र्क़ यही है कि पुरुष आम-तौर पर इसे संघर्ष तो कहता है, विद्रोह से नहीं जोड़ता। और सरल ऐसा कहने में किसी माफ़ी की दरकार नहीं समझता कि भारत में ज़्यादातर मामलों में ऐडजस्टमेंट को ही संघर्ष कहा जाता रहा है। इस मामले में स्त्री और पुरुष के एक जैसे हाल हैं, होंगे ही। वजह है पाखण्ड की हमारी संस्कृति। मामला पितृसत्ता और मातृसत्ता का नहीं है-उससे कतई कोई समस्या हल होनेवाली नहीं है। असल जड़ तो पोंगे धर्म और पाखण्डी संस्कृति में छिपी है। कोई सत्ता ज़्यादा दिन अहंकार से मुक्त नहीं रहती, रह नहीं सकती। असल में तो अहंकारी को ही सत्ता की कामना और ज़रुरत ज़्यादा होती है। वरना सत्ता की ऐसी ज़रुरत भी क्या है!? जो भी घर में क़ाबिल हो उसे कामचलाऊ सत्ता दे दी जाए-चाहे वह पुरुष हो चाहे स्त्री। सही बात तो यह है कि समानता जब आ जाएगी तो घर को किसी मुखिया की ज़रुरत होगी भी क्यों!?

अभी एक आंदोलन हुआ जिसमें एक वृद्ध सज्जन बार-बार कहते कि ‘नेता हमारे मालिक़ नहीं है, अरे मालिक तो हम हैं, तुम्हे तो हमने नौकर बनाके भेजा था....

सुनने में ऐसे डॉयलॉग अच्छे बहुत लगते हैं मगर व्यवहार में सोचें तो इस तरह के नुस्ख़े परिवर्त्तन के वाहक नहीं हो सकते। अरे, जब मालिक़ होना बुरी बात है तो तुम्हे भी क्यों होना चाहिए मालिक़!?

इस तरह की बातें समानता का आधार नहीं हो सकतीं!

12-07-2013

सरल अपने अनुभव से देखे तो यह बिलकुल भी ज़रुरी नहीं है कि बेटियों को बढ़ावा देनेवालें मां-बाप प्रगतिशील ही हों। कतई नहीं। मामला कुछ और ही है। बात यह है कि मां-बाप को चाहिए सफ़ल औलाद, दुनियादार औलाद, झट से काम निकाल के ले आनेवाली औलाद। और एक बेईमान और पाखण्डी समाज में काम निकालने के लिए भी, और कथित सफ़लता के लिए भी, आपको वैसा ही होना पड़ेगा जैसा समाज है। और अगर बेटी वैसी निकल आए तो पिता का प्यार उधर को शिफ़्ट होने लगता है। तब और भी ज़्यादा होता है जब उसे बेटे का वैसा न हो पाने का ग़म साल रहा हो।

दो पिता तो सरल को सफ़र में ऐसे मिले हैं जिन्होंने पहली बार की मुलाक़ात में ही बेटी की तारीफ़ और बेटे की बुराई शुरु कर दी।

और ऐसे पिता बेटों के साथ वही दुर्व्यवहार शुरु कर देते हैं जो वे अब तक बोझ लगनेवाली बेटियों के साथ करते आए होते हैं। ज़ाहिर है कि यहां बेटियों को ऐसे पिता महान नज़र आते हैं। साधारण बुद्धि का आदमी तो सीधा गणित जानता है। कि जो मेरा फ़ायदा करा रहा है वह अच्छा आदमी है, महान शख़्सियत है। मुझे उसकी तारीफ़ करनी चाहिए।

और सरल को कोई हैरानी नहीं होगी अगर कलको लोग बेटा पैदा होते ही उसे ज़मीन में गाड़ दिया करें। सवाल बेटे-बेटी का है ही नहीं। पेंच तो यह है कि एक स्वार्थी, लालची, पाखण्डी और अंधा समाज ख़ुदको त्यागी, अध्यात्मिक, सामाजिक और न जाने क्या-क्या माने बैठा है। और जिस एकमात्र पड़ोसी या पुराने भाई से वह रोज़ाना लड़ता फिरता है, वह धर्म संस्कृति के मामले में उससे भी दो हाथ आगे है, सवा सेर है।

सोए हुए लोगों के हाथ जनजागरण का उस्तरा लग जाए तो कुछ भी संभव है।

14-07-2013

झूठ बोलने से समस्याएं हल नहीं होतीं। वे समस्याएं तो बिलकुल भी हल नहीं होतीं जो पैदा ही झूठ की वजह से हुई हों। झूठ से लोग ख़ुश ज़रुर हो जाते हैं, झूठे लोग और जल्दी ख़ुश होते हैं। आप स्त्रियों से उनकी अंधाधुंध तारीफ़ करें, ज़्यादातर ख़ुश होंगीं। कई तथाकथित नारीवादियों को सरल देखता है, वे यही करते नज़र आते हैं। नारीवाद का कोई विपरीत तार्किक विश्लेषण देखते ही वे भड़क जाते हैं। या शायद भड़क जाने का अभिनय करते हैं। इन्हें देखकर कई बार उन छोकरों की याद आती है जो पीछे तो लड़कियों की मां-बहिन करते मगर सामने उनकी पलक, आंख, नाक, आवाज़, अंदाज़, संस्कार और न जाने किस-किसकी आरती जैसी उतार देते। ज़ाहिर है कि इस आरतीनुमा से लड़कियां जल्दी प्रभावित हो जाया करतीं और जल्दी क़रीब आ जाया करतीं।

मगर क्या इस तरह के नुस्ख़े औरतें की समस्याएं जल्दी सुलझा देंगे!?

थोड़ा-सा ईमानदार होकर हमें देखना चाहिए कि बच्चों के प्रति हमारा नज़रिया क्या रहा है! बच्चे कोई बच्चों की ख़ुशी के लिए नहीं पैदा करता। निस्वार्थ भाव से भी पैदा नहीं करता। यह ठीक है कि मां-बाप छोटे बच्चों का बहुत ध्यान रखते हैं, पैसा ख़र्च करते हैं, समय देते हैं, करज़ा लेकर पालते हैं, रात-रातभर जाग-जागकर पालते हैं, सब सही है। मगर यह भी सही है कि जिस दिन मां-बाप को लगता है कि बच्चे से वह नहीं मिला जिसकी उन्हें अपेक्षा थी, उनका व्यवहार बदलने लगता है। बेटे-बेटी में छोड़िए, वे बेटे-बेटे में और बेटी-बेटी में भी भेद करते हैं। अगर निस्वार्थ पैदा करने की बात सही होती तो कैसे कोई बेटियों को मार डालता या उनसे दुर्व्यवहार करता!? स्त्रियों से मां-बा पके इस दुर्व्यवहार की वजह!? उनसे उनके स्वार्थ नहीं पूरे होते। जहां-जहां हो रहे हैं, लड़कियां भी नाम कर रही हैं, प्रतिष्ठा बढ़ा रही हैं, पैसा ला रही हैं, मां-बापों का ‘प्रेम’ उनपर ‘उमड़’ रहा है। आसानी यह भी हो गयी है कि सामाजिक माहौल अब थोड़ा-थोड़ा इस प्रेम को भी स्वीकृति दे रहा है।

मगर विश्लेषण की बात यहां यह है कि क्या यह वाकई प्रेम है!? क्या यही प्रगतिशीलता भी है!?

(जारी)


-संजय ग्रोवर


.......

3 फ़र॰ 2013

प्रसिद्ध व्यक्ति से एक अनपेक्षित बातचीत




‘हलो! आगे कहां निकले जा रहे हो?’
‘कमाल है! जहां मुझे जाना था वहीं जा रहा हूं।’
‘हाथ क्यों हिलाया था मुझे देखकर ?’
‘किसने हिलाया? चलते वक्त मेरा सारा ध्यान तो अपने शरीर का संतुलन बनाने में ही लगा रहता है! आपको ग़लतफ़हमी हुई है ; मच्छर-वच्छर उड़ाया होगा या अपने बाल ठीक कर रहा होऊंगा।’
‘आपने पहचाना नहीं मुझे!?’
‘पहचानने की बात ही कहां से आई!?’
‘अरे भाई! मशहूर आदमी हूं, हर कोई जानता है।’
‘मैं नहीं जानता।’
‘ओह! चलिए एक-एक कप चाय हो जाए।’
‘देखिए, मुझे दूसरे काम हैं। और साफ़ बता दूं कि चाय पीकर मैं आपकी तारीफ़ करुं, ज़रुरी नहीं....
‘अरे आप बैठिए तो! देखिए सभी लोग मेरी तरफ़ देख रहे हैं।’
‘.............................’
‘वह देखिए, वेटर सारी टेबल छोड़कर हमारी तरफ़ आ रहा है।’
‘ग़लत बात है। जो लोग पहले आए हैं उन्हें पहले अटैंड करना चाहिए।’
‘आप प्रसिद्धि से प्रभावित नहीं होते!?’
‘कितने प्रसिद्ध हैं आप? कितने लोग जानते हैं आपको?’
‘हुम.....।  मुश्क़िल सवाल है.....किसी भी हाल में पचास हज़ार से कम तो नहीं जानते होंगे।’
‘कहां से आया ये आंकड़ा आपके पास? प्रामाणिकता क्या है?’
‘........बस, अंदाज़न......
‘मेरे चाचा एक लाख प्रशंसकों वाले आदमी को प्रसिद्ध मानते हैं।’
‘उनकी कसौटी पर भी मैं पचास प्रतिशत सफ़ल तो हूं ही।’
‘मेरे मामा दो लाख वाले को प्रसिद्ध मानते हैं, उनके हिसाब से आप पच्चीस प्रतिशत हैं। मेरी कज़िन चार लाख वाले को मानती है, उसके हिसाब से आपकी अभी शुरुआत है। मेरा दोस्त आठ लाख वाले को मानता है, उसके हिसाब से आप अभी हो ही नहीं। मेरा.....
‘दिलचस्प आदमी हैं आप! चाय लीजिए। साथ क्या लेंगे?’
‘अब मैं चलूं क्या?’
‘कमाल है! आपको रत्ती-भर दिलचस्पी नहीं!?’
‘थोड़ी बची है; लगता है जल्दी ख़त्म हो जाएगी। वैसे आप प्रसिद्ध क्यों हुए?’
‘मुझे सामान्य आदमी होने से नफ़रत है।’
‘आपके प्रशंसकों में कई सामान्य लोग होंगे। उनसे भी नफ़रत है ?’
‘नहीं! आप समझे नहीं.....
‘आप समझे ?’
‘मतलब मेरे ज़्यादातर काम घर बैठे हो जाते हैं.....’

‘यह असभ्यता, अन्याय और बेईमानी के लक्षण हैं। आपकी वजह से कई लोगों के जायज़ काम रोक दिए जाते होंगे, उन्हें चक्कर लगाने पड़ते होंगे........आप अच्छा नहीं कर रहे.....आप समाज को पीछे ले जा रहे हैं....एक सभ्य समाज और देश में सभी लोगों के काम एक जैसे क़ायदे-क़ानूनों के तहत होने चाहिए, भले वे प्रसिद्ध हों, नाप्रसिद्ध हों या कुछ और हों।’
‘आप ख़ामख़्वाह सबको एक ही डंडे से हांक रहे हैं।’
‘मुझे ज़रुरत नहीं ; ज़्यादातर मशहूर लोग हंके ही होते हैं। रुढ़िवादी समाजों में आप प्रसिद्धि की तरफ़ बढ़ते ही तभी हैं जब ख़ुदको कुछ तयशुदा सामाजिक डंडो से हंकवाना मंज़ूर कर लेते हैं।’
‘मतलब?’
‘जैसे अकसर किसी भी प्रसिद्ध आदमी को आप मीडिया के खि़लाफ़ बोलता नहीं पाएंगे, धर्म के खि़लाफ़ बोलता नहीं पाएंगे...... किसी कुरीति, किसी अंधविश्वास, किसी बेईमानी पर भाषण देता पायेंगे भी तो व्यक्तिगत स्तर पर उनका विरोध करता नहीं पाएंगे बल्कि उन्हें ऐसे अवसरों पर ख़ुशी-ख़ुशी शामिल होता देखेंगे।’
‘आप क्या समझते हैं, सभी नास्तिक होते हैं!?’
‘पहली बात तो यह कि मेरी बात का संबंध नास्तिकता से नहीं, बदलाव से है, प्रगतिशीलता से है। दूसरे, प्रसिद्धि तो एक क़िस्म की ऐसी मिनी भगवत्ता है जिसे पाने को नास्तिक भी लालायित रहते हैं।’
‘आप तो बाल की ख़ाल निकालने में विशेषज्ञ मालूम होते हैं!’
‘थोड़ा तोतारटंत और पूर्वाग्रहों को परे रखें और सोचें कि आदमी आखि़र प्रसिद्ध होना क्यों चाहता है! इसीलिए न कि सब उसे जानें, नमस्कार करें, हाथ हिलाएं, ऑटोग्राफ़ मांगें, कहें कि अरे साहब आज तो चींटी के घर भगवान आ गए! या कहें कि कितने लोग आपको जानते हैं फिर भी आप कितने विनम्र हैं! या कहें कि अरे आपको ख़ुद आने की क्या ज़रुरत थी, बोल भर दिया होता, आपका काम हो जाता। लब्बो-लुआब यह कि आप औरों से कुछ अलग़ हैं, कुछ ऊंचे हैं। यह अहंकार नहीं तो क्या है? आप औरों से अलग़ क्यों दिखना चाहते हैं? आपको कैसे मालूम कि आपके प्रसिद्ध होने से समाज का भी कुछ जायज़ फ़ायदा होता है? यह बात अलग़ है कि आप अपने किसी सोर्स से चार काम उल्टे रास्ते से अपने कुछ दोस्तों-रिश्तेदारों के भी करवा दें पर अंततः तो आप जुगाड़वाद को ही बढ़ावा दे रहे होते हैं। नियम भंग करना ही सिखा रहे होते हैं।’
‘आप लस्सी पीएंगे? यहां की लस्सी मशहूर है।’
‘पी चुका हूं। लस्सी वाक़ई अच्छी बनाते हैं। कोई चीज़ अच्छी है इसलिए मशहूर हो जाए, इसमें मैं कतई बुराई नहीं मानता। मगर कोई चीज़ मशहूर है इसलिए हम उसे अच्छा कहने लगें, इससे पता लगता है कि हमने एक ऐसा समाज बना लिया है जहां लोगों की अपनी व्यक्तिगत राय रखने की हिम्मत ख़त्म हो गयी है या व्यक्तिगत रुचियां विकसित होना या बनाए रखना असंभव हो गया है। यह और भी अजीब है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। एक मशहूर आदमी एक दिन नास्तिकता के गीत सुनाकर महफ़िल लूट लेता है। किसी दूसरे दिन वही आदमी अपनी किसी सामाजिक और आर्थिक सफ़लता की ख़ातिर मजमा लगाकर किसी पूजास्थल में चला जाता है। अगर कोई मीडिया, कोई बुद्धिजीवी, कोई आम आदमी इस दोहरेपन पर सवाल नहीं उठाता तो इसे क्या कहेंगे आप!? मुझे तो यही लगता है कि या तो वह समाज सोचने की क्षमता खो चुका है या सवाल करने का साहस खो चुका है। वह समाज उस व्यक्ति की या तो प्रसिद्धि से आक्रांत है या भक्ति में लीन है। मुझे लगता है ज़्यादातर लोग प्रसिद्ध होना भी इसीलिए चाहते हैं कि वे अपने आस-पास भक्तों की क़तार चाहते हैं जो उनके किसी भी कृत्य पर उंगली न उठाएं, उनके हर किए को भक्तिभाव से ग्रहण करते जाएं।’
‘मगर हमारे समाज में ऐसे लोग कम नहीं हैं जो मशहूर होना चाहते हैं।’
‘निश्चय ही। यहां कोई भी आम आदमी नहीं होना चाहता, सब डरते हैं। कोई भी अपना काम कराने को उस लाइन में नहीं लगना चाहता जहां उसका गांव का पुराना दोस्त भोला भी खड़ा है, जहां उसके घर में काम करनेवाली बाई मुनिया भी खड़ी है। उनके साथ खड़ा होने में उसे इसलिए डर लगता है कि उसे कुछ नीचा न समझ लिया जाए। इससे भी पहले उसे यह डर भी होता है कि उसे लाइन में खड़ा होने की वजह से नीचा न मान लिया जाए। यहां हर आदमी थोड़ा-थोड़ा राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री होना चाहता है मगर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से वह उम्मीद करता है कि वे आम आदमी की तरह व्यवहार करें।’
‘बुरा मत मानिएगा, आपने कभी प्रसिद्ध होना नहीं चाहा!?’
‘बिलकुल चाहा। ख़ूब चाहा। मगर आज मैं ईमानदारी से अपने अंदर झांकू तो साफ़ कह सकता हूं कि जितना ज़्यादा मैं ख़ुदको हीन भावना से ग्रस्त, अपमानित और उपेक्षित पाता था उतनी ज़्यादा मेरे अंदर प्रसिद्धि की चाहत बढ़ती जाती थी। प्रसिद्धि की इस चाहत में कहीं न कहीं उन लोगों से बदला लेने या नीचा दिखाने की मानसिकता भी काम करती थी जिन्होंने मुझे अपमानित और शोषित किया था।’
‘तो ?’ 
‘फ़िर मैंने पाया कि ऐसे लोग कहां नहीं है! जिनके बीच मैं प्रसिद्ध होना चाहता हूं, जिनके सहारे मैं प्रसिद्ध होना चाहता हूं, उनमे से कितने लोग उस मानसिकता से अलग़ हैं!?’
‘....और तब आपके अंदर से मशहूर होने की हसरत ख़त्म हो गयी?’
‘नहीं। मगर अब मैं जानता हूं कि प्रसिद्धि मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि और अहंकार की तुष्टि से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकती। इसे समाज की छाती पर अपने तमग़े की तरह टांकने का कोई अर्थ नहीं। प्रसिद्धि के जो तौर-तरीक़े अपने यहां चलन में हैं उनसे समाज के कुछ नुकसान हों तो हों, फ़ायदे तो ना के बराबर नज़र में आते हैं।’ 
‘आपको कहीं जाने की जल्दी थी! कुछ दूसरा काम करना था?’
‘अब नहीं हैं। सोचता हूं पहले आपका काम ही ठीक से कर लूं।’
‘आप शायद व्यंग्य कर रहे हैं!’
‘हां, कर रहा हूं, मगर किसी बुरी नीयत से नहीं कर रहा। जैसे कि मैं बात कर रहा था हांकने की, हंकवाने की। आप देखिए कि किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि आखि़र तय कैसे होती है, कौन-से पैमाने हैं और तय कौन करता है ? कुछ बड़ेे अख़बार, कुछ मीडिया चैनल, गांव-शहर के कुछ शक्तिशाली गुट......ये मान्यता देते हैं किसी व्यक्ति को कि हां, यह प्रसिद्ध व्यक्ति है या प्रसिद्ध होने लायक व्यक्ति है। और वह प्रसिद्ध या प्रसिद्धि का आकांक्षी व्यक्ति उस मान्यता को स्वीकार करके उसे मान्यता देता है। अगर वह इस मान्यता को अस्वीकार करदे तो उसका आगे का रास्ता मुश्क़िल हो जानेवाला है। क्योंकि अहंकार से जने और सने ऐसे गुट यह बर्दाश्त नहीं कर पाते कि कोई उनके खि़लाफ़ या अलग़ जाकर नाम कर ले। बजाय उसके रास्ते से हट जाने या या उसका सहयोग न करने के ये उसका विरोध शुरु कर देते हैं। कई बार बदनामी करने या अफ़वाहें फ़ैलाने तक पर उतर आते हैं। सवाल यह है कि किसने इन चैनलों को यह मान्यता दी है कि ये किसीको प्रसिद्ध या सफ़ल होने का तमग़ा दें!? क्या इन चैनलों में बैठे लोग आसमान से उतरे हैं? चूंकि एक क़िस्म की सत्ता इनके हाथ लग गयी है इसलिए इनके हर कहे-किए को सर-आंखों पर रखा जाए!? अगर सत्ता को ही सब कुछ मानना है तो फ़िर राजसत्ता को इतनी ग़ालियां देने का क्या अर्थ हुआ? यानि जो सत्ता आपको माफ़िक आती है, मौक़ापरस्ती बरतते हुए उसे ही आप अपना लेते हैं। न हो तो अपनी सत्ता खड़ी कर लेते हैं और ख़ुद भी दूसरों को मान्यता देना शुरु कर देते हैं।’
‘बोलते रहिए’
‘आप सुनते रहिए। सुनिए कि अकसर मशहूर व्यक्ति को किसी दल, किसी वाद, किसी धारा, किसी जाति, किसी वर्ण, किसी गुट से ख़ुदको हंकवाना पड़ता है। जब तक वह ख़ुदको हंकवाता रहता है उसे लगभग बेशर्त्त समर्थन मिलता रहता है। मगर जिस दिन वह ज़रा-सा इधर-उधर होता है, मुश्क़िल में पड़ जाता है। उसका कृतित्व जो कल तक उसे अमर बनाने लायक माना जा रहा था, आज दो कौड़ी का सिद्ध किया जा सकता है।’

(जारी)
-संजय ग्रोवर

14 मार्च 2012

बच्चे, तेरे बड़ों की घुट्टी में क्या है!?


सरल को ठीक-ठीक नहीं मालूम कितना बड़ा बच्चा था, नार्वे की संस्कृति क्या है, वहां की सरकार सिर्फ़ दूसरे देशों के बच्चों को उठाती है या अपने देश के बच्चों को भी, बच्चों की परवरिश के लिए किस तरह के इंतज़ाम वह करती है ? मगर सरल के लिए यह जानना मीठी-सी हैरानी की तरह है कि दुनिया की कोई सरकार बच्चों की परवरिश के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर इस क़दर गहराई और ज़िम्मेदारी-भरा नज़रिया अपनाने की कोशिश करती है। उस नज़रिए को समझने का सबका अपना-अपना नज़रिया हो सकता है, होना चाहिए भी।

मगर यह जो हिंदी न्यूज़-चैनलों पर चला कुछ दिन, यह क्या था ? क्या राष्ट्रवादी, कया मार्क्सवादी, क्या समाजवादी, क्या नारीवादी......जिसे देखो भारतीय संस्कृति के पक्ष में दे-दनादन दंड पेल रहा है। जैसे गप्प मारने की कोई प्रतियोगिता चल रही हो......झूठ के पक्ष में कोई सेमिनार बुलाया गया हो....

नार्वे में बच्चों के साथ क्या होता है, यह तो सरल को पता नहीं, लेकिन अपने देश का तो पता है ना। झूठ नं. एक है कि यहां बच्चों को निस्वार्थ भाव से पाला जाता है। लड़के और लड़की के बीच फ़र्क, लड़की को पैदा होने से पहले या बाद में मार डालना-यह निस्वार्थ भाव है ! या लैंगिक विकलांगों, समलैंगिकों और कथित नाजायज़ बच्चों को अपने से काटकर ऐसे फ़ेंक देना जैसे कोई घर का कूड़ा भी न फ़ेंकता हो---यह निस्वार्थ भाव है !  पालना तो छोड़िए, ज़रा सोचिए कि बच्चों के पैदा होने के मुख्य कारण क्या हैं ? कि वंश चलता रहे, कि स्त्रियां मां बने बिना अधूरा महसूस करतीं हैं, कि दादी जल्द से जल्द पोते का मुंह देखना चाहती है, कि यौनानंद के चरम-क्षणों में लापरवाहियां और गड़बड़ियां हो जाती हैं!
इस सारी कवायद में बच्चे का पक्ष कहां है ? बच्चे से कौन पूछता है कि तुम होना चाहते हो या नहीं !? बच्चे की कोई च्वॉइस ही नहीं है कि किस घर में पैदा होगा, किस देश में जन्मेगा, कैसे माहौल में आंखें खोलेगा, कौन महान आत्माएं उसे पालेंगी, कौन-से धर्म-संस्कृति उसपर थोपे जाएंगे.......

एक नन्हीं-सी जान, एक बेसहारा मासूम, हाथ लगाओ तो हड्डियां किड़किड़ करतीं हैं जिसकी, आपके सिवाय और कोई भी नहीं है सारी दुनिया में उसका.......दर्द हो, भूख लगे, ठंड लगे......सिवाय रोने के दूसरी कोई भाषा नहीं जानता वह.....कैसी बेबसी महसूस करता होगा.....पर हमें क्या! हमें तो जब मन करेगा उसे प्यार करेंगे, पुचुर-पुचुर ज़ोर-ज़ोर से चूमेंगे और ज़रा हमारा मूड ख़राब हुआ कि चढ़ दौड़ेंगे उसपर। बाहर पड़ोसी की किसी हरक़त पर झल्लाए हुए हैं और कहर टूट रहा है बच्चे पर। वह मासूम शायद अभी यह सोचने लायक भी नहीं हुआ है कि सोचे कि इस विकृत चीख-पुकार का निशाना मैं ही क्यों बनता हूं आखि़र ? मेरा इससे लेना-देना क्या है ?

चलिए, बच्चा आपका है, आपने पैदा किया है, भारी क़िला फ़तह किया है, आपका पूरा हक़ है उसे जैसे चाहें पालिए, जैसी चाहें परंपराएं थोपिए, रीति-रिवाज कराईए, अपनी पसंद की पढ़ाई पढ़ाईए...और इस सारी घोंटा-घोंटी के बाद वह कथित तौर पर सफ़ल हो जाए तो सौ फ़ीसदी आपका ही बच्चा है, और जो न हुआ तो फ़िर न जाने किस पर गया है डफ़र......

लेकिन कहावतें, मुहावरे, जुमले ! इनका क्या करें ! कि बच्चे भगवान का रुप होते हैं। अच्छा जी! तो जब सफ़ाई कर्मचारी बच्चा आता है तो क्यों इस कहावत का पवित्र प्रभाव कपूर की तरह ग़ायब हो जाता है!?
अगर कोई खोजे तो इन विचित्र कथनों में सारा का सारा गणित साफ़-साफ़ दिखाई देता है। कि जो बच्चे मां-बाप का आदर नहीं करते, कभी तरक्क़ी नहीं कर पाते। मायने ? अगर मां-बाप का आदर करने से भी तरक्क़ी न मिले तो ? तो क्या उनका आदर करना छोड़ दिया जाए !? तरक्क़ी मिलेगी इस लिए आदर करो। तिसपर तुर्रा यह कि इसे निस्वार्थ भाव से किया गया कृत्य भी कहो।

तो जनाबे-आली! पाल दिए आपने बच्चे, सब निपटा दिए बढ़िया से। अब इसका क्या करें कि इनमें से कुछेक कवि, शायर, कलाकार वगैरह भी हो जाते हैं। ये सब संस्कृति की घुट्टी घोंट कर आए हैं। तो चल रहे हैं मां की तारीफ़ में दोहे, छंद, शेर........भरे जा रहे हैं पोथन्ने। क्यों भाई ? जो लोग औरत की शान में दिन-रात चुटकुले बरसाते हैं, उनका मां पर इतना प्यार आखि़र क्यों उमड़ा आ रहा है !? बात तो है ज़रुर कुछ! बात यह है कि मां लगी है सुबह से शाम तक इनके पोतड़े धोने में। इनके लिए घण्टो घिसट-घिसट कर हलवे बना रही है। ये घूम रहे हैं अपनी महबूबाओं के साथ, आवारगी चल रही है बाअदब। अब ज़रा पूछिए कि मां इंसान नहीं है क्या? अगर वो भी हफ्ते में एकाध दफ़ा निकल जाए अपने पुरुष-मित्रों के साथ फ़िल्म-विल्म देखने तो? क्या तब भी उतने ही क़सीदे काड़े जाएंगे माता जी के !?

यूं झूठ के प्रत्युत्तर में झूठ पैदा होता है।

सच का सामना-1 तो सरल नहीं देख पाया पर सच का सामना-2 ज़रुर देखने को मिल गया। एक एपीसोड में एक महिला अपने पति और बेटे के सामने दूसरे मर्दों से संबंधों और फ्लर्टिंग की बात स्वीकार कर रही थी। पति कुछ परेशान ज़रुर दिखता था पर बेटा एकदम सहज दिख रहा था।

क्या यह सहजता किसीको असहज कर रही थी ! पता नहीं।

अगले एपीसोड देखने को नहीं मिले। शायद बंद हो गया।

बेचैन बच्चों को तसल्ली देने के लिए फ़िलहाल मेरे पास शादाब लाहौरी के इस शेर के अलावा कुछ नहीं है -

ये मेरे ख़्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिन
अब आ गया हूं तो दो दिन क़याम करता चलूं


नार्वे सरकार बच्चों के पालन-पोषण के लिए क्या करती है, यह जानने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें -

क्या कहता है नॉर्वे का क़ानून ?


-संजय ग्रोवर