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22 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-7

(पिछला भाग)


आजकल जगह-जगह सुनने को मिलता है कि औरतें तो समझदार हो गईं हैं अब तो बस मर्द को बदलना है।
क्या वाक़ई ऐसा है? क्या हम ज़रा-सा सच सुनने या पढ़ने को तैयार हैं ? वे कौन औरतें हैं जो यह सुनकर ख़ुश हो रहीं हैं कि ‘हर औरत का सम्मान करना चाहिए’ या ‘मैं स्त्रियों का बड़ा सम्मान करता हूं......’

झूठी तारीफ़ सुनकर ख़ुश हो जाना स्त्रियों और पुरुषों दोनों की कमज़ोरी है। मगर हर किसी का सम्मान करना क्या व्यवहारिक रुप से संभव है ? क्या स्त्रियां स्वयं सभी स्त्रियों का सम्मान कर सकतीं हैं ? क्या पुरुष सभी पुरुषों का सम्मान करते हैं ? क्या सम्मान इतनी सतही और सस्ती चीज़ है ?

अगर ‘मैं सभी स्त्रियों का सम्मान करता हूं’ जैसे जुमले छोड़नेवाले लोग बहुत महान और स्त्रीवादी हैं तो वे कौन लोग थे जो ‘स्त्रियां त्यागी होतीं हैं’, ‘स्त्रियां संतोषी होतीं हैं’, ‘स्त्रियां समर्पिता होतीं हैं’ जैसे झांसे दे-देकर स्त्रियों से सालोंसाल मुफ़्त में काम निकालते रहे? और वे कौन लड़के थे जो लड़कियों को ‘फंसाने/पटाने’ के लिए कैसा भी झूठ बोलने को तैयार रहते थे ? क्या ये सब स्त्रीवादी थे ?

अगर आप किसीसे ज़बरदस्ती आदर लेंगे, उसपर अपनी इच्छाएं थोपेंगे तो क्या वह आपसे ख़ुश होगा? ख़ुद स्त्रियां जिन्हें ज़बरदस्ती मर्द का आदर करना पड़ा, अब मौक़ा मिलते ही मर्दों को भर-भरके ग़ालियां दे रहीं हैं।

और ज़बरदस्ती के इस 'स्त्री-सम्मान' के परिणाम भी कुछ अलग़ होंगे, मुश्क़िल ही लगता है।

आखि़र आप ख़ामख्वाह हर किसीसे सम्मान चाहते ही क्यों हैं ? ऐसा क्या कर दिया आपने ? अगर कोई आपका सम्मान नहीं कर रहा तो इसका मतलब यह कैसे हुआ कि वह आपका अपमान या नुकसान कर रहा है ?

उसे लगता है कि जिस भी किसीको, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, अकारण ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से सम्मान पाने की चाह है, उसे एक बार मनोचिकित्सक से भी मिल लेना चाहिए।

क्या वे स्त्रियां भी समझदार हो गईं हैं जो स्त्रीविरोधी कॉमेडी शोज़ में पूरे उत्साह के साथ शामिल होतीं हैं !? यह कैसी समझदारी है कि आपकी स्त्रीमुक्ति में जागृति सिर्फ़ वहां-वहां उभरकर आती है जहां कुछ बोलने में कोई ख़तरा नहीं है!? या जिन लोगों/वर्गों/वर्णों को जलील करना आसान है, जिनका उपहास लोग इस तरह करते आ रहे हैं जैसे उन्हें उपहास के लिए ही बनाया गया हो, उन्हींके सामने एकाएक आपमें सारी नारीमुक्ति जागृत हो जाती है ? इसकी एक वजह है कि भारत में स्त्रियां अकसर धार्मिक हैं इसलिए जातिवादी भी हैं। एक दिन उसने अथीज़्म शब्द यूट्यूब में डालकर सर्च किया तो पाया कि अच्छी-ख़ासी मात्रा में  दुनिया-भर की स्त्रियां नास्तिकता पर खुलकर चर्चा करतीं हैं जबकि भारतीय पुरुषों तक के वीडियो वहां गिनी-चुनी मात्रा में हैं।

क्या वे स्त्रियां भी समझदार हैं जो हर वक्त सारा दोष पुलिस और नेताओं को देतीं हैं? क्या उन्हें इतना भी नहीं पता कि ऐसी क़िताबें जिनमें ‘एक मर्द की गवाही दो औरतों के बराबर होती है’, पुलिसवालों ने नहीं लिखी ? क्या उन्हें यह नहीं पता कि आज तक ऐसी कोई घटना देखने में नहीं आई जहां किसी नेता ने किसी आम आदमी को दहेज़ लेने या देने को मजबूर किया हो ?

आजकल कई जगह यह भी पढ़ने में आ रहा कि पुरुष बड़े बदतमीज़ हैं, वे रास्तों पर हमारे क्लीवेज़ देखने लगते हैं। हो सकता है बहुत-सी स्त्रियों ने क्लीवेज का फ़ैशन सिर्फ़ स्त्रियों को दिखाने के लिए अपनाया हो, मगर यह जानने में कोई बुराई नहीं है कि देखना, घूरना, छेड़ना और बलात्कार करना सब अलग़-अलग़ बातें हैं। किसी व्यक्ति या ऑबजेक्ट के किसी हिस्से को हमें देखना चाहिए या नहीं देखना चाहिए, यह निर्णय भी तो आप तभी लेंगे जब एक बार देख लेंगे। क्या स्त्रियां अच्छे मसल्स् या सिक्स पैक एब्स् वाले पुरुषों को ग़ौर से नहीं देखती? वैसे क्लीवेज़ जैसे फ़ैशन स्त्रियां सिर्फ़ स्त्रियों को दिखाने को करती होंगी, यह मानना ज़रा मुश्क़िल ही है।

एक ही वक़्त में आप तरह-तरह के (विरोधाभासी) फ़ायदे एक साथ अपने लिए चाहेंगे तो क्या यह संभव हो पाएंगा ?

एक विज्ञापन में एक स्त्री एक शर्मीले पुरुष को प्रेमनिमंत्रण की पहल करने के लिए उकसाते हुए कहती है-‘बी अ मैन’! क्या आपको लगता है कि इस स्त्री का आशय यहां ‘मानव’ या ‘इंसान’ से है? यह स्त्री जब इतना कह सकती है तो ख़ुद पहल क्यों नहीं कर सकती ? ‘मर्दानगी’ ने पहले ही दुनिया-भर की मुसीबतें खड़ी कर रखीं हैं और आप आगे फ़िर वही हरक़तें कर रहे हो ?

निर्भया कांड के कई महीने बाद तक एक विज्ञापन दिखता रहा जिसमें कोई मशहूर युवा आयकन कह रहा था कि ‘मर्द वही है जो स्त्री की रक्षा करे।’ इसमें क्या नई बात कहदी आपने ? यह तो वही पुरानी बीमारी है। मर्द से मतलब क्या है आपका? जिसका शरीर तगड़ा है? बाक़ी जिनका नहीं है वे यूंही खि़सक जाएं !? स्त्रियां, स्त्रियों की रक्षा न करें क्या ? वे तो मर्द हैं नहीं। ये आप उनका उत्साह बढ़ा रहे हैं कि डिस्करेज कर रहे हैं ? और जो किन्हीं कारणों से स्त्री की रक्षा नहीं कर पाते वे सब नामर्द हैं क्या? यह क्या कंपलसरी है कि हर मर्द को सड़क पर होनेवाले हर लफ़ड़े, झगड़े, दंगे में पड़ना ही पड़ना चाहिए ? लोगों को और भी बहुत-से काम होते हैं।

वैसे भी विज्ञापन या फ़िल्म में स्त्री की रक्षा करने और उनके बाहर, वास्तव में रक्षा करने में फ़र्क़ होता है। आंकड़ों के शौक़ीन चाहें तो पता लगा सकते हैं कि हीरो लोग वास्तविक ज़िंदग़ी में कितनी रक्षाएं वगैरह करते हैं। सड़क पर स्त्री की रक्षा की साल-भर में इक्का-दुक्का ख़बरें पढ़ने को मिलतीं हैं। सारी रक्षा रेडियो-टीवी पर चलती है।

और यह किसने कहा कि स्त्री की तरफ़ बोलनेवाला हर मर्द महान, संवेदनशील इंसान होता है, स्त्रीमुक्ति की गहरी समझ रखता है?

उसे याद आती है एक घटना जब वह एक भीड़वाले रुट पर रोज़ सफ़र करता था। कई बार कुछ लड़कियां दिखाई देतीं थी जो आराम से जाकर कंडक्टर के पास बैठ जाया करतीं थी। उनकी उससे दोस्ती रही होती होगी या जो भी संबंध होता होगा। ऐसे ही एक दिन एक लड़की उठकर पिछले दरवाज़े से उतरने को बढ़ी। बस के जो नियम हैं उनके अनुसार भी यह ग़लत था और भीड़ भी भयानक थी। एक प्रौढ़ आदमी अनचाहे ही उस लड़की के रास्ते में इस तरह फंस गया कि उसके हटे बिना निकलना संभव ही नहीं था। मगर वह भी इस क़दर बुरी तरह फंसा था कि उसके लिए हिलना भी संभव नहीं था। धीरे-धीरे भीड़ उस आदमी के पीछे पड़ने लगी। लड़की सुंदर थी, कंडक्टर का सपोर्ट था और हर कोई हीरो बन रहा था। अंत में जब लगा कि लोग उसे पीटने लगेंगे तो सरल ने हस्तक्षेप किया। बिलकुल रुंआसे हो गए उस आदमी ने बहुत आभार माना कि एक आदमी तो उसकी तरफ़ बोला।

इसी तरह एक बार जब वह परिवार के साथ कहीं जाने के लिए बस में बैठा था कि एक मां-बाप एक बहुत ख़ूबसूरत बेटी के साथ बस में चढ़े। सीट ढूंढते हुए वे वहीं आ पहुंचे जहां सरल के आगेवाली सीट पर एक कमज़ोर फ़टेहाल शराबी बेसुध पड़ा था। मां-बाप अभी कुछ सोच ही रहे थे कि पड़ोस की सीट से अचानक एक ‘हीरो’ उठा और उस मरियल शराबी को तड़ातड़ थप्पड़ मारने शुरु कर दिए। फिर प्रभावशाली डायलॉगबाज़ी करते हुए उस मरियल, ग़रीब, बेसुध शराबी को बस से बाहर धकेल दिया। पता नहीं उसकी इस ‘हीरोपंती’ से लड़की  इम्प्रैस हुई या नहीं मगर सरल इस बात से कई दिन निराश रहा कि उस दिन वह कुछ बोल ही नहीं पाया।

समझदार स्त्रियां किन लोगों से प्रभावित होतीं हैं, कैसे पुरुषों को पसंद करतीं हैं ? सामान्यतः लड़कियां उन लड़कों को पसंद करती पाई जातीं हैं जो उनके काम तुरत-फ़ुरत करवा कर दे दें। और ऐसे काम बेईमान और जुगाड़ू लोग ही करा पाते हैं, ईमानदार आदमी इस मुल्क़ में अपने ही काम नहीं निपटा पाता, दूसरों के लिए क्या कर पाएगा ? आपको यह तरीक़ा, ऐसे लोग पसंद हैं तो इसका भी आपको पूरा हक़ है। मगर तब भ्रष्टाचार-विरोध के कार्यक्रमों में ईमानदारी के नारे लगाते हुए आप अजीब-से लगते हैं। दूसरों से, पुलिस से, नेताओं से क़ानून को ठीक से लागू करने की मांग करते हुए भी आप विचित्र ही लगते हैं।

क्या समस्याएं झूठ बोलने और अव्यवहारिक बातें करने से हल हो जाएंगी !?

22-04-2015

(जारी)

(अगला भाग)

7 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-6

(पिछला भाग)


इस वीडियो में ज़्यादा आपत्तिजनक तो कुछ नहीं है मगर नया भी कुछ नहीं है। दुनिया-भर में, भारत में भी पत्र-पत्रिकाओं, इंटरनेट की बहसों और टीवी सीरियलों में पिछले कई सालों से ये बातें कही जा रहीं हैं और इस वीडियो से बेहतर ढंग से कही जा रहीं हैं। इस वीडियो का सबसे कमज़ोर पहलू यह है कि इतने गंभीर और जटिल मुद्दे पर कहीं भी तर्क देने की कोई ज़रुरत ही नहीं समझी गई है। बल्कि पुराने ब्राहमणवादी अंदाज़ में घोषणाएं की गईं हैं। इतने ख़र्चे और इतनी तैयारी के साथ थोड़ा ध्यान ‘रीज़निंग’ पर भी दिया गया होता तो वीडियो का प्रभाव शायद कुछ और होता। इसे देखते हुए, अनायास ही चीची गोविंदा का पुराना हिट गीत ‘मेरी मर्ज़ी’ बार-बार याद आता रहा।


अंततः जब दीपिका कहतीं हैं कि ‘आय एम द यूनिवर्स....’ तो यह वीडियो पूरी तरह ब्राहमणवादी अमूर्त्तन को टक्कर देने लगता है और डर लगने लगता है कि इतने सारे मर्द-भगवानों के बोझ-तले करा रहे भारत को क्या अब कुछ नयी स्त्री-भगवानों को भी झेलने की तैयारी कर लेनी चाहिए। चाहे सचिन तेंदुलकर हों, भारत का तथाकथित ‘सबसे अक़्लमंद बच्चा’ कौटिल्य हो या कार्टूनिस्ट त्रिवेदी हों, अपने लोगों को तुरत-फ़ुरत आयकन या भगवान बना देने का ब्राहमणवाद का यह शौक़ भारतीयों को बहुत भारी पड़ता रहा है। यूं भी पिछले काफ़ी समय से यह देखने में आ रहा है कि फ़िल्मइंडस्ट्री बदलाव के आगे कम और पीछे ज़्यादा चलती है। और अपने आर्थिक पक्ष का ख़ास ख़्याल रखती है।

शादी से पहले, शादी के समानांतर या शादी के बाद यौन-संबंध बनाने का हक़ किसीको भी हो सकता है, मगर भारतीय शादी का काँसेप्ट चूंकि अलग तरह का है इसलिए ये बातें प्रेमसंबंधों के दौरान या अरेंज्ड् मेरिज में रिश्ता तय करते समय साफ़ कर ली जाएं तो बेहतर होगा। वरना अब तक भारतीय शादी को लेकर जो मान्यताएं और धारणाएं रहीं हैं, उनके चलते किसीको भी ऐसे संबंधों पर आपत्ति और कष्ट हो सकता है। और उस आपत्ति और कष्ट को नाजायज़ कतई नहीं कहा जा सकता।

इसमें कोई शक़ नहीं कि पुरुष भी अब तक ऐसी हरक़तें बिना बताए करते आए हैं मगर बेहतर तो यही होगा कि पिछली भूलों से सबक लेकर आगे जो रास्ते बनाए जाएं वो पहले की तरह उलझे हुए, भ्रमित करनेवाले, कन्फ़्यूज़ करनेवाले न हों बल्कि ज़्यादा से ज़्यादा स्पष्ट, साफ़-संुथरे और पारदर्शी हों।

(जारी)

07-04-2015

(अगला भाग)

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-5


(पिछला भाग)
यहां देखिए, नायिका को सीधी बात में मज़ा नहीं आ रहा, वह चाहती है कि नायक कुछ घुमा-फिराकर कहे। यह तो फ़िल्मी सिचुएशन है मगर बाहर की दुनिया में भी घुमाने-फिराने को बड़ी प्रतिष्ठा मिली हुई है। घुमाने-फिराने के सबसे ज़्यादा शौक़ीन हमारे कवि और साहित्यकार हैं। इन्होंने पक्का मान लिया है कि घुमाना-फिराना बड़ी कला है। हुज़ूरेवाला, घुमाना-फिराना सिर्फ़ कला नहीं है, यह ठगी भी है, धोखाधड़ी भी है, बदमाशी भी है। हो सकता है लड़कियों को यह अच्छा लगता हो, हालांकि आज की स्त्रियां उन सब बातों से इंकार कर रहीं हैं जिन्हें कल तक स्त्रियों की पसंद बताया जाता रहा, फ़िर भी मान लें कि लड़कियों को यह अ़च्छा लगता है मगर किन्हीं लड़कों को यह ‘कला’ नहीं आती तो वे इसका कोर्स करने जाएं क्या !? आखि़र सीधी बात में दिक्क़त क्या है ? सही बात तो यह है कि भारतीय समाज की स्थिति ऐसी नहीं है कि ज़्यादा ‘कलाबाज़ी’ दिखाई जाए। यहां तो साहित्य और प्रेम, दोनों जगह सीधी-साफ़ बात और नीयत की ज़रुरत है।

ईश्वर पर न जाने कितनी कविताएं और लघुकथाएं उसने ऐसी पढ़ीं हैं कि कुछ समझ में ही नहीं आता कि रचनाकार कहना क्या चाहता है, ईश्वर है, कि नहीं है, कि छुट्टी पर गया है, कि सामने नहीं आना चाहता, कि शर्मीला है, कि नहाने गया है.......!? या कि रचनाकार डरपोक है, अपने डर को छुपाने के लिए बिंबों, उपमाओं, प्रतीकों और अलंकारों का सहारा ले रहा है!? दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया पर लोग साफ़ बात कर रहे हैं और उसका असर भी दिख रहा है। जो समाज ‘घुमाने-फिराने’ की ‘कलाबाज़ी’ की ही वजह से पतन के कगार पर पहुंच गया हो और आगे पारदर्शिता की चाह रखता हो उसमें साफ़ बात करनेवालों की क़द्र ज़्यादा हो तो क्या बेहतर नहीं होगा? जिनको ‘कला’ पसंद है वे ‘कला’ देखें-दिखाएं।
(गीतविशेष से कोई दुश्मनी नहीं है, अपनी बात कहने के लिए जो भी पहला गीत याद आया, ले लिया है)

07-04-2015
कई बार तो लगता है कि लोग मुद्दों को भी घुमाए-फिराए दे रहे हैं। वर्णव्यवस्था से बड़ा वी आईपी का, छुआछूत से बड़ा काले-गोरे का और दहेज़ से बड़ा लाल बत्ती का मुद्दा हो गया है। टीवीवाले असली मुद्दों से घबराते क्यों हैं ? भारतीय न्यूजचैनलों पर ब्राहमणवाद, नास्तिकता, वर्णव्यवस्था, छुआछूत जैसे शब्द सुनाई ही नहीं पड़ते! धर्म से जुड़े मुद्दों से ये चैनल बचते क्यों हैं ? एक कारण यह भी हो सकता है कि जिस वर्णविशेष के कब्ज़े में सारा मीडिया है, धर्मविरोधी बहसें चलीं तो उस वर्णविशेष की सत्ता उखड़ जाने की पूरी संभावना है। क्योंकि धर्म से नब्बे प्रतिशत फ़ायदे उसी वर्णविशेष के लोगों को मिलते दिखाई देते हैं।

रंगभेद पर एक स्टिंगनुमां कार्यक्रम में ज़्यादातर स्त्रियां रंगभेद के विरोध में यह दलील देतीं सुनाई पड़ीं कि ‘हमें तो भगवान ने काला बनाया है’। ऐसी दलीलें अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी हैं। सामनेवाला भी कह सकता है कि हमें भी रंगभेद करने की मानसिकता भगवान ने दी है, हम क्या कर सकते हैं। वैसे भी, जैसाकि बताया जाता है, धार्मिक पुस्तकों में जो कुछ लिखा है वह स्त्री के विरोध में ही ज़्यादा है, उसे ग़ुलाम या सामान बनाए रखने का हिसाब-क़िताब है। यूं अपनी-अपनी तरह से तर्क देने को हर कोई स्वतंत्र है।

इधर 'मेरी मर्ज़ी' यानि ‘माई चॉइस’ का ऐलान करता दीपिका पादुकोण का एक वीडियो आया है।

(जारी)

07-04-2015

(अगला भाग)