22 दिस॰ 2019

समाज और न्याय की समझ

हमारे घर की बिजली अकसर ख़राब हो जाती थी।

कई बार तो एक-एक हफ़्ते ख़राब रहती थी।


जबकि पड़ोस के बाक़ी घरों की बिजली आ रही होती थी।


उसका कारण था। 


हमारे पिताजी के संबंध और आना-जाना वैसे तो बहुत लोगों से था मगर न तो किसी दबंग और बदमाश सेे संबंध रखते थे न ख़ुद बदमाशी करते थे और न किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्त्ता थे।


हां, जब दुकान से फ़ुरसत मिलती, तो वे बिजलीवालों से कुछ अनुनय-विनय करके, कुछ पैसे-वैसे देकर बिजली ठीक करवा लेते थे।


मैं इतना भी नहीं करता था।


कई लोग समझते थे कि मैं शरमीला, अव्यवहारिक और भौंदू क़िस्म का आदमी हूं।


और भीड़ और प्रचलित मान्यताओं के प्रभाव और दबाव में मैं भी ख़ुदको ऐसा ही समझ लेता था।


लेकिन सिर्फ़ यही बात नहीं थी।


असल में मैं भीतर से बहुत विद्रोही था और अपना काम करवाने के समाज के इन घटिया और गंदे तरीक़ों से बहुत नफ़रत करता था।

उस समय ज़्यादातर दबंग, बदमाश, रईस आदि एक ही पार्टी का समर्थन करते थे।


जैसे अब एक दूसरी पार्टी का करते हैं।

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