15/09/2012

बाल को बाल ही रहने दो...


जिस दिन पहली बार लगा कि शेव करने के बाद ज़्यादा आकर्षक लगता हूं उसी दिन से घिस-घिसकर दाढ़ी-मूंछ साफ़ करना शुरु कर दिया। दिल्ली आकर भी नयी मित्र-मंडली और दूसरे लोगों से जो परिचय बना, एक क्लीन-शेवन व्यक्ति का बना। कुछ साल व्यवसाय किया। अच्छे दिन थे। एक दुकानदार के रुप में इतना लोकप्रिय और सफ़ल होऊंगा, कल्पना भी न की थी। फ़िर कुछ हुआ कि दाढ़ी-मूंछ बढ़ने लगी। मन नहीं होता था बनाने का। मेरे लिए इसका ज़्यादा से ज़्यादा यही अर्थ था कि दाढ़ी-मूंछ की वजह से चेहरे का आकर्षण कुछ कम हो गया होगा। यह नहीं सोचा था कि लोग देखने आने लगेंगे और कहानियां तलाशने लगेंगे। संभवतः कुछ को चिंता रही होगी कि किसी परेशानी में तो नहीं है। मगर दो-चार ने ‘दाढ़ी क्यों बढ़ा ली’ इस भाव से पूछा जैसे मैंने अपनी नाक काट ली हो या घुटना जान-बूझकर बुलडोज़र के नीचे दे दिया हो। कुछेक ने इस नज़र से देखा कि मुझे लगा मैं चिड़ियाघर के पिंजरे में बंद कोई ऊदबिलाव हूं।

दाढ़ी-मूंछ हों या सर के बाल हों, मेरे लिए ये महज़ बाल हैं ठीक वैसे ही जैसे शरीर के कई दूसरे हिस्सों में उग आने वाले बाल हैं। या हाथ-पैरों में उगनेवाले नाख़ून हैं। फ़र्क़ यही है कि जो बाल और नाख़ून कपड़ों से बाहर दिखाई पड़ते हैं उन्हें व्यक्ति ज़्यादा स्वच्छ और आकर्षक रखने की कोशिश करता है। अगर कोई किसी मजबूरी के चलते यह सब न कर पाए तो भी कम-अज़-कम मैं तो उसे पागल, सनकी या किसी धर्मविशेष से जुड़ा करार नहीं दे देने वाला। कलको कोई नया धर्म या संप्रदाय, बगल के बालों को अपना प्रतीक बना ले तो उससे मेरा क्या लेना-देना है!? मैं क्यों अपने बगल के बालों को उस प्रतीक के अनुकूल या प्रतिकूल रुप देने लगूं!? व्यक्तिगत रुप से मैंने कभी भी अरतीकों-परतीकों को बहुत ज़्यादा महत्व नहीं दिया।

कई लोग अपने काले बालों को भी हरा-पीला कर लेते हैं। कुछ लोग अच्छे-भले बालों को मुंडाकर टकले हो जाते हैं। लड़कियां ही नहीं कई बार लड़के भी नाख़ून बढ़ाकर उन्हें सजाते-रंगते हैं। ये उनकी अपनी स्वतंत्रता या समस्या है, इसमें मुझे बिन बुलाए ही टांग क्यों घुसेड़नी चाहिए!? बाल और नाख़ून व्यक्ति की अपनी संपत्ति है। अपनी संपत्ति के साथ कोई जो चाहे करे, इसमें किसी दूसरे को या धर्म-संप्रदाय को भी ऊंगली करने का क्या हक़ है!?

मुश्क़िल तब और बढ़ जाती है जब लोग अपने कन्फ्यूजन्स और पूर्वाग्रहों को दूसरों पर लादने लगते हैं। अभी एक आंदोलन सभीने ऐसा देखा जो आंदोलन कम और झण्डों और टोपियों जैसे प्रतीकों का जोड़ ज़्यादा था। पहले ये लोग राष्ट्रीय प्रतीकों की महामहिमा बताकर हीरो बनते रहे। फ़िर यही लोग राष्ट्रीय प्रतीकों पर वार करके हीरो बनने लगे। ‘चित्त भी मेरी, पट भी मेरी, चारों ओर ही भरे पड़े हैं मेरे जैसे’ वाली बात हुई।


इसी तरह मैं कुछेक दफ़ा ऐसे लोगों से भी दो-चार हुआ हूं जो पहले तो किसी प्रतीक के न होने पर संबंधित व्यक्ति को अधार्मिक या असामान्य करार दे देते हैं। आगे चलकर वे किसी डर, किसी परिस्थिति, किसी प्रभाव के चलते ख़ुद ही ‘बदल’ जाते हैं और उस प्रतीक से मुक्ति पा लेते हैं। अब वे उस प्रतीक को धारण करने वाले पर बिना कारण जाने हंसना शुरु कर देते हैं। दरअसल ऐसे लोग बदले होते ही नहीं है। पहले अगर उन्हें कुछ बालों ने बतौर प्रतीक जकड़ रखा होता है तो बाद में बालों का न होना उनके लिए एक प्रतीक बन जाता है और उनके दिमाग़ को एक नए क़ैदखाने में धकेल देता है।

प्रतीकों से आदमी को आंकने की कोशिश कई दूसरे स्तरों पर भी ख़तरनाक या नुकसानदायक हो सकती है। इस आधार पर आंकेंगे तो शेखर कपूर और बिन लादेन को एक ही तराज़ू पर तौला जा सकता है। यानि लादेन अगर अपनी दाढ़ी ट्रिम करा लें तो ‘बैंडिट क्वीन’ जैसी फ़िल्म बना ले! या शेखर अपनी दाढ़ी खुल्ली छोड़ दे तो एक दिन धार्मिक कट्टरपंथी हो जाएंगे !? इसी क्रम में यह भी याद रखना चाहिए कि मुंबई हमले के दोषी दाढ़ी हटाकर वहां तक पहुंचे थे। कुछ दिन पहले नेपाल में एक आतंकवादी कथित हिंदू पहचान के साथ पकड़ा गया है।

तो हे ऊपर-नीचे के कथित ख़ुदाओ और भगवानों, मेरे बाल, बाल हैं और नाख़ून, नाख़ून हैं। तुम अपने बालों को जो समझना चाहो समझो, मगर मुझे और मेरे बालों को अपने हाल पर छोड़ दो।


-संजय ग्रोवर

(सरल का धन्यवाद कि अपने ब्लॉग पर लेख साझा करने दिया)


14/03/2012

बच्चे, तेरे बड़ों की घुट्टी में क्या है!?


सरल को ठीक-ठीक नहीं मालूम कितना बड़ा बच्चा था, नार्वे की संस्कृति क्या है, वहां की सरकार सिर्फ़ दूसरे देशों के बच्चों को उठाती है या अपने देश के बच्चों को भी, बच्चों की परवरिश के लिए किस तरह के इंतज़ाम वह करती है ? मगर सरल के लिए यह जानना मीठी-सी हैरानी की तरह है कि दुनिया की कोई सरकार बच्चों की परवरिश के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर इस क़दर गहराई और ज़िम्मेदारी-भरा नज़रिया अपनाने की कोशिश करती है। उस नज़रिए को समझने का सबका अपना-अपना नज़रिया हो सकता है, होना चाहिए भी।

मगर यह जो हिंदी न्यूज़-चैनलों पर चला कुछ दिन, यह क्या था ? क्या राष्ट्रवादी, कया मार्क्सवादी, क्या समाजवादी, क्या नारीवादी......जिसे देखो भारतीय संस्कृति के पक्ष में दे-दनादन दंड पेल रहा है। जैसे गप्प मारने की कोई प्रतियोगिता चल रही हो......झूठ के पक्ष में कोई सेमिनार बुलाया गया हो....

नार्वे में बच्चों के साथ क्या होता है, यह तो सरल को पता नहीं, लेकिन अपने देश का तो पता है ना। झूठ नं. एक है कि यहां बच्चों को निस्वार्थ भाव से पाला जाता है। लड़के और लड़की के बीच फ़र्क, लड़की को पैदा होने से पहले या बाद में मार डालना-यह निस्वार्थ भाव है ! या लैंगिक विकलांगों, समलैंगिकों और कथित नाजायज़ बच्चों को अपने से काटकर ऐसे फ़ेंक देना जैसे कोई घर का कूड़ा भी न फ़ेंकता हो---यह निस्वार्थ भाव है !  पालना तो छोड़िए, ज़रा सोचिए कि बच्चों के पैदा होने के मुख्य कारण क्या हैं ? कि वंश चलता रहे, कि स्त्रियां मां बने बिना अधूरा महसूस करतीं हैं, कि दादी जल्द से जल्द पोते का मुंह देखना चाहती है, कि यौनानंद के चरम-क्षणों में लापरवाहियां और गड़बड़ियां हो जाती हैं!
इस सारी कवायद में बच्चे का पक्ष कहां है ? बच्चे से कौन पूछता है कि तुम होना चाहते हो या नहीं !? बच्चे की कोई च्वॉइस ही नहीं है कि किस घर में पैदा होगा, किस देश में जन्मेगा, कैसे माहौल में आंखें खोलेगा, कौन महान आत्माएं उसे पालेंगी, कौन-से धर्म-संस्कृति उसपर थोपे जाएंगे.......

एक नन्हीं-सी जान, एक बेसहारा मासूम, हाथ लगाओ तो हड्डियां किड़किड़ करतीं हैं जिसकी, आपके सिवाय और कोई भी नहीं है सारी दुनिया में उसका.......दर्द हो, भूख लगे, ठंड लगे......सिवाय रोने के दूसरी कोई भाषा नहीं जानता वह.....कैसी बेबसी महसूस करता होगा.....पर हमें क्या! हमें तो जब मन करेगा उसे प्यार करेंगे, पुचुर-पुचुर ज़ोर-ज़ोर से चूमेंगे और ज़रा हमारा मूड ख़राब हुआ कि चढ़ दौड़ेंगे उसपर। बाहर पड़ोसी की किसी हरक़त पर झल्लाए हुए हैं और कहर टूट रहा है बच्चे पर। वह मासूम शायद अभी यह सोचने लायक भी नहीं हुआ है कि सोचे कि इस विकृत चीख-पुकार का निशाना मैं ही क्यों बनता हूं आखि़र ? मेरा इससे लेना-देना क्या है ?

चलिए, बच्चा आपका है, आपने पैदा किया है, भारी क़िला फ़तह किया है, आपका पूरा हक़ है उसे जैसे चाहें पालिए, जैसी चाहें परंपराएं थोपिए, रीति-रिवाज कराईए, अपनी पसंद की पढ़ाई पढ़ाईए...और इस सारी घोंटा-घोंटी के बाद वह कथित तौर पर सफ़ल हो जाए तो सौ फ़ीसदी आपका ही बच्चा है, और जो न हुआ तो फ़िर न जाने किस पर गया है डफ़र......

लेकिन कहावतें, मुहावरे, जुमले ! इनका क्या करें ! कि बच्चे भगवान का रुप होते हैं। अच्छा जी! तो जब सफ़ाई कर्मचारी बच्चा आता है तो क्यों इस कहावत का पवित्र प्रभाव कपूर की तरह ग़ायब हो जाता है!?
अगर कोई खोजे तो इन विचित्र कथनों में सारा का सारा गणित साफ़-साफ़ दिखाई देता है। कि जो बच्चे मां-बाप का आदर नहीं करते, कभी तरक्क़ी नहीं कर पाते। मायने ? अगर मां-बाप का आदर करने से भी तरक्क़ी न मिले तो ? तो क्या उनका आदर करना छोड़ दिया जाए !? तरक्क़ी मिलेगी इस लिए आदर करो। तिसपर तुर्रा यह कि इसे निस्वार्थ भाव से किया गया कृत्य भी कहो।

तो जनाबे-आली! पाल दिए आपने बच्चे, सब निपटा दिए बढ़िया से। अब इसका क्या करें कि इनमें से कुछेक कवि, शायर, कलाकार वगैरह भी हो जाते हैं। ये सब संस्कृति की घुट्टी घोंट कर आए हैं। तो चल रहे हैं मां की तारीफ़ में दोहे, छंद, शेर........भरे जा रहे हैं पोथन्ने। क्यों भाई ? जो लोग औरत की शान में दिन-रात चुटकुले बरसाते हैं, उनका मां पर इतना प्यार आखि़र क्यों उमड़ा आ रहा है !? बात तो है ज़रुर कुछ! बात यह है कि मां लगी है सुबह से शाम तक इनके पोतड़े धोने में। इनके लिए घण्टो घिसट-घिसट कर हलवे बना रही है। ये घूम रहे हैं अपनी महबूबाओं के साथ, आवारगी चल रही है बाअदब। अब ज़रा पूछिए कि मां इंसान नहीं है क्या? अगर वो भी हफ्ते में एकाध दफ़ा निकल जाए अपने पुरुष-मित्रों के साथ फ़िल्म-विल्म देखने तो? क्या तब भी उतने ही क़सीदे काड़े जाएंगे माता जी के !?

यूं झूठ के प्रत्युत्तर में झूठ पैदा होता है।

सच का सामना-1 तो सरल नहीं देख पाया पर सच का सामना-2 ज़रुर देखने को मिल गया। एक एपीसोड में एक महिला अपने पति और बेटे के सामने दूसरे मर्दों से संबंधों और फ्लर्टिंग की बात स्वीकार कर रही थी। पति कुछ परेशान ज़रुर दिखता था पर बेटा एकदम सहज दिख रहा था।

क्या यह सहजता किसीको असहज कर रही थी ! पता नहीं।

अगले एपीसोड देखने को नहीं मिले। शायद बंद हो गया।

बेचैन बच्चों को तसल्ली देने के लिए फ़िलहाल मेरे पास शादाब लाहौरी के इस शेर के अलावा कुछ नहीं है -

ये मेरे ख़्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिन
अब आ गया हूं तो दो दिन क़याम करता चलूं


नार्वे सरकार बच्चों के पालन-पोषण के लिए क्या करती है, यह जानने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें -

क्या कहता है नॉर्वे का क़ानून ?


-संजय ग्रोवर

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