14/03/2012

बच्चे, तेरे बड़ों की घुट्टी में क्या है!?


सरल को ठीक-ठीक नहीं मालूम कितना बड़ा बच्चा था, नार्वे की संस्कृति क्या है, वहां की सरकार सिर्फ़ दूसरे देशों के बच्चों को उठाती है या अपने देश के बच्चों को भी, बच्चों की परवरिश के लिए किस तरह के इंतज़ाम वह करती है ? मगर सरल के लिए यह जानना मीठी-सी हैरानी की तरह है कि दुनिया की कोई सरकार बच्चों की परवरिश के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर इस क़दर गहराई और ज़िम्मेदारी-भरा नज़रिया अपनाने की कोशिश करती है। उस नज़रिए को समझने का सबका अपना-अपना नज़रिया हो सकता है, होना चाहिए भी।

मगर यह जो हिंदी न्यूज़-चैनलों पर चला कुछ दिन, यह क्या था ? क्या राष्ट्रवादी, कया मार्क्सवादी, क्या समाजवादी, क्या नारीवादी......जिसे देखो भारतीय संस्कृति के पक्ष में दे-दनादन दंड पेल रहा है। जैसे गप्प मारने की कोई प्रतियोगिता चल रही हो......झूठ के पक्ष में कोई सेमिनार बुलाया गया हो....

नार्वे में बच्चों के साथ क्या होता है, यह तो सरल को पता नहीं, लेकिन अपने देश का तो पता है ना। झूठ नं. एक है कि यहां बच्चों को निस्वार्थ भाव से पाला जाता है। लड़के और लड़की के बीच फ़र्क, लड़की को पैदा होने से पहले या बाद में मार डालना-यह निस्वार्थ भाव है ! या लैंगिक विकलांगों, समलैंगिकों और कथित नाजायज़ बच्चों को अपने से काटकर ऐसे फ़ेंक देना जैसे कोई घर का कूड़ा भी न फ़ेंकता हो---यह निस्वार्थ भाव है !  पालना तो छोड़िए, ज़रा सोचिए कि बच्चों के पैदा होने के मुख्य कारण क्या हैं ? कि वंश चलता रहे, कि स्त्रियां मां बने बिना अधूरा महसूस करतीं हैं, कि दादी जल्द से जल्द पोते का मुंह देखना चाहती है, कि यौनानंद के चरम-क्षणों में लापरवाहियां और गड़बड़ियां हो जाती हैं!
इस सारी कवायद में बच्चे का पक्ष कहां है ? बच्चे से कौन पूछता है कि तुम होना चाहते हो या नहीं !? बच्चे की कोई च्वॉइस ही नहीं है कि किस घर में पैदा होगा, किस देश में जन्मेगा, कैसे माहौल में आंखें खोलेगा, कौन महान आत्माएं उसे पालेंगी, कौन-से धर्म-संस्कृति उसपर थोपे जाएंगे.......

एक नन्हीं-सी जान, एक बेसहारा मासूम, हाथ लगाओ तो हड्डियां किड़किड़ करतीं हैं जिसकी, आपके सिवाय और कोई भी नहीं है सारी दुनिया में उसका.......दर्द हो, भूख लगे, ठंड लगे......सिवाय रोने के दूसरी कोई भाषा नहीं जानता वह.....कैसी बेबसी महसूस करता होगा.....पर हमें क्या! हमें तो जब मन करेगा उसे प्यार करेंगे, पुचुर-पुचुर ज़ोर-ज़ोर से चूमेंगे और ज़रा हमारा मूड ख़राब हुआ कि चढ़ दौड़ेंगे उसपर। बाहर पड़ोसी की किसी हरक़त पर झल्लाए हुए हैं और कहर टूट रहा है बच्चे पर। वह मासूम शायद अभी यह सोचने लायक भी नहीं हुआ है कि सोचे कि इस विकृत चीख-पुकार का निशाना मैं ही क्यों बनता हूं आखि़र ? मेरा इससे लेना-देना क्या है ?

चलिए, बच्चा आपका है, आपने पैदा किया है, भारी क़िला फ़तह किया है, आपका पूरा हक़ है उसे जैसे चाहें पालिए, जैसी चाहें परंपराएं थोपिए, रीति-रिवाज कराईए, अपनी पसंद की पढ़ाई पढ़ाईए...और इस सारी घोंटा-घोंटी के बाद वह कथित तौर पर सफ़ल हो जाए तो सौ फ़ीसदी आपका ही बच्चा है, और जो न हुआ तो फ़िर न जाने किस पर गया है डफ़र......

लेकिन कहावतें, मुहावरे, जुमले ! इनका क्या करें ! कि बच्चे भगवान का रुप होते हैं। अच्छा जी! तो जब सफ़ाई कर्मचारी बच्चा आता है तो क्यों इस कहावत का पवित्र प्रभाव कपूर की तरह ग़ायब हो जाता है!?
अगर कोई खोजे तो इन विचित्र कथनों में सारा का सारा गणित साफ़-साफ़ दिखाई देता है। कि जो बच्चे मां-बाप का आदर नहीं करते, कभी तरक्क़ी नहीं कर पाते। मायने ? अगर मां-बाप का आदर करने से भी तरक्क़ी न मिले तो ? तो क्या उनका आदर करना छोड़ दिया जाए !? तरक्क़ी मिलेगी इस लिए आदर करो। तिसपर तुर्रा यह कि इसे निस्वार्थ भाव से किया गया कृत्य भी कहो।

तो जनाबे-आली! पाल दिए आपने बच्चे, सब निपटा दिए बढ़िया से। अब इसका क्या करें कि इनमें से कुछेक कवि, शायर, कलाकार वगैरह भी हो जाते हैं। ये सब संस्कृति की घुट्टी घोंट कर आए हैं। तो चल रहे हैं मां की तारीफ़ में दोहे, छंद, शेर........भरे जा रहे हैं पोथन्ने। क्यों भाई ? जो लोग औरत की शान में दिन-रात चुटकुले बरसाते हैं, उनका मां पर इतना प्यार आखि़र क्यों उमड़ा आ रहा है !? बात तो है ज़रुर कुछ! बात यह है कि मां लगी है सुबह से शाम तक इनके पोतड़े धोने में। इनके लिए घण्टो घिसट-घिसट कर हलवे बना रही है। ये घूम रहे हैं अपनी महबूबाओं के साथ, आवारगी चल रही है बाअदब। अब ज़रा पूछिए कि मां इंसान नहीं है क्या? अगर वो भी हफ्ते में एकाध दफ़ा निकल जाए अपने पुरुष-मित्रों के साथ फ़िल्म-विल्म देखने तो? क्या तब भी उतने ही क़सीदे काड़े जाएंगे माता जी के !?

यूं झूठ के प्रत्युत्तर में झूठ पैदा होता है।

सच का सामना-1 तो सरल नहीं देख पाया पर सच का सामना-2 ज़रुर देखने को मिल गया। एक एपीसोड में एक महिला अपने पति और बेटे के सामने दूसरे मर्दों से संबंधों और फ्लर्टिंग की बात स्वीकार कर रही थी। पति कुछ परेशान ज़रुर दिखता था पर बेटा एकदम सहज दिख रहा था।

क्या यह सहजता किसीको असहज कर रही थी ! पता नहीं।

अगले एपीसोड देखने को नहीं मिले। शायद बंद हो गया।

बेचैन बच्चों को तसल्ली देने के लिए फ़िलहाल मेरे पास शादाब लाहौरी के इस शेर के अलावा कुछ नहीं है -

ये मेरे ख़्वाबों की दुनिया नहीं सही लेकिन
अब आ गया हूं तो दो दिन क़याम करता चलूं


नार्वे सरकार बच्चों के पालन-पोषण के लिए क्या करती है, यह जानने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें -

क्या कहता है नॉर्वे का क़ानून ?


-संजय ग्रोवर

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही लिखा है ....बच्चे कई बार या तो हादसा हैं या फिर शायद वंश को चलते रहने की परंपरा का हिस्सा...कितने लोग इसेके साथ जुडी responsibilty को समझते हैं.....करीब दो साल पहले ...रेडियो पर एक discussion था DOUBLE INCOME NO KIDS के SYNDROM पर...सब लोग कोस रहे थे उन्हें जो बच्चे पैदा नहीं करना चाहते थे....एक कोशिश की थी मैंने अपना पक्ष रखने की...आपके साथ share करना चाहूँगा RECORDING....

    http://www.esnips.com/displayimage.php?album=2230444&pid=18116956#top_display_media

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुनील, आपकी प्रभावशाली आवाज़ में आपका नज़रिया जानना सुखद रहा। समाज में मान्यता यह बननी चाहिए कि बच्चे पैदा करना नहीं, उन्हें समुचित तरीके से पालना एक बहुत बड़ी ज़िम्मदारी व्यक्तिगत रुप से भी है और सामाजिक तौर पर भी। शेयर करने के लिए शुक्रिया, सुनील।े

      हटाएं
    2. धन्यवाद संजय, ....आपका प्रोत्साहन मायने रखता है....क्योंकि ज्यादातर विषयों पर आपके विचार और उनकी अभिव्यक्ति मुझे बहुत प्रभावित करती है....इस दुनिया में ज्यादातर लोग वही कहते हैं जो उन्हें लगता है उन्हें कहना चाहिए...बहुत कम लोग वो कहते हैं.... जो वो सच में सोचते हैं.....हम में से ज्यादातर लोग खंडित व्यक्तित्व के लोग हैं....अफ्रीका में रंग बेध पर चर्चा करते हैं लेकिन अपने नौकर को उतनी इज्ज़त भी नहीं देते ... जितनी किस्सी को भी बस एक इंसान होने के कारण मिलनी चहिये....बच्चे अगर पैदा किये जाये तो पैदा करने वाले उन्हें श्रेष्ठ नागरिक बनाए की जिमेदारी भी ले....

      हटाएं
  2. संजय जी, आप हमेशा ही शानदार और जानदार लिखते हैं ! आपने बच्चों से लेकर माता पिता सभी को धर दबोचा है ! आपने जीर्ण -शीर्ण मान्यताओं पे खूब तंज किया है !
    सबसे अच्छी लगी आपकी भाषा और रुचिकर अभिव्यक्ति !

    अशेष सराहना के साथ,
    दीप्ति

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या यह सहजता किसीको असहज कर रही थी ! पता नहीं।

    अगले एपीसोड देखने को नहीं मिले। शायद बंद हो गया।
    इन दिनों आचार्य chatursen का नावेल - वयं रक्षामः पढ़ रहा हूँ... काफी कुछ गल्फ भी है इसमें लेकिन सोचता हूँ ...हम सभी लोग गल्प में ही तो जीते हैं...हमारे धर्म शास्त्र हों या फिर कोई एनी धार्मिक किताब सब तो कोरी की कोरी गल्प हैं...बस थोड़ी बहुत सत्यता का पुट लिए हुए... सोचता हूँ... कुछ और हो या न हो..बच्चों के हक़ में सिर्फ इतना कर दिया जाये.. इस किताब को हमें जरुर पद्य जाना चाहिए....या फिर सभ्यता और संकृति रहन सहन.. का एक सच्चा इतिहास हम बच्चों के सेल्बस में जरुर रख दिया जाना चाहिए...और इसे कड़ी से पढाया भी जाना चाहिए...
    और कुछ हमारे हक़ में कोई करे या न करे..

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या यह सहजता किसीको असहज कर रही थी ! पता नहीं।

    अगले एपीसोड देखने को नहीं मिले। शायद बंद हो गया।
    इन दिनों आचार्य chatursen का नावेल - वयं रक्षामः पढ़ रहा हूँ... काफी कुछ गल्फ भी है इसमें लेकिन सोचता हूँ ...हम सभी लोग गल्प में ही तो जीते हैं...हमारे धर्म शास्त्र हों या फिर कोई एनी धार्मिक किताब सब तो कोरी की कोरी गल्प हैं...बस थोड़ी बहुत सत्यता का पुट लिए हुए... सोचता हूँ... कुछ और हो या न हो..बच्चों के हक़ में सिर्फ इतना कर दिया जाये.. इस किताब को हमें जरुर पद्य जाना चाहिए....या फिर सभ्यता और संकृति रहन सहन.. का एक सच्चा इतिहास हम बच्चों के सेल्बस में जरुर रख दिया जाना चाहिए...और इसे कड़ी से पढाया भी जाना चाहिए...
    और कुछ हमारे हक़ में कोई करे या न करे..

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  6. udanhausalonki.blogspot.com18 मार्च 2012 को 2:39 pm

    बहुत ही बेहतर रचना.... सच का सामना हो या फिर टी वी पर आने वाली तमाम खबरें या फिर कार्यक्रम...बच्चे देखते हुए सहज रहते हैं क्योंकि उन्हें समझ नहीं आता..सिर्फ सवालों की झड़ी लगा देते हैं...हम ही अक्सर असहज हो जाते हैं.....प्रतिभा राय

    उत्तर देंहटाएं
  7. क्‍या यह दुर्भाग्‍यपूर्ण नहीं कि सामाजिक दायित्‍व का दंभ भरने वाला तथाकथित लोकतंत्रीय स्‍तम्‍भ भी अन्‍य स्‍तम्‍भों की तरह भौतिकतावादी हो चुका है और समस्‍त नैतिक मूल्‍यों से गिर कर उस स्‍तर पर आ गया है जहॉं किसी दुर्भाग्‍यपूर्ण घटना से भाग्‍य बनाने की चेष्‍टा के अतिरिक्‍त कुछ नहीं दिखता।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. एक आदमी समाज को बदलने को सामाजिक दायित्व मानता है तो दूसरा यथास्थिति को बनाए रखने में। ऐसे में तय करना आसान नहीं होता कि कौन सही है!

      हटाएं
  8. संजय जी,
    आपके विचार सदैव हमारी मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालते हैं. हमारी परम्परओं और मान्यताओं का हमारी जिंदगी पर इस कदर पैठ है कि हम अपनी सोच से बहार निकल ही नहीं पाते. बच्चों को इस दुनिया में लाना और उनपर अपनी इच्छाएं थोपना, उनको कभी ईश्वर का वरदान मानना, तो कभी इस दुनिया में आने से पहले ही खत्म कर देना महज़ इस लिए कि वो वंश नहीं चला सकती... इन विषयों पर बहुत चर्चा होती है लेकिन आज तक कोई परिवर्तन नहीं.
    आपके लेख बहुत ही विचारोत्तेजक और सार्थक हैं, शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बस तकनीक की देन यह इंटरनेट है और आप लोगों का प्रेम है कि अपने मन की कुछ बातें कह लेता हूं। कभी-कभी मन होता है उन नामी/बेनामी टिप्पणीकारों से मिलने का जो भीषण गर्मी में एकाएक कहीं से ठंडे बादलों की तरह आते हैं और हौले से सर को छूकर निकल जाते हैं।
      आप सबका बहुत-बहुत आभार।

      हटाएं

रुके-रुके से क़दम....रुक के बार-बार चले...

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं ‘पुराने पोस्ट’ पर क्लिक करें-