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14 सित॰ 2013

काश! यह रात कभी ख़त्म न हो!


वह बिस्तर में पड़ा है, आंखें बंद हैं।

आंखें बंद कर लेने से क्या नींद आ जाती है ? रात किस वक्त आंख लगती है, कितना वक्त नींद आती है, कुछ समझ में नहीं आता। बस सुबह मन होता है कि सोया रहे, अभी तो नींद आनी शुरु ही हुई थी और......। यूं भी कोई चुस्ती-फुर्ती उसे अपने बदन में महसूस नहीं होती, फ़िर सुबह-सुबह तो बिलकुल ही थका-थका सा महसूस करता है ख़ुदको।

उठे भी तो किसलिए ?

जैसे-तैसे तैयार होकर स्कूल के लिए निकलेगा। सारे रास्ते आंखें नीची किए, सर झुकाए चलेगा। चलेगा कि घिसटेगा ! मौसम कैसा भी हो, हाथ-पांव पसीने से भरे रहेंगे। रास्ते में कहीं कोई कुत्ता दिख गया तो वह डरेगा, भौंक पड़ा तो बुरी तरह डर जाएगा। लड़कों का कोई झुण्ड दिख गया तो डरेगा, कहीं किसीसे नज़र न मिल जाए। पता नहीं कोई क्या कह दे, कोई ग़ाली न दे दे, कोई अजीब-सा इशारा न कर दे। स्कूल पहुंचेगा तो डरेगा कि कहीं कोई टीचर प्रेयर पढ़नेवाले तीन बच्चों में खड़ा न कर दे। कहीं अपनी क्लास की लाइन में आगे न खड़ा होना पड़ जाए। पीछे भी खड़ा है तो घबराया है कि कोई देख न ले कि वह प्रेयर नहीं बोल रहा है। बोलना तो दूर, उसके होंठ भी ठीक से नहीं हिल रहे।

फ़िर क्लास में!

किसी टीचर ने कुछ पूछ लिया तो ! उसे आता है कि नहीं आता, यह बड़ा सवाल नहीं है। मुश्क़िल यह है कि बोलेगा कैसे ? मुंह से आवाज़ निकलेगी कि अंदर ही कहीं फ़ंसी रह जाएगी !

आज तीसरा घंटा ख़ाली है। गणित वाले मास्साब नहीं आए हैं। सब बच्चे ख़ुश हैं। वे चिल्ला रहे हैं, कूद-फांद मचा रहे हैं। वह भी ख़ुश है। आज मास्साब का डर नहीं है। मगर अब एक नया डर उसके सामने है-बच्चों का डर।

ननुआ उसका हाथ मरोड़ेगा, वह कुछ भी नहीं कर पाएगा, बस कुनमुनाता रहेगा।

वह दादा टाइप लड़की आज फ़िर उसे धमकाकर उससे चॉक छीन लेगी। वह चुपचाप दे देगा।

हाफ़टैम (हाफ़टाइम/इंटरवल) में दूसरे बच्चों की तरह ही वह खाना खाने घर आएगा। और जब लौटकर वापिस जाएगा तो देखेगा, बस्ते में से उसका पैन ग़ायब है। आए दिन कोई उसका पैन चुरा लेता है, फ़िर भी आए दिन वह पैन बस्ते में ही छोड़कर खाना खाने चला जाता है।

स्कूल जाने के बाद पहले घंटे से आखि़री घंटे तक उसका एक-एक पल जैसे इसी इंतज़ार में बीतता है कि कब घंटा ख़त्म होगा, कब इंटरवल होगा, कब छुट्टी होगी।

छुट्टी होगी तो उसकी जान में ज़रा-सी जान आएगी।

खाना-वाना खाकर उसे नया पैन ख़रीदने भी जाना है। पैन के लिए मौक़ा देखकर माताजी या पापाजी के बक्से में से एक या दो रुपए, जो भी मिलें, निकाल लेने हैं। स्टोर में अकेले जाने में जान निकलती है। न जाने क्या-क्या सामान पड़ा है वहां। लाइट जलाई तो कोई देख लेगा। यूंही घुसा तो उसकी घबराहट अंधेरे को और घना कर देगी। पर पैसे तो निकालने हैं। बिना पैन के कल स्कूल कैसे जाएगा ?

पापाजी-माताजी को बताए क्या ? बताने से होगा क्या ? वे तो यही कहेंगे कि ‘होशियार बनते हैं ; ऐसे कैसे कोई पैन चुरा लेता है’। डांट भी सकते हैं कि ‘फ़लां लड़के को देख कितना तेज है, उससे कुछ सीख’। सरल के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं है। यह उसे भी मालूम है कि होशियार होना चाहिए, तेज होना चाहिए। पर वह इसका क्या करे कि लाख सोचते रहने के बावजूद वह कोई कोशिश तक नहीं कर पाता!

वह डरता हुआ नमन की दुकान तक जाएगा, क्योंकि उसे मालूम है कि वहां भीड़ लगी होगी। सारे बच्चे और उनके मां-बाप कापी-पैन ख़रीदने वहीं आते हैं। वहां जाकर भीड़ के पीछे खड़ा हो जाएगा। फिर इंतज़ार करता रहेगा कि कब नमन की नज़र उसपर पड़ जाए और वह उससे पूछे कि हां, तुझे क्या चाहिए ? वह परेशान है कि आखि़र कब नमन की नज़र उसपर पड़ेगी और कब वह उससे पूछेगा! वह डर भी रहा है कि कहीं नमन की नज़र उसपर न पड़ जाए और वह उससे पूछ न ले! अगर पूछ लिया तो क्या वह तुरंत बता पाएगा कि उसे क्या चाहिए ? क्या उसकी आवाज़ नमन तक पहुंचेगी ? कहीं नमन उसकी हंसी तो नहीं उड़ाएगा कि तेरे मुंह में आवाज़ नहीं है? तू लड़की है क्या ?

वह डरा हुआ खड़ा है। एक डर उसे यह भी है कि कोई जान-पहचान वाला न यहां आ जाए और यह न देख ले कि वह डरा हुआ खड़ा है।

दिन इसी तरह निकलता है।

रात को बिस्तर में घुसता है तो आधी रात यही कामना करते बीतती है कि वक्त किसी तरह यहीं ठहर जाए। काश! यह रात कभी ख़त्म न हो!

(जारी)

14-09-2013

5 सित॰ 2013

पापई की शराफ़त भी आफ़त है!

पापाजी कभी-कभी हंसते हैं। अकसर गंभीर दिखाई देते हैं। दिखाई भी कितना देते हैं ! हमेशा तो बिज़ी रहते हैं।

पहले तो सभी कमरों में बल्ब लगे थे जो पीली-पीली रोशनी देते थे। एक-एक करके पापाजी ने सभी कमरों में ट्यूबलाइट लगवा दीं हैं। ट्यूबलाइट, स्विच ऑन करते ही बल्ब की तरह तुरंत नहीं जलती ; पहले फ़ड़फ़ड़ाती है। ज़्यादा देर फ़ड़फ़ड़ाए तो डर लगता है, आज जलेगी कि नहीं, वोल्टेज पूरे आ रहे हैं कि नहीं ! जल जाती है तो कितना अच्छा लगता है। अब कुछ भी काम करो, करने में मन लगेगा, मज़ा आएगा।

पापाजी हंसते हैं तो घर रोशनी से भर जाता है। सब भाई-बहिनों के दिल में जैसे लट्टू जलने लगते हैं। पापाजी कितने अच्छे हैं ! शराब नहीं पीते! सिगरेट नहीं पीते! ग़ाली नहीं बकते! किसीसे लड़ते नहीं। सफ़ेद कमीज़ और सफ़ेद पाजामा। हंसते हैं तो पता चलता है कि दांत उनसे भी ज़्यादा सफ़ेद हैं। शरीर इकहरा है और पेट एकदम सपाट है। और हो भी क्यों नहीं। कितना तो पैदल चलते हैं पूरा दिन। सुबह पांच बजे उठते हैं। बही-खाता लिखते रहते हैं। फ़िर दूध लाना, सब्ज़ी लाना..........दुनिया-भरके काम......दुकान पर जाना, ज़रुरत हो तो दोपहर में फ़िर घर आना...फ़िर जाना....रात को आना...खाना खाना....पौने नौ बजे के समाचार सुनना...और फ़िर बही-खाता.....पापाजी बस मेहनत, मेहनत, मेहनत, काम, काम और काम करते रहते हैं...फ़िल्म देखने भी नहीं जाते कभी। हां, किसीके घर शादी हो..... कोई मर गया हो.... कैसा भी अवसर हो, पापाजी की ज़रा भी जान-पहचान रही हो और पापाजी वहां न जाएं, हो ही नहीं सकता।

पापाजी जब पौने नौ के समाचार सुनते हैं तो सारे बच्चों को पता है कि अब बिलकुल भी नहीं बोलना। ज़रा कोई बोला नहीं कि ऐसी डांट पड़ेगी कि फ़िर रोटी खाए बिना सो जाने का मन होने लगेगा। पापाजी मारते हैं मगर न के बराबर। शायद साल में एक-दो बार, सिर्फ़ एक थप्पड़, पीछे गर्दन पर। थप्पड़ की ज़रुरत भी क्या है! वैसे ही जान निकली रहती है। एक बार तो भाई-बहिनों में से एक ने, दूसरे को यार बोल दिया था, पापाजी ने सुन लिया। ऐसी डांट लगाई कि बुरी तरह सहम गए सबके सब। लगा कि यार भी बहुत गंदी ग़ाली है, ठीक है, नहीं बोलेंगे अबसे।

बच्चे कुछ ऐसा मांग लें जो दिलाना पापाजी के लिए संभव न हो तो वे समझाते हैं कि लाल (बेटा/बच्चा) हमेशा अपने से नीचे लोगों को देखो। उन्हें देखो जिनके पास वो भी नहीं है जो तुम्हारे पास है। बच्चे चुप। वैसे तो बच्चे बोलते ही कभी-कभार हैं फ़िर पापाजी का अपना जीवन इतना सीघा-सादा है कि उनसें बोलें भी तो क्या बोलें! फ़िर ख़्याल भी तो कितना रखते हैं सबका। कोई बच्चा बीमार हो तो दिन में भी आते हैं दुकान छोड़कर। सरल तो आए दिन बीमार होता है। माताजी से दवाई नहीं लेता। माताजी से वैसे भी कोई ढंग से डरता नहीं है फ़िर सरल से दवाई खाई ही नहीं जाती। कोई एक दिन की बात हो तो भी बात है। जब देखो तब बीमारी। जब देखो तब मोटी-मोटी गोलियां, बड़े-बड़े कैपसूल-सबके सब कड़वे। हर बार पानी अंदर चला जाता है, गोली या तो बाहर आ जाती है या मुंह में ही कहीं चिपकी रह जाती है। इसलिए कई बार तो सिर्फ़ दवा खि़लाने के लिए दुकान छोड़कर घर आना पड़ता है पापाजी को। फ़िर सरल की नहीं चलती। पापाजी दोनों हाथ पकड़कर या पकडवाकर, चम्मच ज़बरदस्ती मुंह में घुसाकर, ऊंगली घुसाकर, कैसे न कैसे दवा खि़ला ही देते हैं। दवा खिलाने के वे बड़े पक्के हैं। कभी-कभी सुबह प्रोटीनेक्स या बोर्नविटा वाले दूघ के लिए भी ज़बरदस्ती करते हैं। मगर वो कभी-कभी की बात है। दवाई के मामले में पापाजी कोई समझौता मुश्क़िल से ही करते हैं। ख़ुद भी कई दवाईयां नियमित रुप से खाते हैं।

कई बार सुबह-सुबह जलेबी या तरबूज़ लेकर आते हैं और अपने हाथ से सबको देते हैं। वे कहते हैं कि तरबूज सुबह ही खाना चाहिए। वे ऐसी बातें बहुत बताते हैं। कभी कहते हैं कि खरबूज़े के ऊपर पानी नहीं पीते तो कभी कहते हैं कि रात को दही नहीं खाते। जब भी घर पर होते हैं ऐसा ही कुछ न कुछ बताते रहते हैं। क्या खाओ से ज़्यादा वे क्या न खाओ बताते रहते हैं। और बस दवाईयां और दवाईयां। कई बार वे रात को जब दूसरे सारे काम कर लेते हैं तो सरल के गले पर विक्स अपने हाथों से मलते हैं। सरल को उनका पास बैठना अच्छा लगता है पर बुरा यूं लगता है कि दवाईयां वे ज़्यादा ही घिस-घिसकर लगाते हैं। एक तो सरल की काया वैसे ही बहुत नाज़ुक है ऊपर से हर वक्त की बीमारियां। वह तंग आया रहता है फ़िर पापाजी के हाथ कभी-कभी ख़ुरदुरे से लगने लगते हैं, ख़ासकर जब वे ज़ोर-ज़ोर से दवा रगड़ते हैं। उसके गले में पहले ही भयानक दर्द है ऊपर से यह रगड़। यह दर्द घटा रही है कि बढ़ा रही है! मगर पापाजी के आगे वह वैसे ही बहुत कम बोलता है और विक्स वे कोई अपने लिए थोड़े ही लगा रहे हैं, उसीके भले के लिए लगा रहे हैं। दिन भर के थके हुए तो आते हैं फ़िर भी देर रात जागकर उसे विक्स लगा रहे हैं। वह क्या कहे ! चुपचाप पड़ा लगवाता रहता है। पापाजी सरल का बहुत ज़्यादा ध्यान रखते हैं।

‘ए पिंटू! कैंची रख दे! लग जाएगी हाथ में! पहले भी कितनी बार मना किया है! चल रख!’

सरल कांप जाता है।

‘ए पिंटू! खाट मत उठा! तुझसे नहीं उठेगी! चल छोड़ दे, मैं उठाता हूं।’

सरल घबरा जाता है।

सरल को कुछ-कुछ अच्छा तो लगता है कि पापई कितना ध्यान रखते हैं, पर अंदर कहीं शायद बुरा भी लगता है। कैंची उठाने में इतना ज़ोर से डांटने की क्या बात है! वे बात-बात में ऐसा क्यों कहते हैं कि तुझसे नहीं होगा! शायद वह अभी छोटा है, इसलिए कहते होंगे। वे उसका बुरा क्यों चाहेंगे? बुरा चाहने वाला आदमी क्या इतना ख़्याल रखता है!

दूसरे घरों में ‘नंदन’ या ‘चंदामामा’ जैसी पत्रिकाएं आतीं हैं जिनमें अकसर भूत-प्रेत या राजा-रानी की कहानियां होती हैं। मगर पापाजी ने उन्हें ‘पराग’, सरिता और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाएं लगाके दी हैं। ‘पराग’ सरल को बहुत अच्छा लगता है। उसमें जैसे बिलकुल उसीके जैसे बच्चों की कहानियां होती हैं। कई कहानियां तो बच्चों की समस्याओं पर भी होतीं हैं। पापाजी को कौन बताता है इतनी अच्छी-अच्छी क़िताबों के बारे में! वे बोलते इतना कम हैं कि समझ में नहीं आता उनके दिल में क्या-क्या भरा है। एक बार रात को जब दुकान से आए तो बही-खातों वाले थैले में से एक पार्सल जैसा निकाला। फ़िर बड़े आराम से उसे खोला। वे किसी काम में जल्दी नहीं मचाते, हर काम धीमे-धीमे, करीने से करते हैं। पार्सल में से एक रंग-बिरंगी, चमचमाती हुई क़िताब निकल आई है। पापाजी सामने न बैठे होते तो बच्चे देखते ही लड़ने लगते कि ‘पहले मैं पढ़ूंगी’, ‘नहीं पहले मैं पढ़ूंगा’। क़िताब का नाम है ‘योगीराज’। दिल्ली प्रेस का प्रकाशन। पता नहीं पापाजी ने कब इसके बारे में पढ़ा होगा, कहां पढ़ा होगा, क्यों उन्हें लगा होगा कि यह बच्चों के लिए अच्छी रहेगी, कब, कैसे उन्होंने ऑर्डर दिया होगा! हमें क्या! हमें तो अब पहले क़िताब पढ़नी है, बाद में कुछ और करना है। यह कहानी है एक ढोंगी बंदर की जो कहीं एक आश्रम बना कर, छोटे-मोटे चमत्कार दिखाकर भक्तों को ठगता है। एक दिन जंगल के दूसरे जानवर प्लान बनाकर उसकी पोल खोल देते हैं और वह पकड़ा जाता है।

हम सब बच्चों को ऐसी क़िताबें ख़ूब भातीं हैं। सरल की तो यह ख़ास पसंद है। पापाई कई बार हमें यूंही सरप्राइज़ दे देते हैं।

(जारी)

05-09-2013


2 सित॰ 2013

वह दूसरों के जैसा नहीं है!


सौ में से निन्यानवें बार ऐसा होता है। वे सब उसके खि़लाफ़ एक हो जाते हैं। जब कभी वह घर से निकलता है, गांडू-गांडू कहकर चिल्लाते हैं, पीछे आते हैं।

कस्बा जिसमें उसका जन्म हुआ, अखाड़ेबाज़ी और लौंडेबाज़ी के लिए मशहूर है। अखाड़ेबाज़ी के शौक़ीन लोगों में से कईयों को लौंडेबाज़ी की आदत हो जाती है, ऐसा माना और बताया जाता है। जो इस आदत का शिकार बनते हैं, उन्हें गांडू कहा जाता है। और डरपोक आदमी को भी यहां गांडू कहा जाता है।

मगर ये सब तो उसके दोस्त ही हैं जो उसे गांडू कहते हैं। हमेशा नहीं कहते। उसके साथ खेलते हैं, हंसते हैं, आते-जाते हैं, मिलते-जुलते हैं। मगर कभी-कभी एकाएक न जाने क्या होता है कि वे सब एक तरफ़ और वह एक तरफ़।

वह पीला, कमज़ोर, डरपोक, घुग्घू और भौंदू-सा बच्चा। उसे पता ही नहीं चलता कि ऐसा क्या हुआ कि एकाएक वे सब उसके खि़लाफ़ हो गए!

वह जब इस घर में आया था तो आते ही उसे टाइफ़ाइड हो गया था। और वह बहुत कमज़ोर हो गया था। पहले कैसा था उसे याद नहीं। मगर इतना याद है कि टाइफ़ाइड ठीक होने के बाद दोबारा चलना सीखा था उसने। मां हाथ पकड़कर ऐसे ही चलाती जैसे छोटे बच्चे को सिखाते हैं।

कभी-कभी दिलबर चुपचाप पीछे से आता है और उसकी टांग में अपनी टांग अड़ा देता है। वह धड़ाम से नीचे आ गिरता है। सब बच्चे हंसने लगते हैं। कोई भी दिलबर से नहीं कहता कि ऐसा क्यों कर रहे हो! एक तो बिना बात किसीको गिरा रहे हो। और पीछे से आकर धोखे से गिरा रहे हो! फ़िर हंस रहे हो!

कौन कहेगा! वे तो ख़ुद भी हंसते हैं। उनके बाप खड़े हों तो बाप भी हंसते हैं, मांएं खड़ी हों तो माएं भी हंसतीं हैं, बहिनें खड़ी हों तो बहिनें भी हंसतीं हैं।

उसका मन क्यों नहीं होता कि किसीको धोखे से गिरा दे और हंसे। क्या यह दुनिया उसके जैसे लोगों के लिए नहीं है! क्या उसके जैसा होना बुरी बात है, अपराध है, हंसने की बात है! क्या जीने के लिए उसे भी इनके जैसा बनना होगा !

02-09-2013

(जारी) 

26 अग॰ 2013

बीच घर में एक निर्जन टापू


चौखट के बिलकुल ऊपरी कोने में, दीवार के सहारे एक झिरी है जिससे अपनी बायीं आंख किसी तरह सटाकर वह दुनिया को देखता है। बना-बनाया मकान ख़रीदा है पिताजी ने, नया ही है मगर चौखटों में दीमक लग गई है। सरल धीमे से एक कुर्सी घसीटकर झिरी के नीचे लाता है, सावधानी से उसपर चढ़ता है और सांस रोक कर बाहर का दृश्य देखता है। उसके अहंकार को यह मंज़ूर नहीं कि कोई उसे देखता हुआ देखे। झिरी से घरके बाहरवाले आंगन का एक हिस्सा दिखाई देता है। आंगन के बराबर वह गली है जो घर के पीछेवाली मिल तक जाती है। मोहल्ले के बच्चे कभी-कभी खेलते हुए उनके आंगन तक आ जाते हैं, या गली से गुज़रते हुए मिल में जाते हैं। वही देखना चाहता है सरल। देखते हुए उसे कुर्सी पर शरीर का संतुलन भी बनाए रखना होता है और यह भी ध्यान रखना होता है कि कमरे की ओर आती किसी पदचाप को सुनते ही कुर्सी से उतरकर उसे वापस अपनी जगह टिका देना है। उसके लिए यह दूसरे बच्चों की तुलना में ज़रा मुश्क़िल काम है। चढ़ते और उतरते वक्त उसका शरीर इतने ज़ोर से कांपता है कि लगता है कुर्सी समेत उलट जाएगा। हांलांकि देखने में ख़ुशी कुछ नहीं मिलती उसे, तक़लीफ़ ही होती है कि दूसरी बच्चे किस उन्मुक्त भाव से खेल रहे हैं, और वह यहां इस कमरे में बंद है।

सरल ने ख़ुद ही बंद कर लिया है अपने-आपको। घरके अंदरवाले आंगन में भी थोड़ी धूप आती है, मगर वह वहां भी नहीं जाता। दूसरे घरों की छतें आंगन से लगीं हैं। वह डरता है कि अगर वे बच्चे अपनी छतों पर आ गए और उसे देख लिया तो उसपर हंसेंगे, चिढ़ाएंगे कि ‘देख, गांडू यहां छुपा बैठा है।’

घरके लोग परेशान हैं ; पिताजी सबसे ज़्यादा परेशान हैं कि आखि़र इसे हुआ क्या है? वे डांटते हैं, झिड़कते हैं, कभी-कभी प्यार से भी पूछते हैं कि क्या हुआ, क्यों नहीं घरसे निकलता। पिताजी के सामने पहले भी बोलना आसान नहीं था, दिन-प-दिन और मुश्क़िल होता जा रहा है। कभी-कभी पिताजी उन लोगों को भी ले आते हैं जो उन्हें अपने लगते हैं, समझदार और दुनियादार लगते हैं। वे लोग अपनी तरह से सरल को समझाते हैं। एक पूछता है, ‘क्या हुआ, किसीने चाकू-वाकू दिखा दिया क्या?’ दूसरा सरल को ज़बरदस्ती घर से बाहर ले जाने की कोशिश करता है।  सरल कभी खाट को तो कभी दरवाज़े को इतना कसके पकड़ लेता है कि उसे बाहर निकालना लगभग असंभव हो गया है। अंततः सब यही जानना चाहते हैं कि आखि़र एकाएक ऐसा क्या हुआ कि इसने ख़ुदको कमरे में बंद कर लिया।

सरल क्या बताए ? उसे ख़ुद कुछ ठीक से समझ में आए तो बताए भी। उसे नहीं पता कि क्या हुआ है। मगर यह ज़रुर पता है कि कुछ हुआ है, कुछ होता रहता है जो उसे लगातार परेशानी में डाले रखता है। लेकिन वह ठीक से बता पाने में असमर्थ है। बहुत बार उसे भी लगने लगता है कि वह ख़ामख़्वाह बहाना बना रहा है।

और फ़िर वही अपराधबोध जिसने शायद सरल के होश संभालने से पहले ही उसे जकड़ लिया है।

26-08-2013

(जारी)


27 मई 2011

ईमानदार बाल मामाजी की बेईमान यादें-2

आखिरी बार तो मैं उनसे तब मिला था जब उनकी छोटी बेटी की शादी में उनके घर पहली बार गया। तब भी उनकी मानसिक स्थिति अच्छी नहीं थी। लेकिन उससे पहले एक बार जब वे हाथरस आए तो काफ़ी ठीक-ठाक थे। मैं भी बड़ा हो चुका था और चीज़ों को समझने का अपना एक नज़रिया मुझमें विकसित हो रहा था। वे कुछ दिन मैंने उनके साथ एक दोस्त की तरह काटे और अच्छे काटे। मैंने पाया कि बाल मामाजी एक बहुत ईमानदार और आदर्शवादी व्यक्ति थे। ईमानदार होना ही उनकी ज़्यादातर मुसीबतों और तक़लीफ़ों की जड़ था। लेकिन आश्चर्य की बात मुझे यह लगी कि अब तक उनका जो ज़िक्र मैं सुनता आया था उसके केंद्र में उनकी ईमानदारी की बात कहीं होती ही नहीं थी। अब सोचता हूं कि क्या ईमानदारी उस वक्त भी कोई क़ाबिले-ज़िक्र उपलब्धि या मूल्य नहीं था ! बाद में जो कुछ अनुभव मुझे ख़ुद हुए, मैंने पाया कि सच्चाई वाक़ई बेहद कड़वी है।
बहरहाल, बाल मामाजी कुछ रुढ़ क़िस्म के आदर्शवादी ज़रुर थे। जैसे, वे कहते कि लड़के और लड़की का संबंध आग़ और पैट्रोल की तरह होता है। सहशिक्षा के वे खि़लाफ़ थे। मैं उस वक्त तक अन्य साहित्य के साथ रजनीश को भी पढ़ने लगा था। मेरी बाल मामाजी से ख़ासी बहस होती। गांधीजी उन्हें बहुत पसंद थे और उनकी आलोचना उन्हें अच्छी नहीं लगती थी। उन्हें काका हाथरसी भी बहुत प्रिय थे। मुझे याद है जिस दिन वे काका से मिलकर आए, कितने प्रसन्न थे। इसपर भी मेरी उनसे बहस हो जाती। काका की किसी कविता की एक पंक्ति ‘रिश्वत पकड़ी जाए, छूट जा रिश्वत देकर’ उन्हें ख़ासी पसंद थी।
बाल मामाजी एक मुखर स्वभाव के व्यक्ति थे, संकोची कतई नहीं थे। घर पर आने वाले लोगों से वे स्वयं पहल करके बात करते थे। हां, जब उनकी बेरोज़गारी का ज़िक्र आता वे असहज हो जाते।
वे पक्के आस्तिक थे। नानाजी आर्यसमाजी थे और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। बाल मामाजी के आदर्श और आस्तिकता भी संभवतः वहीं से आए थे। किसी राजनीतिक दल, किसी वाद-विशेष, किसी समाज सेवी संस्था आदि-आदि से बाल मामाजी का कोई लेना-देना नहीं था।

उस दौरान पहली बार उन्होंने मुझे नौकरी छोड़ने का कारण बताया। बाल मामाजी मध्य प्रदेश में किसी ऐसी जगह सरकारी स्कूल में टीचर थे जहां भयानक अकाल पड़ता था। सरकारी मदद के तौर पर जो अनाज (जो कि शायद निहायत ही सस्ती सी कोई चीज़ होती थी) और पैसे आते थे, उनका वितरण स्कूलों के द्वारा भी होता था। बाल मामाजी ने बताया कि वहां भारी घपलेबाज़ी होती थी। ईमानदारी और आदर्शों के मारे बाल मामाजी से यह बर्दाश्त नहीं होता था। वे अकसर विरोध करते और शायद शिकायत भी करते थे। अंतत नतीजा वही हुआ कि बाल मामाजी को तरह-तरह से परेशान किया जाने लगा। विस्तार से तो नहीं पता, पर कुछ ऐसा हुआ कि वे बहुत डर गए और गए और नौकरी छोड़कर चले आए।
ख़ैर, यह सब बताकर, कुछ दिन और रहकर बाल मामाजी चले गए। फिर एक दिन ख़बर आयी कि बाल मामाजी ने आत्म-हत्या कर ली है। अगर मैं कहूं कि यह सुनकर मुझे दुख हुआ या मैं रोता रहा तो यह झूठ होगा। जैसी कष्टपूर्ण ज़िंदगी उनकी थी, उसमें उनके चले जाने में ही उनके और दूसरों के लिए राहत दिखाई पड़ती थी।
मगर कुछ सवाल वे छोड़ गए। जिनमें सबसे बड़ा सवाल मेरे लिए यह है कि क्या सीज़ाफ्रीनिया के सारे रोगी एक जैसे होते हैं और सबको एक ही नज़रिए से देखा जाना चाहिए ? मुझे नहीं याद आता कि कभी किसीने मुझे यह बताया हो कि बाल मामाजी बचपन से ही ऐसे थे। वे बात-बात पर शक किया करते थे या अपने विचारों को ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते थे। मेरा मानना है कि हमें आम आदमी और एक ईमानदार आदमी के सीज़ोफ्रीनिया को एक ही निगाह से नहीं देखना चाहिए। जिस आदमी ने भी कभी अकेले दम भ्रष्टाचार से लड़ने या भीड़ के खि़लाफ़ खड़ा होने की कोशिश की है, वह समझ सकता है कि ऐसे में किस सामूहिक मानसिकता का सामना करना पड़ता है। हमारी हक़ीकत उम्मीद से कहीं ज़्यादा कड़वी है। यहां ईमानदार आदमी को पहले उपहास, दया और अपमान का पात्र बनाया जाता है, उसके बाद उससे तरह-तरह के सवाल पूछे जाते हैं। आप ईमानदारी की सिर्फ़ बातें करें, हर कोई आपसे ख़ुश रहेगा। मगर जैसे ही आप व्यवहारिक रुप से ईमानदारी पर उतरेंगे, वे लोग भी आपसे कतराने लगेंगे जिन्होंने बचपन से आपको आदर्श सिखाएं हैं। संगठित बेईमान आपको कटघरे में खड़ा कर देंगे। हांलांकि बाल मामाजी के साथ ऐसा नहीं था। नानाजी और नानीजी उनके प्रति नरम रवैय्या रखते थे। मगर मुश्क़िल शायद यह भी थी कि गांधीजी से प्रभावित नानाजी ने उन्हें आदर्श तो दे दिए थे मगर उन आदर्शों को पालने के लिए जो साहस चाहिए था, वह कहीं छूट गया था। मुश्क़िल यह भी थी कि बाल मामाजी सीघे, सरल और कुछ हद तक सपाट आदर्शवादी थे, रणनीतियां उन्हें नहीं आती थीं और इसमें शायद उनका विश्वास भी नहीं था। जबकि बेईमान व्यक्तियों/माफ़ियाओं की मानसिकता ऐसी होती है कि उन्हें अगर यह मालूम हो जाए कि यह आदमी मानसिक रोगी है तो वे इसका भी पूरा लाभ उठाने की कोशिश करते हैं। वे इतने संगठित, मनोविकृत, क्रूर और बदनीयत होते हैं कि ठीक-ठाक आदमी को भी पागल कर देने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में एक अकेले पड़ गए ईमानदार और संवेदनशील व्यक्ति को समझने और उसकी मदद करने की बजाय सारा दोष उसके सीजोफ्रीनिया पर डालकर मामले को बिलकुल एकतरफ़ा बना देना क्या क्रूरता और नासमझी नहीं है !? क्या यह सीधे-सीधे बेईमान पक्ष को बढ़ावा या खुली छूट देना नहीं है ? 
दूसरा सवाल यह है कि बाल मामाजी अगर अपनी ईमानदारी के चलते बाहर ऐडजस्ट नहीं कर सकते थे तो क्या उन्हें घर के काम नहीं दिए जा सकते थे ? उन्हें मेहनत वाला कोई काम करने में ऐतराज़ नहीं था। आखि़र मर्द का बाहर जाकर 9 टू 5 नौकरी करना या 10 टू 10 व्यवसाय करना इतना ज़रुरी क्यों है ? यह कोई कुदरत की बनाई व्यवस्था तो है नहीं, इंसान ने ही बनाई है। तो फ़िर किसी इंसान की भलाई के लिए इसे तोड़ा या बदला क्यों नहीं जा सकता ? स्त्रियां भी तो आज घर से बाहर निकलकर काम कर रहीं हैं। ऐसा हमेशा से तो नहीं था।
तीसरा, जो मां-बाप अपने आदर्शवादी बच्चों का साथ नहीं दे सकते वे उन्हें आदर्श सिखाते ही क्यों हैं ?
ये सवाल जितने दूसरों के लिए हैं, उतने ही मेरे लिए भी सोचने के हैं।
आज अगर बाल मामाजी होते तो कोई वजह नहीं थी कि वह अन्ना हज़ारे के साथ जंतर-मंतर पर जाकर न बैठ जाते। वे एक बच्चे जैसे भोलेपन के साथ श्रद्धा किया करते थे।
आज जब भ्रष्टाचार-विरोध और ईमानदारी के नारों की धूम है, क्या दुनिया में ऐसा भी कोई व्यक्ति होगा जो बाल मामाजी को पागल नहीं बल्कि एक ईमानदार शख़्स के तौर पर याद करता होगा ?

-संजय ग्रोवर

पिछला हिस्सा

3 मई 2011

ईमानदार बाल मामाजी की बेईमान यादें-1

आज सोचता हूं तो शर्म आती है कि मैं बाल मामाजी को घूरता था।
इस हद तक घूरता था कि वे डर जाएं। और वे डर भी जाते थे। डरते न तो क्या करते ? हर कोई उन्हें पागल, डरपोक, मूर्ख और निठल्ला साबित करनें में जो लगा रहता था।
और मैं भी वही कर रहा था जो बाद में मैंने बड़े-बड़े ‘बहादुरों’ को करते देखा। जहां कोई सॉफ्ट टारगेट दिख जाए, बहादुरी दिखाना शुरु कर दो।
होश संभालने के बाद से ही बाल मामाजी से जो परिचय हुआ, कुछ ऐसा ही हुआ कि मन में उनकी छवि एक पागल या जान-बूझकर काम से जी चुराने वाले निकम्मे आदमी की बन गयी थी।
जब हमें पता लगता कि बाल मामाजी हमारे यहां रहने आ रहे हैं, हमारी जैसे जान निकल जाती। मैं और मेरी पांच बहिनें। मां और पिताजी। हम आठों में उस वक्त कोई फ़र्क था तो बस इतना कि कोई ज़्यादा डरपोक था कोई कम। कोई ज़्यादा शर्मीला था कोई कम। किसीमें हीन भावनाएं कुछ ज़्यादा थीं तो किसीमें कुछ कम। सबसे बुरे हाल मेरे ही हुआ करते थे। जितने दिन बाल मामाजी घर में रहते, हमारी हालत और ख़राब हो जाती। कब कौन बाल मामाजी की कोई शिकायत लेकर हमारे दरवाज़े आ खड़ा होगा, ऐसी आशंका से हम हर वक्त घबराए रहते।
कभी कोई ठेलेवाला किसी परिचित या पड़ोसी को लेकर आ खड़ा होता और पूछता कि वो जो चश्मा लगाते हैं और फ़लां तरह के कपड़े पहनते हैं, क्या इसी घर में रहते हैं ? हम समझ जाते कि मामाजी ने इसकी ठेली से कुछ उठा लिया होगा और पैसे नहीं दिए होंगे। एक बार तो मामाजी ने किसी बैंक से पैसे तक उठा लिए थे। पिताजी की जानकारियों और सज्जन छवि ने बचा लिया था वरना हमें तो कांपने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था। सुना था कि एक बार बाल मामाजी ने बड़े मामाजी के बेटे को खिड़की से बाहर लटका दिया था कि ‘फेंकता हूं अभी’। पता नहीं बाद में क्या हुआ पर ज़ाहिर है कि उस वक्त वहां मौजूद सभी लोगों के प्राण हलक में आ गए होंगे।
मां कोई चालाक और ज़्यादा व्यवहार कुशल महिला नहीं थीं और उन्हें अपने भाई को लेकर परिचितों के तरह-तरह के सवालों का सामना करना पड़ता। ‘बाल आजकल क्या कर रहा है?’, ‘कोई नौकरी मिली?’, ‘पहलेवाली क्यों छोड़ दी ?’, ‘क्या कोई दिमाग़ी परेशानी है ?’ आदि-आदि।
आखिरी सवाल ऐसा था जिससे हम हर बार बचना चाहते पर कभी बच न पाते। जैसा कि उस वक्त सामाजिक माहौल भी था, हमारे मन पर भी ‘पागल’ शब्द का प्रभाव ऐसा ही था।
यूं तो बाल मामाजी में छोटे-बड़े कई हुनर थे पर वे गाना बहुत अच्छा गाते थे। ख़ासकर रफ़ी के गाए देशप्रेम के गीत। गाना गाते हुए वे मुझे भी बहुत भले लगते। वे शौकिया गाते पर अकसर ऐसे गीत गाते जिनमें आदर्शों की बात हो। वे पेंटिंग भी ठीक-ठाक कर लेते थे। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी का ख़ासा साहित्य उन्होने पढ़ रखा था। एम.एस.सी. करने के बाद स्कूल टीचर की सरकारी नौकरी उन्हें मिल गयी थी जिसे वे न जाने क्यों छोड़कर चले आए थे और मारे-मारे फिर रहे थे।
मेरे कई मित्र बाल मामाजी के साथ क्रिकेट खेलकर आनंदित होते। उन्हें कसरत और तेल मालिश का भी ख़ासा शौक था। कई बार कहते, पप्पू चल छत पर चल तेरी भी मालिश करुंगा। मैं इतना शर्मीला था कि घर के बंद कमरे के अलावा कहीं कपड़े उतारने की सोच भी नहीं सकता था, ख़ुली छत पर नंगे बदन मालिश करवाना तो मेरे लिए बहुत दूर की कौड़ी थी।
किसी भी किस्म की शारीरिक मेहनत से बाल मामाजी को कोई शर्म या परहेज़ नहीं था। वे बरतन मांजने को भी तैयार रहते और ख़ूब चमका-चमका कर मांजते। मगर घर के बाहर उन्हें जिस भी काम पर लगाया जाता, थोड़े ही दिन में छोड़कर चले आते। कई बार वे रसोई से चीज़ें चुराकर खा जाते और पकड़े जाने पर माताजी से तरह-तरह के तर्क करते। तो कई बार वे खाने में कुछ मिला होने का शक करते हुए खाने से इंकार कर देते। बाद में मुझे पता चला कि वे सीज़ीफ्रीनिया नामक मनोरोग का शिकार थे। उनकी पत्नी यानि हमारी मामी की नौकरी और रिश्तेदारों-परिचितों की मदद से किसी तरह उनका घर चलता। कभी वे नाना-नानी के पास रहते, कभी अपने बड़े भाई, कभी हमारे यहां तो कभी अपने पत्नी-बच्चों के पास। जिस किसी के पास भी वे रहते उसे भारी मानसिक तनाव और अन्य परेशानियों से गुज़रना पड़ता। उनकी अजीबो-ग़रीब हरकतें जारी रहतीं। साथ ही काम की तलाश, नौकरियां करना-छोड़ना भी  चलता रहता। बीच-बीच में उनकी मानसिक चिकित्सा भी चलती। कई बार बिजली के झटके भी दिए जाते। हममें से किसीकी भी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि उनके जीवन को अपनी ज़िम्मेदारी बना ले। मां का अपने भाई के प्रति स्नेह व कुछ हद तक साहस और पिताजी के प्रगतिशील विचार थे कि वे कई-कई महीने हमारे घर रह जाते।
-संजय ग्रोवर

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3 दिस॰ 2010

मोहे अगला जनम ना दीजो-1

क्या करे इन हाथों का ? काट डाले इन्हें ? फेंक आए कहीं जाकर ? या हरदम ढंक कर रखे कहीं ? छुपा दे ! या किसी खुरदुरी चीज़ पर तब तक रगड़ता रहे जब तक दूसरे लड़कों की तरह मर्दाने, खुरदुरे, सख्त या गंठीले ना हो जाएं। तनहाई के छोटे से छोटे वक्फ़े में भी ये हीन भावनाएं, ये अपराध-बोध सरल का पीछा नहीं छोड़ते। किसी से हाथ मिलाने से भी डरता है, बचता है सरल। बीच-बीच में सुनने को मिल जो जाता है- ‘अरे यार, तुम्हारे हाथ तो लड़कियों से भी ज़्यादा मुलायम हैं।’'अगर रात अंधेरे में तेरा चेहरा देखे बगैर कोई तुझसे हाथ मिलाए तो यही समझेगा किसी लड़की का हाथ पकड़ लिया है।'
तिस पर दुबला-पतला-पीला शरीर। शर्मीला स्वभाव। तरह-तरह के फोबिया। ज़रा कुछ खट्टा या तला हुआ खाले तो खांसी, ज़ुकाम, पेटदर्द । महीने में 15 दिन बिस्तर पर गुज़रते हैं। धैर्य नाम की चीज़ से सरल का कोई वास्ता है नहीं। लोग उसकी चुप्पी और अवसाद को ही उसका धैर्य समझ लेते हैं तो उसका क्या कसूर। अशांति का महासागर ठाठें मारता रहता है सरल की छोटी-सी खोपड़ी में। बिस्तर में रहता है तो तरह-तरह की अच्छी बुरी कल्पनाएं और फंतासियां भी साथ रहती ही हैं।
कैसी-कैसी कल्पनाएं हैं सरल की ! एक ऐसी पोशाक बनवाए जिसमें से उसकी तो एक उंगली तक न दिखे पर वह सबको समूचा देख सके। कोई ऐसी कार मिल जाए उसे कि वह तो अंदर से सबको देखले पर उसकी किसी को झलक तक न मिले।
एक तो पड़ा-पड़ा जासूसी उपन्यास पढा करता है ऊपर से जाने किसने दे दिए हैं उसे ये फोबियाओं के उपहार। कहां से क्यों आ गया यह जानलेवा अपराध-बोघ! भयानक असुरक्षा की भावना। इस तरह लोगों से छुपकर, डरकर, शरमा कर अंधेरे कमरों की ओट में कैसे काटेगा वह अपनी ज़िंदगी !
(जारी)

संवादघर पर पूर्व-प्रकाशित