22 दिस॰ 2010

नामर्द और नाइंसान में कौन बेहतर !?

कई दिन से पढ़ रहा है सरल। डेढ़ साल से ज़्यादा हुआ, टी.वी. नहीं देखा। रिकॉर्डिंग मिल जाएगी यूट्यूब पर। देख सकता है। नेट की सुविधा तो है न उसके पास।
अपने शो में राखी ने किसी को नामर्द कह दिया। लक्ष्मण नाम बताते हैं उसका। लक्ष्मण ने आत्महत्या कर ली। क्या दोष था लक्ष्मण का ? और क्या दोष दें राखी को !
नामर्द कहलाने से पुरुष कितना डरता आया है, सरल से बेहतर कौन जानता है ?
वही संस्कार लक्ष्मण के और वही समझ राखी की।
भीड़ और हवा की ग़ुलामी।
कोई अपनी मर्ज़ी से लैंगिक विकलांग नहीं होता। कोई अपनी मर्ज़ी से दलित नहीं होता, स्त्री नहीं होता, पुरुष नहीं होता। तो अपनी मर्ज़ी से नामर्द क्यों होगा !?
शायद ऐसे भी उदाहरण रहे हों कि किसी औरत को ‘ठंडी’, ‘बांझ’, ‘फ्लैटचैस्टेड’(वक्ष विहीन) कहा गया हो और उसने आत्महत्या कर ली हो !
सच पूछो तो 15 से 45 का हो जाने के बाद भी सरल कभी समझ नहीं पाया कि कितना वह मर्द है और कितना नामर्द। एक क़िताब पढ़ता तो उसे लगता कि उससे बड़ा मर्द कोई नहीं दुनिया में। दूसरा लेख पड़ता तो शर्म आती कि वह तो पूरी तरह नामर्द है फिर भी ज़िंदा है।
क्या पैमाना है मर्दानगी का ? औरत की यौन-संतुष्टि !? किस हद तक ? कितनी औरतों की ? वो हरम, वो हज़ारों रानियां-पटरानियां ? किसने जाना होगा कि वहां कौन कितना संतुष्ट था !
फिर ठंडी औरतों का क्या करें ? उन्हें भी ख़ुदकुशी का रास्ता दिखाएं दोबारा ?
सरल तो पढ़ता आ रहा है कि ख़ुद औरतों ने भी अभी जानना शुरु किया है अपनी यौन-संतुष्टि के बारे में !
कितने ही मर्द थे जो तर्क देते थे कि हम वेश्याओं या दूसरी औरतों के पास इसलिए जाते हैं कि पत्नी से संतुष्टि नहीं होती।
क्या राखी हमें लौटाकर वहीं ले जाना चाहतीं हैं !?
क्या शादी से पहले लक्ष्मण ने अपनी होने वाली पत्नी को कोई वचन दिया था यौन-संतुष्टि का ? क्या ससुराल पक्ष ने इस विषय में कोई जानकारी मांगी थी ? क्या हमारे यहां शादियों से पहले ऐसा कुछ आवश्यक समझा गया है ?
राखी को जानना चाहिए कि हमारे यहां इस मुआमले में स्त्री जितनी मजबूर है, उतना ही पुरुष भी। बल्कि शादी न करने पर एक शक पुरुष पर यह भी किया जाता है कि कहीं वह नामर्द तो नहीं ! जिस तरह दहेज  और दूसरे रीति-रिवाजों पर स्त्री का कोई वश नहीं होता उसी तरह शादी के संदर्भ में अपनी मर्दानगी को जानने और बताने को लेकर पुरुष भी कुछ कम मजबूर नहीं होता।
नामर्दी या ‘नाऔरती’ एक व्यक्तिगत मामला है जबतक कि कोई पुरुष या स्त्री दूसरे पक्ष के साथ कोई ऐसा संबंध नहीं बनाता जिसमें यौन-संतुष्टि एक अनिवार्य पक्ष हो। शादी एक ऐसा ही संबंध है मगर अपने यहां शादियों में, विवाह से पहले, यौनसंबंधी तथ्यों के आदान-प्रदान का ऐसा कोई प्रचलन या रिवाज नहीं है इसलिए एक ही पक्ष को दोषी ठहरा देना उचित कैसे कहा जा सकता है !?
नामर्द, समाज का कुछ नहीं ले रहा होता, वह समाज को किसी तरह की हानि नहीं पहुंचा रहा होता। ठीक उसी तरह जैसे एक अविवाहित ‘ठंडी’, ‘बांझ’, वक्ष-विहीन, या स्त्री के लिए सौंदर्य और सेक्स के संदर्भ में तयशुदा मानदण्डों पर खरी न उतरने वाली औरत।
ऐसे ताने मत मारो राखी जिनकी वजह से अब तक ख़ुद औरत का सांस लेना मुश्किल बना हुआ था।
लक्ष्मणों को बख़्शो राखी।
हां, चाहो तो सरल को नामर्द कहो। वह ख़ुदकुशी नहीं करने वाला। आज इतना परिपक्व तो हो ही चुका है कि आपकी मानसिक अपरिपक्वता को समझ सके।

-संजय ग्रोवर

24 टिप्‍पणियां:

  1. भीड़ और हवा की ग़ुलामी करते हुवे इन्सान नामर्द हुवा है.....उन इंसानों में गर सरल आता है तो उसी दायरे में राखी भी आती हैं.....फर्क सिर्फ इतना है नामर्द जुमले पर सरल सुसाइड करता है......और राखी इस जुमले को बोल कर लोगों के अहम् कि santusti ये सब बोलते वक़्त वे खुद भी नामर्द साबित हो जाती हैं...जिनकी मर्दानगी शो को मिलने वाले पैसे से खरीदी जा सकती हो...

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  2. संजयजी,
    नामर्द होना कोई गुनाह नही है, बेशक नामर्द और नाइंसान में नामर्द ही बेहतर है.

    --Anita Bharti

    (VIA EMAIL)

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  3. @निर्झर'नीर
    jo bhi hai aapse bachke kahaaN jaayega.
    Ek din to saamne aayega.

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  4. अच्छा लगा लेख, सेक्स को लेकर हम जीतनी संकीर्ण सोच रखते है गलत बोलनें में उतनी ही छूट हम अपनी ज़ुबान को दे देते है। थोड़ी ढील वहां छोड़े और थोड़ी लगाम यहां कसे तो समझ बने।

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  5. किसी को भी अपशव्द कहना ही गल्त हे जी फ़िर इस ओरत को तो बोलने का ढंग भी नही आता तो इस की बात कया करे, क्यो करे?

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  6. khud raakhi ne saadi karne ka natak kar ke saadi nhi kiya...uski kya kaha jaye:P


    sanjay ji hamare ek matra blog pe kbhi aao na:)

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  7. 'क्या पैमाना है मर्दानगी का ? औरत की यौन-संतुष्टि !? किस हद तक ? कितनी औरतों की ? वो हरम, वो हज़ारों रानियां-पटरानियां ? किसने जाना होगा कि वहां कौन कितना संतुष्ट था !'
    स्‍वयं के अस्तित्‍व को समझे बिना परिभाषायें घड़ लेने वाले जब परिभाषायें थोपना चाहते हैं तो कष्‍टकर हो जाती है स्थितियॉं।
    तत्‍काल यौवन देने का दावा करने वाली फ़ार्मेसी के नजरिये से देखें तो जिस आदमी की गुलमुच्‍छ नहीं वह नामर्द है, जो दिन भर कामेच्‍छा लिये नहीं घूमता वह नामर्द है।
    जो बेटा मॉं के कहने पर अपनी पत्‍नी को दो झापड़ रसीद न करदे वह नामर्द है। जो पति त्‍नी के कहने पर अपनी मॉं को घर से निकाल दे वह नामर्द है। खूब लड़ी मर्दानी वो तो झॉं‍सी वाली रानी थी के नजरिये से भी देखें।
    सबकी अपनी अपनी परिभाषायें हैं मर्दानगी की।
    मर्दानगी कुल मिलाकर प्रतिबद्धता का प्रश्‍न है और यह तो तय है कि इंसान का इंसान होना ज्‍यादह जरूरी है।
    मैं शराफ़त से खड़ा बस सुन रहा था
    तुम ही जानो तुमने क्‍यूँ ये बाण छोड़े।

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  8. वो शराफ़त से भरा इंसान था, सुनता रहा
    तुमने जाने क्‍या समझकर, जाने क्‍या क्‍या कह दिया।

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  9. आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (27-12-20210) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.uchcharan.com

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  10. वंदना जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आपका। उम्मीद है जब तक कुछ क़ाबिले-ज़िक्र लिखता रहूंगा, आपका स्नेह बना रहेगा।
    तिलकराज जी, संभवतः आपने यह अंश पढ़े होंगे फिर भी आपने याद दिलाया तो......दूसरे मित्र भी इससे लाभाविंत होंगे:
    --स्व. कृश्न चंदर कृत ‘एक गधे की आत्म कथा’ से एक अंश--

    ***दिल्ली का भूगोल

    इसके पूर्व में शरणार्थी, पश्चिम में शरणार्थी, दक्षिण में शरणार्थी और उत्तर में शरणार्थी बसते हैं। बीच में भारत की राजधानी है और इसमें स्थान-स्थान पर सिनेमा के अतिरिक्त नपुंसकता की विभिन्न औषधियों और शक्तिवर्धक गोलियों के विज्ञापन लगे हुए हैं, जिससे यहां की सभ्यता तथा संस्कृति की महानता का अनुभव होता है। एक बार मैं चांदनी चौक से गुज़र रहा था कि मैंने एक सुन्दर युवती को देखा, जो तांगे में बैठी पायदान पर पांव रखे अपनी सुन्दरता के नशे में डूबी चली जा रही थी और पायदान पर विज्ञापन चिपका हुआ था, असली शक्तिवर्धक गोली इन्द्रसिंह जलेबी वाले से खरीदिए !’ मैं इस दृश्य के तीखे व्यंग्य से प्रभावित हुए बिना न रह सका और बीच चांदनी चौक में खड़ा होकर कहकहा लगाने लगा। लोग राह चलते-चलते रुक गए और एक गधे को बीच सड़क में कहकहा लगाते देखकर हंसने लगे।

    वे बेचारे मेरी धृष्ट आवाज पर हंस रहे थे और मैं उनकी धृष्ट सभ्यता पर कहकहे लगा रहा था। इतने में एक पुलिस के संतरी ने मुझे डण्डा मारकर टाउन हाल की ओर ढकेल दिया। इन लोगों को मालूम नहीं कि कभी-कभी गधे भी इन्सानों पर हंस सकते हैं।***

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  11. नमस्कार संजय जी ,

    आपका लेख पढा अच्छा लगा लेकिन ये बात राखी को बताने की जरूरत हैं।


    --Abhimanyu Singh

    (VIA EMAIL)

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  12. अभिमन्यु जी,
    हौसला-अफ़ज़ाई के लिए आभार।
    मेरे ख़्याल से यह बात सारे समाज के लिए विचारणीय है क्योंकि समाज ने भी इसपर अभी तक खुलकर नहीं सोचा है और राखी भी इसी समाज की देन हैं। राखी को अलग से ज़्यादा दोष देना भी मुझे ठीक नहीं लगता। जहां तक उन तक बात पहंुचाने की बात है, आप जानते ही हैं कि ब्लाॅग को दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति खोलकर पढ़ सकता है। मेरे पास उनका ईमेल भी नहीं है।
    शुभकामनाओं सहित,

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  13. मैं तब छठी कक्षा में पढ़ता था जब मुझे इन्‍हें पढ़ने का अवसर मिला था। क्‍यूँ पढ़े थे मैं नहीं जानता, 10 वर्ष की उस उम्र में यह पढ़कर समझ पाना कठिन रहा होगा और मुझे यह स्‍वीकारने में कोई संकोच नहीं कि अब टाईटल और लेखक भर याद बचा है। कालोनी की लाईब्रेरी में ऐसा बहुत कुछ था। एडगर एलन पो की एक पुस्‍तक 'रहस्‍यमयी', जो उस समय पढ़ी थी, उसकी अभी भी तलाश है। 'एक गधे की आत्‍मकथा' और 'एक गधे की वापिसी' संभवत: उस समय के सबसे चर्चित और जीवंत दस्‍तावेज़ थे।
    जहॉं तक राखी (राखी सावंत) का प्रश्‍न है, इसमें कोई शक नहीं कि राखी ही नहीं, ऐसी सभी मानसिकतायें, समय, काल और परिस्थितियों से जन्‍म लेती हैं। राखी अपने हुनर में माहिर है, उसे मालूम है कि कब कितना 'सिलिकॉन दर्शन' कराना है और कैसी फ़ूहड़ता से पेश आना है जिससे एक अलग पहचान बने। और समाज स्‍वीकारता है इस रूप को तो बढ़ावा तो मिलेगा ही ऐसी मनोवृत्ति को।

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  14. संजय बेटा
    आशीर्वाद
    लेख अच्छा लगा

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  15. sanjay ji,
    kuchh sawaal aise hote hain jinke jawaab hum de sakte lekin jawaab ki samajh sawaal karne waalon ko nahin hoti. stree-purush ke jivan kee santushti ke maap ka paimana kis aadhar par ho, yahi to samajh se parey hai. saral samajh bhi pata hai tab jab samaj usko bhool chuka hota hai. ya raakhi see koi kah bhi de ki purush naamard fir kyon fark pad jata, aur koi lakshman aatmhatya kar leta? jab stree yugon se baanjh, thandi, ubaau, bojh aadi sunti hui bhi duniya chala rahi fir is shabd ko hamara samaj sweekaar bhale na kare lekin lakshmanon ko apne ko isi roop mein sthaapit karna hoga. sahi likha aapne...कोई अपनी मर्ज़ी से लैंगिक विकलांग नहीं होता। कोई अपनी मर्ज़ी से दलित नहीं होता, स्त्री नहीं होता, पुरुष नहीं होता। तो अपनी मर्ज़ी से नामर्द क्यों होगा !?
    saare sawaalon ka jawaab bass yahi hai. hum jo hain usi roop mein sweekrit hon. bahut achha lekh, shubhkaamnaayen.

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  16. गंभीर विषय उठाया है आपने...इसमें से राखी सावंत और प्रसंग विशेष को छोड़ दें तो बात विचारणीय तो है ही...

    जीवन इतना सस्ता है की इसे इन कारणों पर वार जाए...?????? मुझे क्षोभ होता है...

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रुके-रुके से क़दम....रुक के बार-बार चले...

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