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21 जून 2018

वो तो लड़के भी करते हैं

लड़के को मैं भली-भांति जानता था, इसलिए उसके भोलेपन और मासूमियत का मुझे अंदाज़ा था। तबियत भी ख़राब रहती थी उसकी, लेकिन वो रसोई के काम बिना किसी मेल ईगो को बीच में लाए कर देता था। उसकी ऐसी ईगो दूसरे कुछ मामलों में ज़रुर देखने को मिलती थी। उसकी बहिनों के ब्वॉय-फ्रेंडस् थे, उसकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी। मेरे मन में एक कसक-सी उठती थी जब मैं अपनी एक झलक, पूरी तो नहीं, मैं तो बहुत विद्रोही रहा हूं, कुछ-कुछ उसमें देखता था, मुझे उसके भविष्य की चिंता होने लगती थी। मैंने उसकी बहिनों से पूछा तो उन्होंने बताया कि एक लड़की इस में बहुत इंट्रेस्टेड है, पर यह उसे भाव नहीं देता।

मैंने एक दिन अकेले में उससे इस बारे में बात की, उसने कहा कि ‘लड़कियां झूठ बोलतीं हैं, चुगली लगातीं हैं, एक-दूसरे में लड़ाई करवा देतीं हैं.....

मेरे पास दो रास्ते थे, एक-कि उससे कहूं कि लड़कियां बहुत महान होतीं हैं, उनका सम्मान करना चाहिए, उनसे सीखना चाहिए.....

पर मैंने दूसरी, अपने अनुभव के अनुसार सच्ची और व्यवहारिक बात कही क्योंकि मुझे लगा कि लड़के की शिक़ायतें बिलकुल ग़लत भी नहीं हैं......

मैंने कहा कि चुगलियां तो लड़के भी करते हैं, झगड़े भी करते-कराते हैं, जब ऐसे लड़कों से दोस्ती में कोई दिक्क़त नहीं है तो लड़कियों से क्यों.....

बात बन गई थी। बाद में मुझे पता चला कि लड़के की दोस्ती उसी लड़की से हो गई थी।

बाद में कई साल मैं उनसे मिला नही, मौक़ा ही नहीं मिला, वरना क्या पता मुझे उनसे ईर्ष्या होने लगती।

-संजय ग्रोवर
21-06-2018


22 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-7

(पिछला भाग)


आजकल जगह-जगह सुनने को मिलता है कि औरतें तो समझदार हो गईं हैं अब तो बस मर्द को बदलना है।
क्या वाक़ई ऐसा है? क्या हम ज़रा-सा सच सुनने या पढ़ने को तैयार हैं ? वे कौन औरतें हैं जो यह सुनकर ख़ुश हो रहीं हैं कि ‘हर औरत का सम्मान करना चाहिए’ या ‘मैं स्त्रियों का बड़ा सम्मान करता हूं......’

झूठी तारीफ़ सुनकर ख़ुश हो जाना स्त्रियों और पुरुषों दोनों की कमज़ोरी है। मगर हर किसी का सम्मान करना क्या व्यवहारिक रुप से संभव है ? क्या स्त्रियां स्वयं सभी स्त्रियों का सम्मान कर सकतीं हैं ? क्या पुरुष सभी पुरुषों का सम्मान करते हैं ? क्या सम्मान इतनी सतही और सस्ती चीज़ है ?

अगर ‘मैं सभी स्त्रियों का सम्मान करता हूं’ जैसे जुमले छोड़नेवाले लोग बहुत महान और स्त्रीवादी हैं तो वे कौन लोग थे जो ‘स्त्रियां त्यागी होतीं हैं’, ‘स्त्रियां संतोषी होतीं हैं’, ‘स्त्रियां समर्पिता होतीं हैं’ जैसे झांसे दे-देकर स्त्रियों से सालोंसाल मुफ़्त में काम निकालते रहे? और वे कौन लड़के थे जो लड़कियों को ‘फंसाने/पटाने’ के लिए कैसा भी झूठ बोलने को तैयार रहते थे ? क्या ये सब स्त्रीवादी थे ?

अगर आप किसीसे ज़बरदस्ती आदर लेंगे, उसपर अपनी इच्छाएं थोपेंगे तो क्या वह आपसे ख़ुश होगा? ख़ुद स्त्रियां जिन्हें ज़बरदस्ती मर्द का आदर करना पड़ा, अब मौक़ा मिलते ही मर्दों को भर-भरके ग़ालियां दे रहीं हैं।

और ज़बरदस्ती के इस 'स्त्री-सम्मान' के परिणाम भी कुछ अलग़ होंगे, मुश्क़िल ही लगता है।

आखि़र आप ख़ामख्वाह हर किसीसे सम्मान चाहते ही क्यों हैं ? ऐसा क्या कर दिया आपने ? अगर कोई आपका सम्मान नहीं कर रहा तो इसका मतलब यह कैसे हुआ कि वह आपका अपमान या नुकसान कर रहा है ?

उसे लगता है कि जिस भी किसीको, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, अकारण ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से सम्मान पाने की चाह है, उसे एक बार मनोचिकित्सक से भी मिल लेना चाहिए।

क्या वे स्त्रियां भी समझदार हो गईं हैं जो स्त्रीविरोधी कॉमेडी शोज़ में पूरे उत्साह के साथ शामिल होतीं हैं !? यह कैसी समझदारी है कि आपकी स्त्रीमुक्ति में जागृति सिर्फ़ वहां-वहां उभरकर आती है जहां कुछ बोलने में कोई ख़तरा नहीं है!? या जिन लोगों/वर्गों/वर्णों को जलील करना आसान है, जिनका उपहास लोग इस तरह करते आ रहे हैं जैसे उन्हें उपहास के लिए ही बनाया गया हो, उन्हींके सामने एकाएक आपमें सारी नारीमुक्ति जागृत हो जाती है ? इसकी एक वजह है कि भारत में स्त्रियां अकसर धार्मिक हैं इसलिए जातिवादी भी हैं। एक दिन उसने अथीज़्म शब्द यूट्यूब में डालकर सर्च किया तो पाया कि अच्छी-ख़ासी मात्रा में  दुनिया-भर की स्त्रियां नास्तिकता पर खुलकर चर्चा करतीं हैं जबकि भारतीय पुरुषों तक के वीडियो वहां गिनी-चुनी मात्रा में हैं।

क्या वे स्त्रियां भी समझदार हैं जो हर वक्त सारा दोष पुलिस और नेताओं को देतीं हैं? क्या उन्हें इतना भी नहीं पता कि ऐसी क़िताबें जिनमें ‘एक मर्द की गवाही दो औरतों के बराबर होती है’, पुलिसवालों ने नहीं लिखी ? क्या उन्हें यह नहीं पता कि आज तक ऐसी कोई घटना देखने में नहीं आई जहां किसी नेता ने किसी आम आदमी को दहेज़ लेने या देने को मजबूर किया हो ?

आजकल कई जगह यह भी पढ़ने में आ रहा कि पुरुष बड़े बदतमीज़ हैं, वे रास्तों पर हमारे क्लीवेज़ देखने लगते हैं। हो सकता है बहुत-सी स्त्रियों ने क्लीवेज का फ़ैशन सिर्फ़ स्त्रियों को दिखाने के लिए अपनाया हो, मगर यह जानने में कोई बुराई नहीं है कि देखना, घूरना, छेड़ना और बलात्कार करना सब अलग़-अलग़ बातें हैं। किसी व्यक्ति या ऑबजेक्ट के किसी हिस्से को हमें देखना चाहिए या नहीं देखना चाहिए, यह निर्णय भी तो आप तभी लेंगे जब एक बार देख लेंगे। क्या स्त्रियां अच्छे मसल्स् या सिक्स पैक एब्स् वाले पुरुषों को ग़ौर से नहीं देखती? वैसे क्लीवेज़ जैसे फ़ैशन स्त्रियां सिर्फ़ स्त्रियों को दिखाने को करती होंगी, यह मानना ज़रा मुश्क़िल ही है।

एक ही वक़्त में आप तरह-तरह के (विरोधाभासी) फ़ायदे एक साथ अपने लिए चाहेंगे तो क्या यह संभव हो पाएंगा ?

एक विज्ञापन में एक स्त्री एक शर्मीले पुरुष को प्रेमनिमंत्रण की पहल करने के लिए उकसाते हुए कहती है-‘बी अ मैन’! क्या आपको लगता है कि इस स्त्री का आशय यहां ‘मानव’ या ‘इंसान’ से है? यह स्त्री जब इतना कह सकती है तो ख़ुद पहल क्यों नहीं कर सकती ? ‘मर्दानगी’ ने पहले ही दुनिया-भर की मुसीबतें खड़ी कर रखीं हैं और आप आगे फ़िर वही हरक़तें कर रहे हो ?

निर्भया कांड के कई महीने बाद तक एक विज्ञापन दिखता रहा जिसमें कोई मशहूर युवा आयकन कह रहा था कि ‘मर्द वही है जो स्त्री की रक्षा करे।’ इसमें क्या नई बात कहदी आपने ? यह तो वही पुरानी बीमारी है। मर्द से मतलब क्या है आपका? जिसका शरीर तगड़ा है? बाक़ी जिनका नहीं है वे यूंही खि़सक जाएं !? स्त्रियां, स्त्रियों की रक्षा न करें क्या ? वे तो मर्द हैं नहीं। ये आप उनका उत्साह बढ़ा रहे हैं कि डिस्करेज कर रहे हैं ? और जो किन्हीं कारणों से स्त्री की रक्षा नहीं कर पाते वे सब नामर्द हैं क्या? यह क्या कंपलसरी है कि हर मर्द को सड़क पर होनेवाले हर लफ़ड़े, झगड़े, दंगे में पड़ना ही पड़ना चाहिए ? लोगों को और भी बहुत-से काम होते हैं।

वैसे भी विज्ञापन या फ़िल्म में स्त्री की रक्षा करने और उनके बाहर, वास्तव में रक्षा करने में फ़र्क़ होता है। आंकड़ों के शौक़ीन चाहें तो पता लगा सकते हैं कि हीरो लोग वास्तविक ज़िंदग़ी में कितनी रक्षाएं वगैरह करते हैं। सड़क पर स्त्री की रक्षा की साल-भर में इक्का-दुक्का ख़बरें पढ़ने को मिलतीं हैं। सारी रक्षा रेडियो-टीवी पर चलती है।

और यह किसने कहा कि स्त्री की तरफ़ बोलनेवाला हर मर्द महान, संवेदनशील इंसान होता है, स्त्रीमुक्ति की गहरी समझ रखता है?

उसे याद आती है एक घटना जब वह एक भीड़वाले रुट पर रोज़ सफ़र करता था। कई बार कुछ लड़कियां दिखाई देतीं थी जो आराम से जाकर कंडक्टर के पास बैठ जाया करतीं थी। उनकी उससे दोस्ती रही होती होगी या जो भी संबंध होता होगा। ऐसे ही एक दिन एक लड़की उठकर पिछले दरवाज़े से उतरने को बढ़ी। बस के जो नियम हैं उनके अनुसार भी यह ग़लत था और भीड़ भी भयानक थी। एक प्रौढ़ आदमी अनचाहे ही उस लड़की के रास्ते में इस तरह फंस गया कि उसके हटे बिना निकलना संभव ही नहीं था। मगर वह भी इस क़दर बुरी तरह फंसा था कि उसके लिए हिलना भी संभव नहीं था। धीरे-धीरे भीड़ उस आदमी के पीछे पड़ने लगी। लड़की सुंदर थी, कंडक्टर का सपोर्ट था और हर कोई हीरो बन रहा था। अंत में जब लगा कि लोग उसे पीटने लगेंगे तो सरल ने हस्तक्षेप किया। बिलकुल रुंआसे हो गए उस आदमी ने बहुत आभार माना कि एक आदमी तो उसकी तरफ़ बोला।

इसी तरह एक बार जब वह परिवार के साथ कहीं जाने के लिए बस में बैठा था कि एक मां-बाप एक बहुत ख़ूबसूरत बेटी के साथ बस में चढ़े। सीट ढूंढते हुए वे वहीं आ पहुंचे जहां सरल के आगेवाली सीट पर एक कमज़ोर फ़टेहाल शराबी बेसुध पड़ा था। मां-बाप अभी कुछ सोच ही रहे थे कि पड़ोस की सीट से अचानक एक ‘हीरो’ उठा और उस मरियल शराबी को तड़ातड़ थप्पड़ मारने शुरु कर दिए। फिर प्रभावशाली डायलॉगबाज़ी करते हुए उस मरियल, ग़रीब, बेसुध शराबी को बस से बाहर धकेल दिया। पता नहीं उसकी इस ‘हीरोपंती’ से लड़की  इम्प्रैस हुई या नहीं मगर सरल इस बात से कई दिन निराश रहा कि उस दिन वह कुछ बोल ही नहीं पाया।

समझदार स्त्रियां किन लोगों से प्रभावित होतीं हैं, कैसे पुरुषों को पसंद करतीं हैं ? सामान्यतः लड़कियां उन लड़कों को पसंद करती पाई जातीं हैं जो उनके काम तुरत-फ़ुरत करवा कर दे दें। और ऐसे काम बेईमान और जुगाड़ू लोग ही करा पाते हैं, ईमानदार आदमी इस मुल्क़ में अपने ही काम नहीं निपटा पाता, दूसरों के लिए क्या कर पाएगा ? आपको यह तरीक़ा, ऐसे लोग पसंद हैं तो इसका भी आपको पूरा हक़ है। मगर तब भ्रष्टाचार-विरोध के कार्यक्रमों में ईमानदारी के नारे लगाते हुए आप अजीब-से लगते हैं। दूसरों से, पुलिस से, नेताओं से क़ानून को ठीक से लागू करने की मांग करते हुए भी आप विचित्र ही लगते हैं।

क्या समस्याएं झूठ बोलने और अव्यवहारिक बातें करने से हल हो जाएंगी !?

22-04-2015

(जारी)

(अगला भाग)

7 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-6

(पिछला भाग)


इस वीडियो में ज़्यादा आपत्तिजनक तो कुछ नहीं है मगर नया भी कुछ नहीं है। दुनिया-भर में, भारत में भी पत्र-पत्रिकाओं, इंटरनेट की बहसों और टीवी सीरियलों में पिछले कई सालों से ये बातें कही जा रहीं हैं और इस वीडियो से बेहतर ढंग से कही जा रहीं हैं। इस वीडियो का सबसे कमज़ोर पहलू यह है कि इतने गंभीर और जटिल मुद्दे पर कहीं भी तर्क देने की कोई ज़रुरत ही नहीं समझी गई है। बल्कि पुराने ब्राहमणवादी अंदाज़ में घोषणाएं की गईं हैं। इतने ख़र्चे और इतनी तैयारी के साथ थोड़ा ध्यान ‘रीज़निंग’ पर भी दिया गया होता तो वीडियो का प्रभाव शायद कुछ और होता। इसे देखते हुए, अनायास ही चीची गोविंदा का पुराना हिट गीत ‘मेरी मर्ज़ी’ बार-बार याद आता रहा।


अंततः जब दीपिका कहतीं हैं कि ‘आय एम द यूनिवर्स....’ तो यह वीडियो पूरी तरह ब्राहमणवादी अमूर्त्तन को टक्कर देने लगता है और डर लगने लगता है कि इतने सारे मर्द-भगवानों के बोझ-तले करा रहे भारत को क्या अब कुछ नयी स्त्री-भगवानों को भी झेलने की तैयारी कर लेनी चाहिए। चाहे सचिन तेंदुलकर हों, भारत का तथाकथित ‘सबसे अक़्लमंद बच्चा’ कौटिल्य हो या कार्टूनिस्ट त्रिवेदी हों, अपने लोगों को तुरत-फ़ुरत आयकन या भगवान बना देने का ब्राहमणवाद का यह शौक़ भारतीयों को बहुत भारी पड़ता रहा है। यूं भी पिछले काफ़ी समय से यह देखने में आ रहा है कि फ़िल्मइंडस्ट्री बदलाव के आगे कम और पीछे ज़्यादा चलती है। और अपने आर्थिक पक्ष का ख़ास ख़्याल रखती है।

शादी से पहले, शादी के समानांतर या शादी के बाद यौन-संबंध बनाने का हक़ किसीको भी हो सकता है, मगर भारतीय शादी का काँसेप्ट चूंकि अलग तरह का है इसलिए ये बातें प्रेमसंबंधों के दौरान या अरेंज्ड् मेरिज में रिश्ता तय करते समय साफ़ कर ली जाएं तो बेहतर होगा। वरना अब तक भारतीय शादी को लेकर जो मान्यताएं और धारणाएं रहीं हैं, उनके चलते किसीको भी ऐसे संबंधों पर आपत्ति और कष्ट हो सकता है। और उस आपत्ति और कष्ट को नाजायज़ कतई नहीं कहा जा सकता।

इसमें कोई शक़ नहीं कि पुरुष भी अब तक ऐसी हरक़तें बिना बताए करते आए हैं मगर बेहतर तो यही होगा कि पिछली भूलों से सबक लेकर आगे जो रास्ते बनाए जाएं वो पहले की तरह उलझे हुए, भ्रमित करनेवाले, कन्फ़्यूज़ करनेवाले न हों बल्कि ज़्यादा से ज़्यादा स्पष्ट, साफ़-संुथरे और पारदर्शी हों।

(जारी)

07-04-2015

(अगला भाग)

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-5


(पिछला भाग)
यहां देखिए, नायिका को सीधी बात में मज़ा नहीं आ रहा, वह चाहती है कि नायक कुछ घुमा-फिराकर कहे। यह तो फ़िल्मी सिचुएशन है मगर बाहर की दुनिया में भी घुमाने-फिराने को बड़ी प्रतिष्ठा मिली हुई है। घुमाने-फिराने के सबसे ज़्यादा शौक़ीन हमारे कवि और साहित्यकार हैं। इन्होंने पक्का मान लिया है कि घुमाना-फिराना बड़ी कला है। हुज़ूरेवाला, घुमाना-फिराना सिर्फ़ कला नहीं है, यह ठगी भी है, धोखाधड़ी भी है, बदमाशी भी है। हो सकता है लड़कियों को यह अच्छा लगता हो, हालांकि आज की स्त्रियां उन सब बातों से इंकार कर रहीं हैं जिन्हें कल तक स्त्रियों की पसंद बताया जाता रहा, फ़िर भी मान लें कि लड़कियों को यह अ़च्छा लगता है मगर किन्हीं लड़कों को यह ‘कला’ नहीं आती तो वे इसका कोर्स करने जाएं क्या !? आखि़र सीधी बात में दिक्क़त क्या है ? सही बात तो यह है कि भारतीय समाज की स्थिति ऐसी नहीं है कि ज़्यादा ‘कलाबाज़ी’ दिखाई जाए। यहां तो साहित्य और प्रेम, दोनों जगह सीधी-साफ़ बात और नीयत की ज़रुरत है।

ईश्वर पर न जाने कितनी कविताएं और लघुकथाएं उसने ऐसी पढ़ीं हैं कि कुछ समझ में ही नहीं आता कि रचनाकार कहना क्या चाहता है, ईश्वर है, कि नहीं है, कि छुट्टी पर गया है, कि सामने नहीं आना चाहता, कि शर्मीला है, कि नहाने गया है.......!? या कि रचनाकार डरपोक है, अपने डर को छुपाने के लिए बिंबों, उपमाओं, प्रतीकों और अलंकारों का सहारा ले रहा है!? दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया पर लोग साफ़ बात कर रहे हैं और उसका असर भी दिख रहा है। जो समाज ‘घुमाने-फिराने’ की ‘कलाबाज़ी’ की ही वजह से पतन के कगार पर पहुंच गया हो और आगे पारदर्शिता की चाह रखता हो उसमें साफ़ बात करनेवालों की क़द्र ज़्यादा हो तो क्या बेहतर नहीं होगा? जिनको ‘कला’ पसंद है वे ‘कला’ देखें-दिखाएं।
(गीतविशेष से कोई दुश्मनी नहीं है, अपनी बात कहने के लिए जो भी पहला गीत याद आया, ले लिया है)

07-04-2015
कई बार तो लगता है कि लोग मुद्दों को भी घुमाए-फिराए दे रहे हैं। वर्णव्यवस्था से बड़ा वी आईपी का, छुआछूत से बड़ा काले-गोरे का और दहेज़ से बड़ा लाल बत्ती का मुद्दा हो गया है। टीवीवाले असली मुद्दों से घबराते क्यों हैं ? भारतीय न्यूजचैनलों पर ब्राहमणवाद, नास्तिकता, वर्णव्यवस्था, छुआछूत जैसे शब्द सुनाई ही नहीं पड़ते! धर्म से जुड़े मुद्दों से ये चैनल बचते क्यों हैं ? एक कारण यह भी हो सकता है कि जिस वर्णविशेष के कब्ज़े में सारा मीडिया है, धर्मविरोधी बहसें चलीं तो उस वर्णविशेष की सत्ता उखड़ जाने की पूरी संभावना है। क्योंकि धर्म से नब्बे प्रतिशत फ़ायदे उसी वर्णविशेष के लोगों को मिलते दिखाई देते हैं।

रंगभेद पर एक स्टिंगनुमां कार्यक्रम में ज़्यादातर स्त्रियां रंगभेद के विरोध में यह दलील देतीं सुनाई पड़ीं कि ‘हमें तो भगवान ने काला बनाया है’। ऐसी दलीलें अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी हैं। सामनेवाला भी कह सकता है कि हमें भी रंगभेद करने की मानसिकता भगवान ने दी है, हम क्या कर सकते हैं। वैसे भी, जैसाकि बताया जाता है, धार्मिक पुस्तकों में जो कुछ लिखा है वह स्त्री के विरोध में ही ज़्यादा है, उसे ग़ुलाम या सामान बनाए रखने का हिसाब-क़िताब है। यूं अपनी-अपनी तरह से तर्क देने को हर कोई स्वतंत्र है।

इधर 'मेरी मर्ज़ी' यानि ‘माई चॉइस’ का ऐलान करता दीपिका पादुकोण का एक वीडियो आया है।

(जारी)

07-04-2015

(अगला भाग)


4 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-4


हे देश के पवित्र महात्मागणों, फूफा-फूफिओं, दादा-दादिओं, नाना-नानिओं, जीजा-जीजिओं, पिताओं-माताओं, तुम जो ये झंडे ले-लेके एकाएक क्रांतिकारी हो उठे हो, ये न सोच बैठना कि जो लोग बलात्कार नहीं करते वे बहुत महान हैं। उन्हींमें से बहुत-सारे लोग सरिता-मुक्ता-मेट्रो नाऊ के कॉलमों में घुसे बैठे हैं। उनके अलावा बहुत-सारे तुम्हारे वे पारंपरिक पुत्र हैं जो लड़की पटाने का पारंपरिक हुनर और ‘धैर्य’ रखते हैं। जो ‘प्यार और युद्ध में सब जायज़ है’ नामक भजन पर पूरी श्रद्धा रखते हैं, किसी राम की मर्यादा की बात भी करते हैं और साथ-साथ किसी कृष्ण के नुस्ख़े भी आज़माते रहते हैं। व्यक्तित्व के इसी विघटन/दोमुंहेपन को सीज़ोफ्रीनिया कहा जाता है। दूसरों को कुछ समझाने से पहले ख़ुद ठीक से समझ लो कि हर कोई इतना पाखंड एक साथ नहीं साध सकता। तुम कितने भी अच्छे नाम इन्हें दो पर दरअसल ये बेईमानों के हुनर हैं। तुमने तो खिड़कियों-रोशनदानों के ज़रिए अपना काम निकाल लिया पर जो तुम्हारी तरह पाखंडी, बेईमान और सीज़ोफ्रीनिक नहीं हैं वो क्या करेंगे ? 
तुम क्या करते रहे वो तुम ज़रा इस गीत में देखो। ‘भारत की बेटियां’ में आज का कथित सबसे बड़ा अपराधी जो कह रहा है, यह गीत उससे कितना अलग है? तुम्हारी फ़िल्में, तुम्हारी कहानियां, तुम्हारे उपन्यास ऐसी मानसिकता से भरे पड़े हैं। ऊपर से अब यही लोग उपदेश भी बांच रहे हैं।


याद करो वे चुटकुले जो रिश्तों की मर्यादा, पवित्रता की बात करनेवाले दोस्त और सहेलियां अकेले में मज़े ले-लेकर सुनाते थे कि किस तरह एक आदमी कहीं से एक छूत की बीमारी लेकर लौटा और कैसे वो बीमारी कुछ ही दिन में सारे परिवार में फैल गई। अंदर जिस चीज़ में तुम रस लेते रहे, बाहर उसीके खि़लाफ़ नारे लगाने लगे? इसीको सीज़ोफ्रीनिया कहते हैं महामनाओं। ज़रा ध्यान से देख लो, तुम्हारे आस-पास क्रांति की तख़्तियां लिए खड़े लोग वही चुटकुले सुनाकर तो नहीं निकले।

आज तुम्हे, पुलिस और क़ानून की बड़ी याद आ रही है कि पुलिस और क़ानून कुछ नहीं करते, नेता कुछ नहीं करते। मगर तुम्हे यह याद नहीं आ रहा कि तुम्हारे बच्चे पुलिस ने नहीं पाले। ख़ुद पुलिसवाले तुम्हारे ही जैसे किन्हीं घरों में पले हैं। और तुम्हे दहेज़ लेते-देते वक़्त तो क़ानून याद नहीं आता ? तुम्हे गली और सड़क पर दूसरों के रास्ते में कमरे बनाते और दुकान बढ़ाते वक़्त तो क़ानून याद नहीं आता ? तुम्हे सड़क पर गड्ढे खोदकर तम्बू तानते समय तो क़ानून याद नहीं आता ? न तुम्हे टैक्स मारते में क़ानून की याद आती है! न तुम्हे टीए डीए के नक़ली बिल बनाते हुए क़ानून याद आता है! क्या तुम्हारे अख़बारों में रचना छापने को लेकर कोई स्पष्ट नियम-क़ानून हैं ? तुम्हारा कौन-सा चैनल है जो अख़बार में विज्ञापन निकालता हो कि हमें फ़लां-फ़लां विषयों पर डिबेट के लिए फ़लां-फ़लां योग्यता वाले डिबेटर चाहिएं? सबने ख़ुद धक्कमपेल चला रखी है और दूसरों को ईमानदारी सिखा रहे हैं!?

ख़ुद कोई क़ानून मानेंगे नहीं और अपने लिए बिलकुल ठीक-ठीक न्याय चाहिए!? क्यों चाहिए !? तुमने क़ानून का पालन करनेवालों का कितनी बार साथ दिया जो अब दूसरों से शिक़ायत कर रहे हो कि दूसरे साथ नहीं देते ? तुम्हे याद है कि क़ानून का पालन करनेवालों की तुम क्या-क्या कहकर हंसी उड़ाते रहे-भोंदू, अव्यवहारिक, फ़ालतू, पागल, निठल्ला, सनकी!

अब ख़ुद यही सब बनना चाहते हो!?

(जारी)

04-04-2015


2 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-3

(पिछला भाग)

जब सानिया मिर्ज़ा जीतती हैं, साइना नेहवाल जीतती हैं, सचिन तेंदुलकर रिकॉर्ड बनाते हैं, धोनी वर्ल्ड कप दिलाते हैं तो तुम कहते हो कि ये हमारे आदमी हैं, हमें इनपर गर्व है। तुम्हारे बेटे-बेटी क्लास में सबसे ज़्यादा नंबर लाते हैं, अच्छी नौकरी पाते हैं तो तुम कहते हो कि अहा देखा हमारे बच्चे कितने होनहार हैं। तुम मोहल्ले और देश में मिठाईयां बांट-बांटकर खाते हो। मगर जब ममता कुलकर्णी अफ़्रीका में ड्रग्स के धंधे में पकड़ी जातीं हैं तब वो तुम्हारी नहीं होती क्या ? तब वो किसी और की हो जाती है !? जब तिवारी जी डीएनए टेस्ट में पकड़े जाते हैं तो वो तुम्हारे क्यों नहीं होते ? जब कोई बच्चा छेड़छाड़ या बलात्कार के केस में पकड़ा जाता है तो वो तुम्हारा ही आदमी क्यों नहीं होता ? मिठाई तुम बांटकर खाओगे और सज़ा कोई और भुगतेगा ? सज़ा में भी थोड़ा हिस्सा बंटाओ ना।

तुम्हारे घर में तकिए के नीचे से जो मनोहर कहानियां और सत्यकथा की प्रतियां बरामद होतीं थीं वो वहां कौन रखकर जाता था ? क्या कोई भूतप्रेत ? कोई चमत्कारी बाबा ? तुम ख़ुद ही लेकर आते थे कहीं न कहीं से, अंकलजी, आंटीजी। दीदीजी और भैयाजी। चाचाजी और चाचीजी। ताऊजी और ताईजी। मामाजी और मामीजी। तुम क्यों पढ़ते थे उन्हें ? उनमें बलात्कारों या अन्यत्र यौन-संबंधों के चटख़ारेदार विस्तृत वर्णन के सिवाय और क्या होता था ? तुमने कभी ऐसी कोशिश की क्या कि आदमी की सहज-सामान्य प्राकृतिक इच्छाएं सीधे और पारदर्शी तरीक़ों से पूरी हो जाएं, उसे किन्हीं टेढ़े-मेढ़े अंधेरे रास्तों पर न भटकना पड़े!?

और वो ‘सरिता’, ‘मुक्ता’, ‘मेरी सहेली’, ‘तेरी सहेली’ क्या बच्चे फेंक जाते थे घरों में!? जिनके ‘कांसे कहूं’, ‘आपकी समस्याएं’ कॉलमों में अस्सी प्रतिशत समस्याएं इनसेस्ट संबंधों की होतीं थीं। ये कखग और एक पाठक के नाम से छपनेवाली समस्याएं क्या संपादक ख़ुद ही लिख लेते थे!? अगर हां तो समझ लीजिए कि संपादक कैसे होते थे। और अगर नही ंतो साफ़ ज़ाहिर है कि आधे से ज़्यादा लोग अपने ही आसपास कहीं अंधेरे कोनों में अपने लिए आसान रास्ते ढूंढ लेते थे। किसी-किसी को कभी अपराधबोध होने लगता था, या रंगे हाथ पकड़े जाते थे या नौबत ब्लैकमेल की आ जाती थी तो वे एबीसी बनकर ऐसी पत्रिकाओं में समाधान ढूंढने लगते थे। यहां याद रखने की बात यह भी है कि ऐसे सभी लोग शिक्षित नहीं होते, हों तो सबकी पहुंच पत्रिकाओं तक नहीं होती, हो भी तो सब चिट्ठियां नहीं भेजते यानि कि ऐसे लोगों की संख्या जितनी पत्रिकाओं में दिखती थी/है उससे ज़्यादा ही रही होगी।

मगर सामने समाज में तो कहीं वे दिखते नहीं! यहां तो जिसको देखो वही बलात्कार और भ्रष्टाचार का विरोध कर रहा है!

तो फिर इस देश में भ्रष्टाचार और व्याभिचार(!) के बीज आखि़र डाले किसने ?

कहां ग़ायब हो गया है वह आदमी ?

(जारी)

02-04-2015

(अगला भाग)


सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-2

(पिछला भाग)

चंद रोज़ पहले उसने सुना कि एक भीड़ ने क़ानून अपने हाथ में लेकर एक बलात्कारी की हत्या कर दी। सोचने की बात यह है कि हत्या और बलात्कार में फ़र्क़ क्या है ? दोनों ही तरह के लोग बातचीत में या तो यक़ीन नहीं रखते या उनमें इतना धैर्य नहीं होता। कहीं न कहीं उन दोनों में दूसरों को लेकर एक मालिक़ाना रवैय्या है, जैसे दूसरे इंसान नहीं हैं, सामान हैं। यह भाव कहां से आया ? यह क्या एक ही दिन में पैदा हो गया ? नहीं, कुछ न कुछ बुनियादी गड़बड़ है। अगर यह पूरी भीड़ बलात्कार की विरोधी थी तो उस आदमी की हिम्मत ही कैसे हुई कि वह ऐसा सोच भी लेता ?

क्या कोई बच्चा जन्म से यह तय करके पैदा होता होगा कि मैं एक दिन बलात्कार करुंगा!? तो !?

बच्चे के पास अपनी कोई सोच नहीं होती। वह सब कुछ इसी दुनिया से सीखता है। उसके मां-बाप, रिश्तेदार, टीचर, पड़ोसी, अख़बार, पत्रिकाएं, फ़िल्में, धर्म, धर्मगुरु, राजनीति......ये सब मिलकर एक बच्चे का व्यक्तित्व बनाते हैं। सही बात तो यह है कि जिस भीड़ ने बलात्कारी को मारा वो पूरी भीड़ उस बलात्कार में हिस्सेदार थी।
मज़े की बात, असलियत समझने का अब से अच्छा मौक़ा कभी आया ही नहीं। अभी 3-4 साल पहले इस देश में एकाएक आंदोलन शुरु हो गया जिसे एक साथ सभी न्यूज़-चैनलों ने रात-दिन दिखाना शुरु कर दिया। तथाकथित भ्रष्टाचार-विरोधी इस आंदोलन के करनेवाले कह रहे थे कि देश की पूरी सवा अरब जनता भ्रष्टाचार-विरोधी है और सब हमारे साथ हैं।

तो भैय्या फिर भ्रष्टाचार कर कौन रहा है ?

ये लोग भ्रष्टाचार-विरोध को ईश्वर से जोड़ रहे थे, धर्म की दुहाई दे रहे थे, सभ्यता और संस्कृति का हवाला दे रहे थे। इनकी एक-एक हरक़त से साफ़ दिखता था कि ये उन्हीं लोगों के प्रतिनिधि हैं जिन्होंने इस देश पर एक सड़ियल और अतिपाखंडी संस्कृति थोपी है जिसकी वजह से एक लगभग पूरा समाज सीज़ोफ़्रीनिक हो चुका है।

केबल टीवी और इंटरनेट जैसे माध्यमों से जनता के रुख़ में आए बदलाव को भांपकर अब यही लोग बदलाव का क्रेडिट लेने में जुट गए हैं।

वरना जिस देश के सवा अरब लोग और पूरा मीडिया भ्रष्टाचार-विरोधी हो वहां भ्रष्टाचार घुस भी कैसे सकता है ?


(जारी)
02-04-2015

(अगला भाग)


1 अप्रैल 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा

एन डी टी वी इंडिया अकसर रविवार को मुहिम जैसा कुछ चलाता रहता है।

साल-भर हुआ होगा शायद। स्त्रियों की स्थिति को लेकर बातचीत चल रही थी।

किसी गांव में मौजूद एक संवाददाता स्टूडियो में मौजूद अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की बातचीत किसी ख़ाप पंचायत के मुखिया से करा रहा था। मुखिया हैरान-परेशान सुन रहा था। प्रियंका टीचर की तरह उसे समझा रहीं थीं। सरल को यह खटक रहा था।

मुखिया संभवतः अनपढ़ रहा होगा। वह गांव के बाहर की दुनिया को कितना जानता होगा ? जो कुछ उसने बचपन से अपने गांव-घर में देखा-सीखा, वही वह कर रहा होगा। अगर वह आधुनिक होना चाहे तो उसे यह अतिरिक्त प्रयास करके अर्जित करना होगा। वह इस उम्र में क्या-क्या सीख पाएगा ? क्या-क्या सोच-समझ पाएगा ?

ख़ुद प्रियंका की जो आधुनिकता है उसमें से कितनी उनकी ख़ुदकी अर्जित की हुई है और कितनी माहौल और परिवार से तोहफ़े में मिली हुई !?

संभवतः वह कांवेट में पढ़ीं हैं।

फ़िर फ़िल्म इंडस्ट्री में तो स्कर्ट पहनना उतना ही सामान्य है जितना गांव में धोती पहनना। इस इंडस्ट्री में मित्रता या अन्यत्र यौनसंबंध बनाने में कोई साहस या प्रगतिशीलता जैसी बात है ही नहीं। वहां तो पचासियों सालों से लोग एक-दूसरे के दोनों गाल चूमकर स्वागत करते हैं।

और प्रियंका व अन्य नायिकायों को कपिल शर्मा के शो में क्या हो जाता है !? वहां कपिल अपनी पत्नी के होंठों और रिश्तेदारों का मज़ाक़ उड़ाते नहीं थकते। उनकी एक बुआ है जो शादी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है। एक दादी है जो शराब पीकर अजीब हरक़तें करती है। वहां जितने भी स्त्री-पात्र हैं, लगता है जैसे स्त्री-अस्मिता का मज़ाक़ उड़ाने के लिए ही रखे गए हैं। मगर वहां कोई फ़िल्मकार चूं भी नहीं करता। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम नारी-मुक्ति के मुद्दों और प्रयासों का आकलन भी जातिवाद का फ़िल्टर लगाकर कर रहे हों!

सही बात तो यह है कि दूर-दराज़ के किसी गांव के अनपढ़ मुखिया का रुढ़िवादी व्यवहार नितांत स्वाभाविक है (ठीक वैसे ही जैसे रजत शर्मा का अपनी विचारधारा(!) वाली सरकार से पुरस्कार ले लेना स्वाभाविक है ; आपत्तिजनक तो यह है कि तथाकथित प्रगतिशील/वामपंथी रोज़ाना ‘फ़ासीवाद आ गया’, ‘फ़ासीवाद आ गया’ चिल्ला रहे हैं और प्रगतिशील(!) व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी उसी सरकार से पुरस्कार ले रहे हैं. ‘मैं वामपंथी हूं इसलिए कलाकार हूं’ वाले अपनी ‘हैदर’ के लिए पुरस्कार ले रहे हैं) मगर रोज़ाना देश-विदेश घूम रहे और अपने शो में हीरोइनों के साथ उन्मुक्त व्यवहार कर रहे कपिल शर्मा द्वारा अपने स्त्री-पात्रों को इस भद्दे ढंग से पेश करना निहायत आपत्तिजनक है। और ध्यान देने लायक बात यह है कि यह सब कर चुकने के बाद प्रोग्राम के अंत में गुडनाइट के साथ वे यह भी कहते हैं कि ‘स्त्रियों का सम्मान कीजिए’।

(अगला भाग)

01-04-2015
(जारी)



14 सित॰ 2013

काश! यह रात कभी ख़त्म न हो!


वह बिस्तर में पड़ा है, आंखें बंद हैं।

आंखें बंद कर लेने से क्या नींद आ जाती है ? रात किस वक्त आंख लगती है, कितना वक्त नींद आती है, कुछ समझ में नहीं आता। बस सुबह मन होता है कि सोया रहे, अभी तो नींद आनी शुरु ही हुई थी और......। यूं भी कोई चुस्ती-फुर्ती उसे अपने बदन में महसूस नहीं होती, फ़िर सुबह-सुबह तो बिलकुल ही थका-थका सा महसूस करता है ख़ुदको।

उठे भी तो किसलिए ?

जैसे-तैसे तैयार होकर स्कूल के लिए निकलेगा। सारे रास्ते आंखें नीची किए, सर झुकाए चलेगा। चलेगा कि घिसटेगा ! मौसम कैसा भी हो, हाथ-पांव पसीने से भरे रहेंगे। रास्ते में कहीं कोई कुत्ता दिख गया तो वह डरेगा, भौंक पड़ा तो बुरी तरह डर जाएगा। लड़कों का कोई झुण्ड दिख गया तो डरेगा, कहीं किसीसे नज़र न मिल जाए। पता नहीं कोई क्या कह दे, कोई ग़ाली न दे दे, कोई अजीब-सा इशारा न कर दे। स्कूल पहुंचेगा तो डरेगा कि कहीं कोई टीचर प्रेयर पढ़नेवाले तीन बच्चों में खड़ा न कर दे। कहीं अपनी क्लास की लाइन में आगे न खड़ा होना पड़ जाए। पीछे भी खड़ा है तो घबराया है कि कोई देख न ले कि वह प्रेयर नहीं बोल रहा है। बोलना तो दूर, उसके होंठ भी ठीक से नहीं हिल रहे।

फ़िर क्लास में!

किसी टीचर ने कुछ पूछ लिया तो ! उसे आता है कि नहीं आता, यह बड़ा सवाल नहीं है। मुश्क़िल यह है कि बोलेगा कैसे ? मुंह से आवाज़ निकलेगी कि अंदर ही कहीं फ़ंसी रह जाएगी !

आज तीसरा घंटा ख़ाली है। गणित वाले मास्साब नहीं आए हैं। सब बच्चे ख़ुश हैं। वे चिल्ला रहे हैं, कूद-फांद मचा रहे हैं। वह भी ख़ुश है। आज मास्साब का डर नहीं है। मगर अब एक नया डर उसके सामने है-बच्चों का डर।

ननुआ उसका हाथ मरोड़ेगा, वह कुछ भी नहीं कर पाएगा, बस कुनमुनाता रहेगा।

वह दादा टाइप लड़की आज फ़िर उसे धमकाकर उससे चॉक छीन लेगी। वह चुपचाप दे देगा।

हाफ़टैम (हाफ़टाइम/इंटरवल) में दूसरे बच्चों की तरह ही वह खाना खाने घर आएगा। और जब लौटकर वापिस जाएगा तो देखेगा, बस्ते में से उसका पैन ग़ायब है। आए दिन कोई उसका पैन चुरा लेता है, फ़िर भी आए दिन वह पैन बस्ते में ही छोड़कर खाना खाने चला जाता है।

स्कूल जाने के बाद पहले घंटे से आखि़री घंटे तक उसका एक-एक पल जैसे इसी इंतज़ार में बीतता है कि कब घंटा ख़त्म होगा, कब इंटरवल होगा, कब छुट्टी होगी।

छुट्टी होगी तो उसकी जान में ज़रा-सी जान आएगी।

खाना-वाना खाकर उसे नया पैन ख़रीदने भी जाना है। पैन के लिए मौक़ा देखकर माताजी या पापाजी के बक्से में से एक या दो रुपए, जो भी मिलें, निकाल लेने हैं। स्टोर में अकेले जाने में जान निकलती है। न जाने क्या-क्या सामान पड़ा है वहां। लाइट जलाई तो कोई देख लेगा। यूंही घुसा तो उसकी घबराहट अंधेरे को और घना कर देगी। पर पैसे तो निकालने हैं। बिना पैन के कल स्कूल कैसे जाएगा ?

पापाजी-माताजी को बताए क्या ? बताने से होगा क्या ? वे तो यही कहेंगे कि ‘होशियार बनते हैं ; ऐसे कैसे कोई पैन चुरा लेता है’। डांट भी सकते हैं कि ‘फ़लां लड़के को देख कितना तेज है, उससे कुछ सीख’। सरल के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं है। यह उसे भी मालूम है कि होशियार होना चाहिए, तेज होना चाहिए। पर वह इसका क्या करे कि लाख सोचते रहने के बावजूद वह कोई कोशिश तक नहीं कर पाता!

वह डरता हुआ नमन की दुकान तक जाएगा, क्योंकि उसे मालूम है कि वहां भीड़ लगी होगी। सारे बच्चे और उनके मां-बाप कापी-पैन ख़रीदने वहीं आते हैं। वहां जाकर भीड़ के पीछे खड़ा हो जाएगा। फिर इंतज़ार करता रहेगा कि कब नमन की नज़र उसपर पड़ जाए और वह उससे पूछे कि हां, तुझे क्या चाहिए ? वह परेशान है कि आखि़र कब नमन की नज़र उसपर पड़ेगी और कब वह उससे पूछेगा! वह डर भी रहा है कि कहीं नमन की नज़र उसपर न पड़ जाए और वह उससे पूछ न ले! अगर पूछ लिया तो क्या वह तुरंत बता पाएगा कि उसे क्या चाहिए ? क्या उसकी आवाज़ नमन तक पहुंचेगी ? कहीं नमन उसकी हंसी तो नहीं उड़ाएगा कि तेरे मुंह में आवाज़ नहीं है? तू लड़की है क्या ?

वह डरा हुआ खड़ा है। एक डर उसे यह भी है कि कोई जान-पहचान वाला न यहां आ जाए और यह न देख ले कि वह डरा हुआ खड़ा है।

दिन इसी तरह निकलता है।

रात को बिस्तर में घुसता है तो आधी रात यही कामना करते बीतती है कि वक्त किसी तरह यहीं ठहर जाए। काश! यह रात कभी ख़त्म न हो!

(जारी)

14-09-2013

5 सित॰ 2013

पापई की शराफ़त भी आफ़त है!

पापाजी कभी-कभी हंसते हैं। अकसर गंभीर दिखाई देते हैं। दिखाई भी कितना देते हैं ! हमेशा तो बिज़ी रहते हैं।

पहले तो सभी कमरों में बल्ब लगे थे जो पीली-पीली रोशनी देते थे। एक-एक करके पापाजी ने सभी कमरों में ट्यूबलाइट लगवा दीं हैं। ट्यूबलाइट, स्विच ऑन करते ही बल्ब की तरह तुरंत नहीं जलती ; पहले फ़ड़फ़ड़ाती है। ज़्यादा देर फ़ड़फ़ड़ाए तो डर लगता है, आज जलेगी कि नहीं, वोल्टेज पूरे आ रहे हैं कि नहीं ! जल जाती है तो कितना अच्छा लगता है। अब कुछ भी काम करो, करने में मन लगेगा, मज़ा आएगा।

पापाजी हंसते हैं तो घर रोशनी से भर जाता है। सब भाई-बहिनों के दिल में जैसे लट्टू जलने लगते हैं। पापाजी कितने अच्छे हैं ! शराब नहीं पीते! सिगरेट नहीं पीते! ग़ाली नहीं बकते! किसीसे लड़ते नहीं। सफ़ेद कमीज़ और सफ़ेद पाजामा। हंसते हैं तो पता चलता है कि दांत उनसे भी ज़्यादा सफ़ेद हैं। शरीर इकहरा है और पेट एकदम सपाट है। और हो भी क्यों नहीं। कितना तो पैदल चलते हैं पूरा दिन। सुबह पांच बजे उठते हैं। बही-खाता लिखते रहते हैं। फ़िर दूध लाना, सब्ज़ी लाना..........दुनिया-भरके काम......दुकान पर जाना, ज़रुरत हो तो दोपहर में फ़िर घर आना...फ़िर जाना....रात को आना...खाना खाना....पौने नौ बजे के समाचार सुनना...और फ़िर बही-खाता.....पापाजी बस मेहनत, मेहनत, मेहनत, काम, काम और काम करते रहते हैं...फ़िल्म देखने भी नहीं जाते कभी। हां, किसीके घर शादी हो..... कोई मर गया हो.... कैसा भी अवसर हो, पापाजी की ज़रा भी जान-पहचान रही हो और पापाजी वहां न जाएं, हो ही नहीं सकता।

पापाजी जब पौने नौ के समाचार सुनते हैं तो सारे बच्चों को पता है कि अब बिलकुल भी नहीं बोलना। ज़रा कोई बोला नहीं कि ऐसी डांट पड़ेगी कि फ़िर रोटी खाए बिना सो जाने का मन होने लगेगा। पापाजी मारते हैं मगर न के बराबर। शायद साल में एक-दो बार, सिर्फ़ एक थप्पड़, पीछे गर्दन पर। थप्पड़ की ज़रुरत भी क्या है! वैसे ही जान निकली रहती है। एक बार तो भाई-बहिनों में से एक ने, दूसरे को यार बोल दिया था, पापाजी ने सुन लिया। ऐसी डांट लगाई कि बुरी तरह सहम गए सबके सब। लगा कि यार भी बहुत गंदी ग़ाली है, ठीक है, नहीं बोलेंगे अबसे।

बच्चे कुछ ऐसा मांग लें जो दिलाना पापाजी के लिए संभव न हो तो वे समझाते हैं कि लाल (बेटा/बच्चा) हमेशा अपने से नीचे लोगों को देखो। उन्हें देखो जिनके पास वो भी नहीं है जो तुम्हारे पास है। बच्चे चुप। वैसे तो बच्चे बोलते ही कभी-कभार हैं फ़िर पापाजी का अपना जीवन इतना सीघा-सादा है कि उनसें बोलें भी तो क्या बोलें! फ़िर ख़्याल भी तो कितना रखते हैं सबका। कोई बच्चा बीमार हो तो दिन में भी आते हैं दुकान छोड़कर। सरल तो आए दिन बीमार होता है। माताजी से दवाई नहीं लेता। माताजी से वैसे भी कोई ढंग से डरता नहीं है फ़िर सरल से दवाई खाई ही नहीं जाती। कोई एक दिन की बात हो तो भी बात है। जब देखो तब बीमारी। जब देखो तब मोटी-मोटी गोलियां, बड़े-बड़े कैपसूल-सबके सब कड़वे। हर बार पानी अंदर चला जाता है, गोली या तो बाहर आ जाती है या मुंह में ही कहीं चिपकी रह जाती है। इसलिए कई बार तो सिर्फ़ दवा खि़लाने के लिए दुकान छोड़कर घर आना पड़ता है पापाजी को। फ़िर सरल की नहीं चलती। पापाजी दोनों हाथ पकड़कर या पकडवाकर, चम्मच ज़बरदस्ती मुंह में घुसाकर, ऊंगली घुसाकर, कैसे न कैसे दवा खि़ला ही देते हैं। दवा खिलाने के वे बड़े पक्के हैं। कभी-कभी सुबह प्रोटीनेक्स या बोर्नविटा वाले दूघ के लिए भी ज़बरदस्ती करते हैं। मगर वो कभी-कभी की बात है। दवाई के मामले में पापाजी कोई समझौता मुश्क़िल से ही करते हैं। ख़ुद भी कई दवाईयां नियमित रुप से खाते हैं।

कई बार सुबह-सुबह जलेबी या तरबूज़ लेकर आते हैं और अपने हाथ से सबको देते हैं। वे कहते हैं कि तरबूज सुबह ही खाना चाहिए। वे ऐसी बातें बहुत बताते हैं। कभी कहते हैं कि खरबूज़े के ऊपर पानी नहीं पीते तो कभी कहते हैं कि रात को दही नहीं खाते। जब भी घर पर होते हैं ऐसा ही कुछ न कुछ बताते रहते हैं। क्या खाओ से ज़्यादा वे क्या न खाओ बताते रहते हैं। और बस दवाईयां और दवाईयां। कई बार वे रात को जब दूसरे सारे काम कर लेते हैं तो सरल के गले पर विक्स अपने हाथों से मलते हैं। सरल को उनका पास बैठना अच्छा लगता है पर बुरा यूं लगता है कि दवाईयां वे ज़्यादा ही घिस-घिसकर लगाते हैं। एक तो सरल की काया वैसे ही बहुत नाज़ुक है ऊपर से हर वक्त की बीमारियां। वह तंग आया रहता है फ़िर पापाजी के हाथ कभी-कभी ख़ुरदुरे से लगने लगते हैं, ख़ासकर जब वे ज़ोर-ज़ोर से दवा रगड़ते हैं। उसके गले में पहले ही भयानक दर्द है ऊपर से यह रगड़। यह दर्द घटा रही है कि बढ़ा रही है! मगर पापाजी के आगे वह वैसे ही बहुत कम बोलता है और विक्स वे कोई अपने लिए थोड़े ही लगा रहे हैं, उसीके भले के लिए लगा रहे हैं। दिन भर के थके हुए तो आते हैं फ़िर भी देर रात जागकर उसे विक्स लगा रहे हैं। वह क्या कहे ! चुपचाप पड़ा लगवाता रहता है। पापाजी सरल का बहुत ज़्यादा ध्यान रखते हैं।

‘ए पिंटू! कैंची रख दे! लग जाएगी हाथ में! पहले भी कितनी बार मना किया है! चल रख!’

सरल कांप जाता है।

‘ए पिंटू! खाट मत उठा! तुझसे नहीं उठेगी! चल छोड़ दे, मैं उठाता हूं।’

सरल घबरा जाता है।

सरल को कुछ-कुछ अच्छा तो लगता है कि पापई कितना ध्यान रखते हैं, पर अंदर कहीं शायद बुरा भी लगता है। कैंची उठाने में इतना ज़ोर से डांटने की क्या बात है! वे बात-बात में ऐसा क्यों कहते हैं कि तुझसे नहीं होगा! शायद वह अभी छोटा है, इसलिए कहते होंगे। वे उसका बुरा क्यों चाहेंगे? बुरा चाहने वाला आदमी क्या इतना ख़्याल रखता है!

दूसरे घरों में ‘नंदन’ या ‘चंदामामा’ जैसी पत्रिकाएं आतीं हैं जिनमें अकसर भूत-प्रेत या राजा-रानी की कहानियां होती हैं। मगर पापाजी ने उन्हें ‘पराग’, सरिता और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाएं लगाके दी हैं। ‘पराग’ सरल को बहुत अच्छा लगता है। उसमें जैसे बिलकुल उसीके जैसे बच्चों की कहानियां होती हैं। कई कहानियां तो बच्चों की समस्याओं पर भी होतीं हैं। पापाजी को कौन बताता है इतनी अच्छी-अच्छी क़िताबों के बारे में! वे बोलते इतना कम हैं कि समझ में नहीं आता उनके दिल में क्या-क्या भरा है। एक बार रात को जब दुकान से आए तो बही-खातों वाले थैले में से एक पार्सल जैसा निकाला। फ़िर बड़े आराम से उसे खोला। वे किसी काम में जल्दी नहीं मचाते, हर काम धीमे-धीमे, करीने से करते हैं। पार्सल में से एक रंग-बिरंगी, चमचमाती हुई क़िताब निकल आई है। पापाजी सामने न बैठे होते तो बच्चे देखते ही लड़ने लगते कि ‘पहले मैं पढ़ूंगी’, ‘नहीं पहले मैं पढ़ूंगा’। क़िताब का नाम है ‘योगीराज’। दिल्ली प्रेस का प्रकाशन। पता नहीं पापाजी ने कब इसके बारे में पढ़ा होगा, कहां पढ़ा होगा, क्यों उन्हें लगा होगा कि यह बच्चों के लिए अच्छी रहेगी, कब, कैसे उन्होंने ऑर्डर दिया होगा! हमें क्या! हमें तो अब पहले क़िताब पढ़नी है, बाद में कुछ और करना है। यह कहानी है एक ढोंगी बंदर की जो कहीं एक आश्रम बना कर, छोटे-मोटे चमत्कार दिखाकर भक्तों को ठगता है। एक दिन जंगल के दूसरे जानवर प्लान बनाकर उसकी पोल खोल देते हैं और वह पकड़ा जाता है।

हम सब बच्चों को ऐसी क़िताबें ख़ूब भातीं हैं। सरल की तो यह ख़ास पसंद है। पापाई कई बार हमें यूंही सरप्राइज़ दे देते हैं।

(जारी)

05-09-2013