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22 अग॰ 2013

डर और डर की बातचीत



‘गोली मत मारना, मुझे कुछ बात......’

‘आहा, डरते हो, कुछ नहीं कर पाओगे जिंदग़ी में, डरपोक आदमी, हा हा हा .............’

‘हां डरता हूं, मुझे गोलियों में खेलने की आदत नहीं है भाई, पर उससे भी ज़्यादा मैं इसलिए डरता हूं कि तुम मुझसे भी ज़्यादा डरपोक हो। तुम डरके मारे, मुझे गोली मार दोगे और जो बात मैं करने आया हूं वो हो ही नहीं पाएगी।’

‘अरे वाह! तुम्हे घुसने क्या दिया, तुम तो सर पे ही चढ़ गए ; मैं कैसे डरपोक हूं!?’

‘तुम बातचीत से डरते हो। वरना बिना बातचीत किए गोलियां क्यों मारते फिरते हो? अभी आखि़री बार जिस आदमी को तुमने गोली मारी, उससे बात करने की कोशिश की क्या तुमने?’

‘वह आदमी इसी लायक था, मैंने उसे मार दिया, मैं बहुत ख़ुश हूं।’

‘मार दिया तो क्या तीर मारा ? तुम न मारते तो क्या वह मरता नहीं ? किसी ऐक्सीडेंट से मरता, बीमारी से मरता, वह क्या हमेशा ज़िंदा रहता !? रोज़ाना ही लोग मरते हैं। इसमें ख़ुश होने की क्या बात हुई ?’

‘मरते होंगे। लेकिन जैसे मैंने उसे मारा, लोगों को सबक मिलेगा, लोंग डरेंगे, उस आदमी के बताए रास्ते पर नहीं जाएंगे।’

‘डरे हुए लोग किसी भी रास्ते पर जाएं, उससे क्या फ़र्क पड़ता है?’ डरे हुए लोग फिर भी डरे हुए रहेंगे। तुम तो ख़ुद ही डरे हुए आदमी हो। तुम जिस रास्ते पर गए हो, क्या उसे तुमने ख़ुद चुना है? तुम्हे कैसे पता कि उसे मारने से लोग डर जाएंगे?’

‘मैं डरा हुआ नहीं हूं, मैं बलशाली आदमी हूं।’

‘बलशाली हो तो तुमने पहले उससे बात क्यों नहीं की ? तुम तो बात करने से भी घबराते हो। माफ़ करना, मगर सही बात यह है कि तुम कमज़ोर आदमी हो।’

‘किसीको मारना आसान काम नहीं है, मेरा ईश्वर मेरे साथ है इसलिए मैं यह कर सका।’

‘तुम ईश्वर को मानते हो ?’

‘बिलकुल मानता हूं। उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं हो सकता।’

‘तो फ़िर तुमने उस आदमी को मारा क्यों, ईश्वर पर छोड़ देते। तुमने तो यह साबित किया कि ईश्वर नहीं है। ईश्वर अगर तुम्हारे साथ है तो तुम लोगों को मारकर भाग क्यों जाते हो? ईश्वर तुम्हारे साथ है तो डरते किससे हो ? कलको तुम भी मरोगे, तुम क्या हमेशा ज़िंदा रहोगे !? या तुम्हे भी कोई मारेगा ; फिर कैसे तय करोगे कि ईश्वर किसके साथ है? तुमतो रहोगे ही नहीं, फिर कोई तय भी करेगा तो उससे तुम्हे क्या समझ में आएगा ?’

‘अबे.......तुम कहना क्या चाहते हो?’

‘जिनको तुम मार देते हो वे तो चले ही जाते हैं। फिर तुम्हारी बात समझता कौन है? अगर तुम्हारे पास समझाने के लिए कोई बात है तो समझाते क्यों नहीं! गोली क्यों मारते हो ? तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं है, इसलिए तुम लोगों को डराते हो।’

‘तो क्या करें, बिना डराए कोई मानता ही नहीं।’

‘डरा हुआ आदमी तो कोई भी बात मान लेता है। इससे तुम्हे यह कैसे पता लगता है कि तुम्हारी बात सही है या ग़लत ?’

21-08-2013


‘अरे भाई! बिना डराए कोई सामाजिक व्यवस्था चलती है क्या ? तुम तो कहोगे अपराधियों को भी मत पकड़ो, सबको ख़ुला छोड़ दो!’

‘मैंने कब कहा! लेकिन लोगों के अपराध और सज़ा तुम और मैं तय करेंगे !? कलको तुम कहोगे कि स्त्रियों को घरों में क़ैद रखने के लिए जो लोग छेड़खानी और बलात्कार करके डराते हैं, वो ठीक ही करते हैं ! तुम अपने बच्चों, दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोंसियों के साथ क्या करते हो !? वे तुम्हारी बात न मानें तो उन्हें गोली मार देते हो !? तुम्हे यह कैसे पता लगता है कि तुम्हारी ही बात सही है ?’

23-08-2013

‘अगर मैं कहूं कि ईश्वर गंदा है, घटिया है तो! गोली मार दोगे ?’

‘मार भी सकता हूं।‘

‘क्यों?’

‘मैं ईश्वर के खि़लाफ़ कुछ नहीं सुन सकता।’

‘क्यों? ईश्वर क्या सिर्फ़ तुम्हारा है ? जैसे हवा और पानी सबके हैं, जिसका जैसा मन आता है, इस्तेमाल करता है, वैसा ही तुम ईश्वर को बताते हो। मैं अपने हिस्से के ईश्वर से कुछ भी कहूं, तुम्हे क्या मतलब ? क्या ईश्वर पर तुमहारा कॉपी राइट है? कोई रजिस्ट्री करा ली है क्या तुमने ?’

‘मैं जिस ईश्वर की पूजा करता हूं उसके बारे में यह सब नहीं सुन सकता।’

‘तुम्हारे पूजा करने से मेरी भावनाएं आहत होतीं हैं, दिमाग़ तनाव से भर जाता है। तो क्या मैं तुम्हे गोली मार दूं? तुम ईश्वर का ठेका क्यों लिए बैठे हो आखि़र? क्या ईश्वर को तुमने बनाया है ?’

‘तुम पागल हो क्या ? ईश्वर को कोई कैसे बना सकता है ?’

‘अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा और मेरा ईश्वर एक ही है या अलग-अलग़ है ?

‘.................’

‘अगर अलग़-अलग़ है, तो मैं अपने ईश्वर से कुछ भी कहूं-सुनूं, तुम्हे लेना क्या ? अगर एक ही है तो अकेले तुम क्यों उसपर कब्ज़ा किए बैठे हो ? तुम कौन हो यह तय करनेवाले कि ईश्वर से दूसरे लोग क्या संबंध रखें, क्या बात करें, उसके बारे में दूसरों से क्या बात करें ? इसका ठेका तुम्हे किसने दिया ? इसको प्रमाणित करनेवाला कोई अथॉरिटी लैटर, कोई क़ाग़ज़-पत्तर, कोई सबूत हो तो दिखाओ !’

‘अरे मेरे पास इतना फ़ालतू वक्त नहीं है। मुझे बहुत काम है।’

‘काम नहीं है, असल बात यह है कि गोली मारना आसान काम है, क़ायदे की बात करना, समझदारी की बात करना, अहंकार छोड़कर बात करना आसान काम नहीं है। तुम आसान काम के आदी हो।’


24-08-2013


(जारी)

(एक काल्पनिक बातचीत)


2 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं है, इसलिए तुम लोगों को डराते हो।’
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    सबसे सही बात यही है उनके पास कहने या समझाने के लिए कुछ है ही नहीं इसलिए वो बस मारते चले जाते हैं... पता नहीं कौन से ईश्वर के नाम पर...

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  2. तार्किक संवाद..डरा हुआ व्यक्ति तो कुछ भी कर सकता है।

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रुके-रुके से क़दम....रुक के बार-बार चले...

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