3 मई 2011

ईमानदार बाल मामाजी की बेईमान यादें-1

आज सोचता हूं तो शर्म आती है कि मैं बाल मामाजी को घूरता था।
इस हद तक घूरता था कि वे डर जाएं। और वे डर भी जाते थे। डरते न तो क्या करते ? हर कोई उन्हें पागल, डरपोक, मूर्ख और निठल्ला साबित करनें में जो लगा रहता था।
और मैं भी वही कर रहा था जो बाद में मैंने बड़े-बड़े ‘बहादुरों’ को करते देखा। जहां कोई सॉफ्ट टारगेट दिख जाए, बहादुरी दिखाना शुरु कर दो।
होश संभालने के बाद से ही बाल मामाजी से जो परिचय हुआ, कुछ ऐसा ही हुआ कि मन में उनकी छवि एक पागल या जान-बूझकर काम से जी चुराने वाले निकम्मे आदमी की बन गयी थी।
जब हमें पता लगता कि बाल मामाजी हमारे यहां रहने आ रहे हैं, हमारी जैसे जान निकल जाती। मैं और मेरी पांच बहिनें। मां और पिताजी। हम आठों में उस वक्त कोई फ़र्क था तो बस इतना कि कोई ज़्यादा डरपोक था कोई कम। कोई ज़्यादा शर्मीला था कोई कम। किसीमें हीन भावनाएं कुछ ज़्यादा थीं तो किसीमें कुछ कम। सबसे बुरे हाल मेरे ही हुआ करते थे। जितने दिन बाल मामाजी घर में रहते, हमारी हालत और ख़राब हो जाती। कब कौन बाल मामाजी की कोई शिकायत लेकर हमारे दरवाज़े आ खड़ा होगा, ऐसी आशंका से हम हर वक्त घबराए रहते।
कभी कोई ठेलेवाला किसी परिचित या पड़ोसी को लेकर आ खड़ा होता और पूछता कि वो जो चश्मा लगाते हैं और फ़लां तरह के कपड़े पहनते हैं, क्या इसी घर में रहते हैं ? हम समझ जाते कि मामाजी ने इसकी ठेली से कुछ उठा लिया होगा और पैसे नहीं दिए होंगे। एक बार तो मामाजी ने किसी बैंक से पैसे तक उठा लिए थे। पिताजी की जानकारियों और सज्जन छवि ने बचा लिया था वरना हमें तो कांपने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था। सुना था कि एक बार बाल मामाजी ने बड़े मामाजी के बेटे को खिड़की से बाहर लटका दिया था कि ‘फेंकता हूं अभी’। पता नहीं बाद में क्या हुआ पर ज़ाहिर है कि उस वक्त वहां मौजूद सभी लोगों के प्राण हलक में आ गए होंगे।
मां कोई चालाक और ज़्यादा व्यवहार कुशल महिला नहीं थीं और उन्हें अपने भाई को लेकर परिचितों के तरह-तरह के सवालों का सामना करना पड़ता। ‘बाल आजकल क्या कर रहा है?’, ‘कोई नौकरी मिली?’, ‘पहलेवाली क्यों छोड़ दी ?’, ‘क्या कोई दिमाग़ी परेशानी है ?’ आदि-आदि।
आखिरी सवाल ऐसा था जिससे हम हर बार बचना चाहते पर कभी बच न पाते। जैसा कि उस वक्त सामाजिक माहौल भी था, हमारे मन पर भी ‘पागल’ शब्द का प्रभाव ऐसा ही था।
यूं तो बाल मामाजी में छोटे-बड़े कई हुनर थे पर वे गाना बहुत अच्छा गाते थे। ख़ासकर रफ़ी के गाए देशप्रेम के गीत। गाना गाते हुए वे मुझे भी बहुत भले लगते। वे शौकिया गाते पर अकसर ऐसे गीत गाते जिनमें आदर्शों की बात हो। वे पेंटिंग भी ठीक-ठाक कर लेते थे। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी का ख़ासा साहित्य उन्होने पढ़ रखा था। एम.एस.सी. करने के बाद स्कूल टीचर की सरकारी नौकरी उन्हें मिल गयी थी जिसे वे न जाने क्यों छोड़कर चले आए थे और मारे-मारे फिर रहे थे।
मेरे कई मित्र बाल मामाजी के साथ क्रिकेट खेलकर आनंदित होते। उन्हें कसरत और तेल मालिश का भी ख़ासा शौक था। कई बार कहते, पप्पू चल छत पर चल तेरी भी मालिश करुंगा। मैं इतना शर्मीला था कि घर के बंद कमरे के अलावा कहीं कपड़े उतारने की सोच भी नहीं सकता था, ख़ुली छत पर नंगे बदन मालिश करवाना तो मेरे लिए बहुत दूर की कौड़ी थी।
किसी भी किस्म की शारीरिक मेहनत से बाल मामाजी को कोई शर्म या परहेज़ नहीं था। वे बरतन मांजने को भी तैयार रहते और ख़ूब चमका-चमका कर मांजते। मगर घर के बाहर उन्हें जिस भी काम पर लगाया जाता, थोड़े ही दिन में छोड़कर चले आते। कई बार वे रसोई से चीज़ें चुराकर खा जाते और पकड़े जाने पर माताजी से तरह-तरह के तर्क करते। तो कई बार वे खाने में कुछ मिला होने का शक करते हुए खाने से इंकार कर देते। बाद में मुझे पता चला कि वे सीज़ीफ्रीनिया नामक मनोरोग का शिकार थे। उनकी पत्नी यानि हमारी मामी की नौकरी और रिश्तेदारों-परिचितों की मदद से किसी तरह उनका घर चलता। कभी वे नाना-नानी के पास रहते, कभी अपने बड़े भाई, कभी हमारे यहां तो कभी अपने पत्नी-बच्चों के पास। जिस किसी के पास भी वे रहते उसे भारी मानसिक तनाव और अन्य परेशानियों से गुज़रना पड़ता। उनकी अजीबो-ग़रीब हरकतें जारी रहतीं। साथ ही काम की तलाश, नौकरियां करना-छोड़ना भी  चलता रहता। बीच-बीच में उनकी मानसिक चिकित्सा भी चलती। कई बार बिजली के झटके भी दिए जाते। हममें से किसीकी भी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि उनके जीवन को अपनी ज़िम्मेदारी बना ले। मां का अपने भाई के प्रति स्नेह व कुछ हद तक साहस और पिताजी के प्रगतिशील विचार थे कि वे कई-कई महीने हमारे घर रह जाते।
-संजय ग्रोवर

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2 टिप्‍पणियां:

  1. सर आपके अन्य ब्लॉग तो लाजवाब तो हैं ही लेकिन जबसे आपने ये ''सरल की डायरी'' शुरू की है इसके दीवाने हो गए हैं....कुछ खास है इसमें अब पता नहीं क्या...लेकिन कम से कम मैं जितने भी ब्लॉगों पर गया हूँ...ये अपने आप में सबसे अलग तरह का ब्लॉग...लगा बार बार इसकी पोस्टें पढता हूँ...हालाँकि मेरी ऐसी कभी आदत नहीं रही है की कोई भी चीज एक बार पढने के बाद दुबारा पढूं लेकिन यहाँ की पोस्टें बार बार पढता ..वजह जरुर कुछ खास तो है ही....
    बाकी बाल मामाजी ...की....पता नहीं क्यों ये दुनिया ऐसे लोगों के लिए इस्तनी सख्त क्यों हो जाती है.........

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  2. आपका अंदाज़े बयाँ बेहद खूबसूरत है...

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रुके-रुके से क़दम....रुक के बार-बार चले...

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