8 जुल॰ 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-8

(पिछला भाग)

भारतीय एक ही सांस में, एक ही वक़्त में कितनी सारी विरोधाभासी बातें एक साथ सोच और कर सकते हैं, इसका एक और उदाहरण अभी-अभी देखा। ‘तनु वेड्स् मनु रिटर्न्स्’ की शुरुआत में ही नायिका/पत्नी नायक/पति के लिए कहती है-‘यह आदमी अदरक की तरह कहीं से भी बढ़ता जा रहा है‘....। यह डायलॉग मशहूर हुआ, महिलाओं ने इसे काफ़ी पसंद किया। ऐसी ही एक दूसरी, लगभग नारीवादी (सुविधा के लिए एक शब्द) फ़िल्म को देखकर बहुत-सी महिलाएं ठीक इसके विपरीत एक स्थिति को भी उतना ही पसंद कर रहीं हैं। यह फ़िल्म है-‘दम लगाके हईशा’। इसमें एक ऐसी स्त्री जिसे कि अब तक प्रचलित भाषा में ‘मोटी’ संबोधन दिया जाता रहा है, से एक आम स्वास्थ्य वाले युवक की शादी हो जाती है और धीरे-धीरे वह उसे स्वीकार कर लेता है।

अजीब बात है कि इन दोनों बिलकुल विपरीत स्थितियों पर एक साथ ख़ुश कैसे हुआ जा सकता है !? एक स्त्री मोटे पुरुष को छोड़ रही है तो दूसरी तरफ़ एक पुरुष मोटी स्त्री को अपना रहा है। (हालांकि माधवन अदरक तो कहीं से भी नहीं लगते, उसके लिए यह रोल परेश रावल या बोमन ईरानी वगैरह को दिया जा सकता था)

आज की तारीख़ में हर कोई नारीवादी है, हर कोई प्रगतिशील है, हर कोई अपने हक़ मांग रहा है, हर कोई बदलाव चाहता है !

तो फिर वो कौन है जो लोगों को हक़ लेने से रोक रहा है !?

स्त्री जहां भी लड़ रही है, किसी समकालीन/आजकल की पीढ़ी के किसी पुरुष से लड़ रही है, वह उसका पति हो सकता है, उसका भाई हो सकता है, पिता हो सकता है, पड़ोसी हो सकता है, दोस्त हो सकता है, कुलीग़ हो सकता है, बॉस हो सकता है, और कोई हो सकता है.....।

यह लड़ाई लड़नी पड़ेगी, यह ज़रुरी है।

मगर यह भी समझना होगा कि करवाचौथ, दहेज, सती, बलात्कार, छेड़ख़ानी.....आज के पुरुषों ने नहीं बनाए....... जिस तरह स्त्री की सारी मानसिकता पुरानी परंपराओं, संस्कारों आदि से बनी, ठीक वैसे ही पुरुष की भी बनी। ठीक जैसे ‘इज़्ज़त’ नाम की अजीबो-ग़रीब शय ने स्त्री का जीना हराम कर दिया, वैसे ही ‘मर्दानगी’ नाम के हव्वे ने मर्दों की नाक में दम किए रखा। सुहागरात के यानि पहले ही दिन स्त्री/पत्नी पर विजय पा लेने के निर्देशों/सलाहों से भरे, डरे हुए पुरुष बहुत लोगों ने देखे होंगे।

08-07-2015
(जारी)

(अगला भाग)

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