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15 जून 2014

मर्द की इज़्ज़त



इज़्ज़त के दुपट्टे की छांव के डर और लालच में औरत को क्या-क्या नुकसान सहने पड़े, इसपर बात चल निकली है, आगे भी जाएगी। मगर क्या ऐसा मानना ठीक होगा कि मर्दों को ऐसी किसी समस्या से कभी जूझना नहीं पड़ा!?

उसे याद आता है कि बस या ट्रेन में सफ़र करते वक़्त कभी खिड़की बंद करनी हो या खोलनी हो तो वह कभी कोशिश नहीं करता था। डर यही होता था कि पता नहीं उससे होगा कि नहीं होगा! अगर नहीं हुआ तो कोई क्या कहेगा, क्या सोचेगा, कैसा लड़का है, कैसा मर्द है, ज़रा खिड़की नहीं खुलती। अगर लड़की होता तो किसी दूसरे से कह सकता था कि ‘प्लीज़...ज़रा....’ मगर यहां तो यह ऑप्शन भी बंद है।

उसे न जाने कितनी घटनाएं याद आती हैं जब सुनने को मिलता था कि ‘देख, वह लड़की होकर कर लेती है और तुम लड़के होकर भी.......’

उस वक्त तो कोई जवाब उसे नहीं सूझता था, बस अपराधबोध और ग्लानि......जैसे कोई बड़ा अपराध हो गया हो उससे......ज़रा-ज़रा करके उसकी भी इज़्ज़त तार-तार, कई बार हुई। यह भी तो नहीं कह सकता था कि पतला हूं, दुबला हूं, शर्मीला हूं, कमज़ोर हूं तो मैं क्या करुं!? क्या मैंने अपनी मर्ज़ी से ख़ुदको ऐसा बनाया है ? यह कहेगा तो भी हंसी उड़ेगी, अपने शर्मीले और कमज़ोर होने पर वह ख़ुद ही मोहर लगा देगा। चिढ़ानेवाले और ज़्यादा चिढ़ाएंगे, रुलानेवाले और रुलाएंगे।

किसीको लेने जाना है, किसीको छोड़ने जाना है, किसीका ऐडमिशन कराना है.......वह क्या करे......उसे तो घबराने और शरमाने के सिवाय और कुछ आता नहीं...

देखो ज़रा दूसरे लड़कों को देखो, क्या भाग-भागकर फटाफट काम कर लाते हैं....

वह डूबकर मर जाए क्या ?

हीन-भावना बढ़ती जाती है मगर उसे यह भी लगता है कि उसके साथ कुछ ज़्यादती हो रही है।

समझ नहीं पाता। समझा नहीं पाता।

लक्षमण की क्या समस्या थी कि राखी सावंत ने ज़रा फटकारा और उसने ख़ुदकुशी कर ली?

इज़्ज़त के अलावा और क्या? उसकी सच्चाई सार्वजनिक रुप से सामने आई और ‘इज़्ज़त’ चली गई। वरना तो जैसे-तैसे चल ही रहा था।

अब तो क़रीब दसेक साल हो गए होंगे किसी रीति-रिवाज में शामिल हुए लेकिन पुरानी यादों में से कुछ बतातीं हैं कि लड़के भी कुछ कम डरे हुए नहीं होते थे अपने पहले संबंध को लेकर। इधर-उधर से ज्ञान मांगते फिरते थे कि कैसे पहली रात शानदार न सही, ठीक-ठाक तो गुज़र जाए।

न जाने यह कैसे हुआ कि किसीने मर्द को यह फ़लसफ़ा दे दिया कि तुम्हे ही, हर हाल में तुम्हे ही जीतना है, वरना ज़िंदगी बेकार है।

एक ऐसा संबंध, एक ऐसा खेल जिसमें एक प्रतिभागी ऐक्टिव है और एक पैसिव है......एक ऐसी दौड़ जिसमें एक दौड़ाक को दौड़ना है, दूसरे को लगभग दृष्टा बने रहना है, या आंखें ही मूंद लेनी हैं......ऐसी दौड़ तीन घंटे में ख़त्म हो या तीन मिनट में, थकेगा तो वही जो दौड़ रहा है, जो सिर्फ़ दृष्टा है वह हार भी कैसे सकता है?
इस संबंध और सच को अगर ठीक से समझा गया होता और पुरुष को फ़ालतू के अहंकारों में न जकड़ा गया होता तब भी क्या स्त्री-पुरुष संबंध इतने ही जटिल होते? क्या तब भी सभ्यता को बलात्कार जैसी समस्याओं का सामना इतनी ही मात्रा में करना पड़ता ? क्या तब भी प्रेम जैसे संबंध में शारीरिक हार-जीत के इतने बड़े मायने होते?

मर्द भी जगह-जगह अपनी इज़्ज़त तो नहीं बचाता फिर रहा ?

-संजय ग्रोवर
15-06-2014


19 सित॰ 2013

यहां हर कोई नहीं पहुंच सकता


‘आपका मेल मिला, मैं आपकी हर मुहिम में आपके साथ हूं।’
‘चलिए, किसीने तो जवाब दिया।’
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‘यह तसवीर कैसी लगा रखी है आपने?’
‘क्यों ठीक नहीं है क्या?’
‘नहीं, नहीं, बहुत गोरे हो रहे हैं आप तो।
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‘आपकी क़िताब तो आई नहीं अभी तक। जल्दी भेजिए...’
‘अरे, आप तो.....थोड़ा धैर्य रखा करें। अभी कोरियर कराके ही आ रहा हूं, रास्ते में ही हूं...’
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‘हमारे बड़े नेताजी का निधन हो गया है, आप इसपर कमेंट डालिए...
‘मैं क्यों डालूं ? नेता जी आपके हैं, मुझे क्या लेना ?’
‘तो फ़िर मैं आपको ब्लॉक......’
‘ज़रुर कीजिए, आपका तो रोज़ का काम है.....’
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‘आज शाम कुछ आतंकवादी जेल से भाग गए हैं, सज़ा पूरी होने में दो-चार दिन ही बाक़ी थे। ज़रुर कोई साजिश है। आप मेरे वॉल पे कमेंट करें....’
‘अरे मैं अभी सोकर उठा हूं, पहले ख़बर तो देख लूं ठीक से....
‘अरे, मैं क्या झूठ बोल रही हूं, टिप्पणी कीजिए......’
‘ठीक है, अभी एक वंचित वर्ग की महिला के साथ बलात्कार हो गया है, पहले आप उसपर टिप्पणी कीजिए.......’
‘हैं!’
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‘क़िताब मिल गई आपकी, यह क्या लिखा है आपने, क्या समीक्षा करवानी है...........
‘आप क्या कोई समीक्षक हैं! अरे ये आपका हौसला बढ़ाने के लिए है....’
‘क्यों, हमें क्या हौसले की कमी है?’
‘अरे, पहले ही दिन से क्या-क्या दुखड़े तो सुना रखे हैं आपने अपने......नहीं ठीक लगा तो मिटा दीजिए......’
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‘एक साहब लेखकों की डायरेक्ट्री निकाल रहे हैं, मेरा बायोडाटा इंग्लिश में है, आप हिंदी कर देंगे?’
‘भेज दीजिए, देखके बताऊंगा।
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‘यह तो बहुत लंबा है, एक पेज़ का मैटर बता दीजिए, कर दूंगा।’
‘एक पेज का....अच्छा मैं बता.....
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‘तीन दिन हो गए आपने बताया नहीं कुछ ?’
‘अभी टाइम नहीं है मेरे पास....’
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‘10 दिन हो गए आपने ट्रांसलेशन नहीं किया। अब उनका फ़ोन आ रहा है, बायोडाटा जल्दी भिजवाएं, अब मैं क्या करुं?’
‘मैंने तो आपसे रोज़ पूछा, आपने बताया ही नहीं, कौन-सा पोर्शन करना है?’
‘आप अपनी क़ाहिली को छुपा रहे हैं.....
‘देखिए, मुझसे आप यह ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली हरकत मत कीजिएगा....मैं उस तरह का आदमी नहीं हूं.......’
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‘आए दिन आप ब्लॉक करते हो, आए दिन फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हो, यह क्या नाटक है?’
‘मैंने कब भेजी? आपको यूंही लग रहा है!’
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‘आज फ़िर आपने यह लिंक भेज दिया। मैं भेज देता तो सुनने को मिलता कि अश्लील गाने भेजते हो!’
‘किसने भेजा, मैंने तो नहीं भेजा!’
‘कमाल है, आपको झूठ बोलने में महारत हासिल है या कोई मानसिक समस्या है?
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‘कविताएं नहीं भेजी आपने, प्लीज़ भेज दीजिए, बिलाल साहब रोज़ाना फ़ोन कर रहे हैं।’
‘अरे मेरी कोई रुचि अब रह नहीं गई है भेजा-भाजी में!’
‘मेरी ख़ातिर भेज दीजिए।’
‘अच्छा देखता हूं, मन हुआ तो आपको ही भेज दूंगा।’
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‘आज भी नहीं आईं आपकी कविताएं ; हमने तो पहले ही कहा था कि आप बीच रास्ते ही हमें छोड़ जाएंगे।’
‘छोड़ जाएंगे!? आपने तो हमेशा प्रगतिशील दिखाया है ख़ुदको! फ़िर यह छोड़ना
-पकड़ना कहां से आ गया ?’
‘अच्छा, आप कविताएं तो भेज दीजिए।’
‘भेज दी हैं।’
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‘आप ढूंढके दिखाईए हमें ; यहां हर कोई नहीं पहुंच सकता।’
‘देखिए इस तरह की पैंतरेबाज़ी में मैं यक़ीन नहीं रखता। अगर आपको मुझे बुलाना ही है तो सीधा कहिए। मैं आ जाऊंगा। बार-बार इस तरह की बातें न किया करें।’
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‘मन नहीं लग रहा आज...’
‘तो थाईलैंड में चले जाईए......’
‘मतलब..!?’
‘...............’
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‘फ़लां साहब शादी के पीछे पड़े हैं, हैंडसम हैं, अच्छा ख़ानदान है, जल्दी मचा रहे हैं....’
‘तो कर लीजिए। इसमें मुझे बताने की क्या बात है!? आपका पर्सनल मामला है। पूछना ही है तो अपने साहब से पूछिए.....’
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19-09-2013

(जारी)

(लिखी जा रही कहानी से कुछ अंश)

11 जुल॰ 2013

पितृसत्ता का पिता पाखण्ड

10/11-07-2013

राजधानी आए सरल को शायद साल-भर हुआ होगा, कॉलोनी की एक शांत सड़क पर दोस्त के साथ टहल रहा था कि-

‘ओए, ए’

एक कड़क और बुलंद आवाज़। पुलिस जैसी कद-काठी वाली एक स्त्री ने एक स्कूटर-सवार को रोका। लड़का-सा ही था। स्त्री तड़ातड़ शुरु हो गई, वह लड़के को तमाचे पर तमाचे मार रही थी, ग़ालियां दे रही थी और चिल्ला-चिल्लाकर कुछ इल्ज़ाम लगा रही थी-स्साल्ले को स्कूटर दे रखा है, सारा ख़र्चा उठाती हूं, घर दे रखा है, खाना देती हूं, सब देती हूं....साला फिर भी दूसरी लड़कियों के साथ घूमता है..........

लोग अवाक्, स्तब्ध देख रहे थे और सुन रहे थे....

कम-अज़-कम 8 साल तो हो ही गए होंगे इस घटना को। शब्द थोड़ा इधर-उधर होंगे मगर मंतव्य लगभग यही था। वह स्त्री बिलकुल वही बातें कह रही थी जो कोई मर्दवादी मर्द अपनी आश्रिता से कहता है।

सरल ने स्त्री-सत्ता भी देखी है जीवन में, अघोषित स्त्री-सत्ता। दरबार जैसा लगा है, पुरुष भी आ-आकर स्त्री से सलाह ले रहे हैं, स्त्री के फ़ैसले बड़ी गंभीरता से लिए जा रहे हैं। मगर स्त्री फ़ैसले क्या ले रही है? फ़ैसले वह वही ले रही है जो कोई भी रुढ़िवादी पुरुष लेता है। घर में अन्य स्त्रियों की हालत क्या है? वह भी रुढ़िवादी घरों जैसी ही है। फ़र्क कोई है तो इतना कि खाना-कपड़ा अच्छा मिल रहा है, दूसरों की उपस्थिति में थोड़ा-बहुत दूसरे पुरुषों से हंसा-बोला भी जा सकता है.....

सरल आजकल पितृसत्ता से नाराज़ स्त्रियों के स्टेटस वगैरह देखता है, एक दिलचस्प समानता वहां दिखाई देती है, उनमें से कई अकसर अपने पिताओं की तारीफ़ करती पायी जातीं हैं, मांओं के नाम भी कहीं-कहीं आ जाते हैं भूले-भटके.....

पिता हीरो हैं, पितृसत्ता से घृणा है! बात कुछ अजीब तो लगती है।

पिछले दिनों एक विज्ञापन भी देखता रहा सरल जिसमें एक लड़की अपने ब्वायफ्रैंड या फ़ियांसी को बता रही है-‘मैंने लड़कों को भी छेड़ा है।’

सरल को आज तक यह नहीं समझ में आया कि जो आप अपने प्रति ग़लत समझते हैं वही दूसरे से करके नायकत्व कैसे महसूस कर सकते हैं!? कह सकते हैं कि स्त्रियों की तो अभी शुरुआत है, थोड़ी-बहुत बदले की भावना तो रहती है मन में। चलिए यह बात यहां छोड़ी।

कुछ दिन पहले फ़ोन पर एक मित्र से बात हो रही थी, उसका कहना था कि जो महिला कुछ जुगाड़बाज़ी करके कैरियर बनाती है, संभवतः एक क़ाबिल महिला का हक़ तो छीनती ही है। बात को ज़रा खोल कर समझें-एक स्त्री किसी मर्द के साथ सोकर अपना काम निकालती है, ठीक है, किसीको क्या लेना-दो का आपस का मामला है। समस्या वहां से शुरु होती है जब वह स्त्री ख़ुदको भारी संघर्षशील और विद्रोही की तरह प्रोजेक्ट करती है। पुरुष तो यह काम पहले से ही कर रहा है; थोड़ा-सा फ़र्क़ यही है कि पुरुष आम-तौर पर इसे संघर्ष तो कहता है, विद्रोह से नहीं जोड़ता। और सरल ऐसा कहने में किसी माफ़ी की दरकार नहीं समझता कि भारत में ज़्यादातर मामलों में ऐडजस्टमेंट को ही संघर्ष कहा जाता रहा है। इस मामले में स्त्री और पुरुष के एक जैसे हाल हैं, होंगे ही। वजह है पाखण्ड की हमारी संस्कृति। मामला पितृसत्ता और मातृसत्ता का नहीं है-उससे कतई कोई समस्या हल होनेवाली नहीं है। असल जड़ तो पोंगे धर्म और पाखण्डी संस्कृति में छिपी है। कोई सत्ता ज़्यादा दिन अहंकार से मुक्त नहीं रहती, रह नहीं सकती। असल में तो अहंकारी को ही सत्ता की कामना और ज़रुरत ज़्यादा होती है। वरना सत्ता की ऐसी ज़रुरत भी क्या है!? जो भी घर में क़ाबिल हो उसे कामचलाऊ सत्ता दे दी जाए-चाहे वह पुरुष हो चाहे स्त्री। सही बात तो यह है कि समानता जब आ जाएगी तो घर को किसी मुखिया की ज़रुरत होगी भी क्यों!?

अभी एक आंदोलन हुआ जिसमें एक वृद्ध सज्जन बार-बार कहते कि ‘नेता हमारे मालिक़ नहीं है, अरे मालिक तो हम हैं, तुम्हे तो हमने नौकर बनाके भेजा था....

सुनने में ऐसे डॉयलॉग अच्छे बहुत लगते हैं मगर व्यवहार में सोचें तो इस तरह के नुस्ख़े परिवर्त्तन के वाहक नहीं हो सकते। अरे, जब मालिक़ होना बुरी बात है तो तुम्हे भी क्यों होना चाहिए मालिक़!?

इस तरह की बातें समानता का आधार नहीं हो सकतीं!

12-07-2013

सरल अपने अनुभव से देखे तो यह बिलकुल भी ज़रुरी नहीं है कि बेटियों को बढ़ावा देनेवालें मां-बाप प्रगतिशील ही हों। कतई नहीं। मामला कुछ और ही है। बात यह है कि मां-बाप को चाहिए सफ़ल औलाद, दुनियादार औलाद, झट से काम निकाल के ले आनेवाली औलाद। और एक बेईमान और पाखण्डी समाज में काम निकालने के लिए भी, और कथित सफ़लता के लिए भी, आपको वैसा ही होना पड़ेगा जैसा समाज है। और अगर बेटी वैसी निकल आए तो पिता का प्यार उधर को शिफ़्ट होने लगता है। तब और भी ज़्यादा होता है जब उसे बेटे का वैसा न हो पाने का ग़म साल रहा हो।

दो पिता तो सरल को सफ़र में ऐसे मिले हैं जिन्होंने पहली बार की मुलाक़ात में ही बेटी की तारीफ़ और बेटे की बुराई शुरु कर दी।

और ऐसे पिता बेटों के साथ वही दुर्व्यवहार शुरु कर देते हैं जो वे अब तक बोझ लगनेवाली बेटियों के साथ करते आए होते हैं। ज़ाहिर है कि यहां बेटियों को ऐसे पिता महान नज़र आते हैं। साधारण बुद्धि का आदमी तो सीधा गणित जानता है। कि जो मेरा फ़ायदा करा रहा है वह अच्छा आदमी है, महान शख़्सियत है। मुझे उसकी तारीफ़ करनी चाहिए।

और सरल को कोई हैरानी नहीं होगी अगर कलको लोग बेटा पैदा होते ही उसे ज़मीन में गाड़ दिया करें। सवाल बेटे-बेटी का है ही नहीं। पेंच तो यह है कि एक स्वार्थी, लालची, पाखण्डी और अंधा समाज ख़ुदको त्यागी, अध्यात्मिक, सामाजिक और न जाने क्या-क्या माने बैठा है। और जिस एकमात्र पड़ोसी या पुराने भाई से वह रोज़ाना लड़ता फिरता है, वह धर्म संस्कृति के मामले में उससे भी दो हाथ आगे है, सवा सेर है।

सोए हुए लोगों के हाथ जनजागरण का उस्तरा लग जाए तो कुछ भी संभव है।

14-07-2013

झूठ बोलने से समस्याएं हल नहीं होतीं। वे समस्याएं तो बिलकुल भी हल नहीं होतीं जो पैदा ही झूठ की वजह से हुई हों। झूठ से लोग ख़ुश ज़रुर हो जाते हैं, झूठे लोग और जल्दी ख़ुश होते हैं। आप स्त्रियों से उनकी अंधाधुंध तारीफ़ करें, ज़्यादातर ख़ुश होंगीं। कई तथाकथित नारीवादियों को सरल देखता है, वे यही करते नज़र आते हैं। नारीवाद का कोई विपरीत तार्किक विश्लेषण देखते ही वे भड़क जाते हैं। या शायद भड़क जाने का अभिनय करते हैं। इन्हें देखकर कई बार उन छोकरों की याद आती है जो पीछे तो लड़कियों की मां-बहिन करते मगर सामने उनकी पलक, आंख, नाक, आवाज़, अंदाज़, संस्कार और न जाने किस-किसकी आरती जैसी उतार देते। ज़ाहिर है कि इस आरतीनुमा से लड़कियां जल्दी प्रभावित हो जाया करतीं और जल्दी क़रीब आ जाया करतीं।

मगर क्या इस तरह के नुस्ख़े औरतें की समस्याएं जल्दी सुलझा देंगे!?

थोड़ा-सा ईमानदार होकर हमें देखना चाहिए कि बच्चों के प्रति हमारा नज़रिया क्या रहा है! बच्चे कोई बच्चों की ख़ुशी के लिए नहीं पैदा करता। निस्वार्थ भाव से भी पैदा नहीं करता। यह ठीक है कि मां-बाप छोटे बच्चों का बहुत ध्यान रखते हैं, पैसा ख़र्च करते हैं, समय देते हैं, करज़ा लेकर पालते हैं, रात-रातभर जाग-जागकर पालते हैं, सब सही है। मगर यह भी सही है कि जिस दिन मां-बाप को लगता है कि बच्चे से वह नहीं मिला जिसकी उन्हें अपेक्षा थी, उनका व्यवहार बदलने लगता है। बेटे-बेटी में छोड़िए, वे बेटे-बेटे में और बेटी-बेटी में भी भेद करते हैं। अगर निस्वार्थ पैदा करने की बात सही होती तो कैसे कोई बेटियों को मार डालता या उनसे दुर्व्यवहार करता!? स्त्रियों से मां-बा पके इस दुर्व्यवहार की वजह!? उनसे उनके स्वार्थ नहीं पूरे होते। जहां-जहां हो रहे हैं, लड़कियां भी नाम कर रही हैं, प्रतिष्ठा बढ़ा रही हैं, पैसा ला रही हैं, मां-बापों का ‘प्रेम’ उनपर ‘उमड़’ रहा है। आसानी यह भी हो गयी है कि सामाजिक माहौल अब थोड़ा-थोड़ा इस प्रेम को भी स्वीकृति दे रहा है।

मगर विश्लेषण की बात यहां यह है कि क्या यह वाकई प्रेम है!? क्या यही प्रगतिशीलता भी है!?

(जारी)


-संजय ग्रोवर


.......

17 फ़र॰ 2013

मिनी स्कर्ट और करवा चौथ


‘मेरे ख़्वाबों में जो आए.....’


फ़िल्म समझ में नहीं आई सरल को। करवा-चौथ देखकर तो मन बिलकुल ही उचाट हो गया था। लेकिन गाना जब भी देखता, अच्छा लगता। यह कोई-पूछने बताने की बात नहीं लगती सरल को कि गाना किस भाव से/किस मक़सद से फ़िल्माया गया होगा।
उसी भाव से देखता भी रहा सरल। मगर तौलिया....मिनी स्कर्ट...दोस्त जैसी मां...अनजाने से प्यार...मां-बाप की अनुमति.....परंपरा.....अंततः करवा-चौथ......

यूं सरल ऐसा नहीं मानता कि स्कर्ट पहनने वाली महिला आधुनिक या हर हाल में तार्किक होगी ही होगी......
लड़के या मर्द तो कबसे नेकर पहन रहे हैं...सब आधुनिक तो नहीं हो सके....

हां, कपड़े अगर अपनी समझ और तर्क से आएं बदन पर तो शायद इनका थोड़ा-बहुत संबंध आधुनिकता से हो सकता है। प्रतिक्रिया आवश्यक रुप से प्रगतिशीलता नहीं हो सकती। हालिया गैंग-रेप के कुछ ही दिन बाद शायद फ़ेसबुक पर ही पढ़ा कि यूपी में कहीं स्त्रियों ने कोई गैंग बनाया है, वे पुरुषों को देखकर मुस्कुरातीं हैं और जब वह पुरुष पास आता है तो पिटाई कर देतीं हैं। हवा चली हो तो ऐसे स्टेटस पर लाइक, सुपरलाइक, सलाम, कमाल...का ढेर लग जाता है। पता नहीं यह ख़बर कितना सच थी मगर मैं सोच रहा था कि कितनी अजीब बात है कि पुरुष अगर बेवजह किसी लड़की को देखकर मुस्कुराएगा तब भी वह पिटेगा और स्त्री मुस्कुराएगी तब भी वह पिटेगा। ग़ज़ब फ़िलॉस्फ़ी है, अजब मानने वाले हैं। मगर हवा चली हो, भीड़ का साथ हो तो अंट-संट सब चलता है। और सलाम-सलाम, जय-जयकार सब मिलता है। मगर इस तरह की तार्किकता और सोच को प्रोत्साहन दिया जाएगा तो कलको हमें लौटकर फिर यह भी मानना पड़ेगा कि लक्षमन ने सूपर्णखां की नाक काटकर ठीक ही किया था।

अभी एक दिन किसी चैनल पर अपनी पसंदीदा फ़िल्म ‘बैंडिट क्वीन’ देखने को मिल गयी। उसके ठीक बाद तब्बू वाली ‘अस्तित्व’ शुरु हो गयी। वह भी दोबारा देख डाली। इस बार एक चीज़ अजीब लगी। पति की अनुपस्थिति में तब्बू और मोहनीश बहल का जो संबंध स्थापित होता है उसमें दोनों की बराबर की सहमति है। मगर बच्चा देखने आए मोहनीश बहल को तब्बू जिस क्रूरता से अपनी ज़िंदग़ी से निकाल फ़ेंकती है वह कहीं से भी न तो मानवीय लगता है न तार्किक। उसके पीछे जो तर्क वह देती है वह और भी बेहूदा और लचर है। वह देवी-देवताओं के ज़मानेवाला पाखण्डी और बेईमान तर्क है कि मैं शरीर से तुम्हारे साथ थी मगर मेरी कल्पना में मेरे पति का ही चेहरा था.....वगैरह। ऐसा ही था कुछ। पूछो, थोड़ी देर को इस थोथे और अविश्वसनीय तर्क को मान भी लिया जाय तो दूसरे आदमी का इस बात से क्या लेना कि क्या करते समय तुम्हारे ज़हन में किसका चेहरा था!? अभी मैं किसीको अपनी कार तले कुचल दूं फ़िर उसके घरवालों से कहूं कि यार जाओ, छोड़ो, उसे कुचलते समय मेरी कल्पना में एक बलात्कारी देवता का चेहरा था!

चलेगा, यहां ऐसे ही चलता है। जब भी ऐसी घटनाएं होतीं हैं, हवाओं में शोर भर जाता है कि एक-एक लड़के को बचपन से स्त्रियों का सम्मान करना सिखाना चाहिए।  अतिरेक, अतिश्योक्ति और बनावटीपन को पुनःस्थापित करने की चाहत से भरी यह मांग उसी भावुक भारतीय संस्कृति का हिस्सा है जिससे बीमारियां पैदा होती हैं। बच्चे को सिखाना यह चाहिए कि हर अच्छे इंसान का आदर करो, स्त्री हो, पुरुष हो, उभयलिंगी/लैंगिक विकलांग हो, कोई हो। किसीमें भेद मत करो, सब इंसान एक जैसे हैं। यह कतई अव्यवहारिक सोच है कि सभी स्त्रियों का सम्मान करो। इससे फिर झूठी संस्कृति पैदा होगी। न कोई सब मर्दों का सम्मान कर सकता है न कभी सब स्त्रियों का कर पाएगा। जलनेवाली बहू और जलानेवाली सास का एक साथ सम्मान कैसे संभव है? ससुर के मुंह पर थूकनेवाले दामाद और ससुर का एक साथ सम्मान संभव नहीं है। नमस्ते, हाय, हलो यानि रोज़ाना का अभिवादन अलग़ बात है, सम्मान दिल और दिमाग़ की गहराई से उठनेवाला भाव है। अगर लड़कों से ज़बरदस्ती सभी स्त्रियों का सम्मान कराया जाएगा तो उन्हें पाखण्ड ही करना पड़ेगा जैसा अब तक स्त्रियों को करना पड़ता था। इधर की बीमारी उधर शिफ्ट हो जाएगी।

‘होना/सोना किसी ख़ूबसूरत दुश्मन के साथ’ प्रसंग की तरह लेख का ग़लत पाठ करके बहसों को भटकानेवाले षड्यंत्रकारी और कमसमझ लोगों को यह भी बता दूं कि किसीका सम्मान न करने का मतलब यह नहीं होता कि उसका अपमान किया जा रहा है।

इस तरह मजबूरी के सम्मान के बाद दिल में रह गयी ख़लिश की किरचें बाद में परेशान करतीं हैं, चैनो-सुक़ून छीन लेतीं हैं।

‘‘जब भी मुझे ज़रुरत होगी आप आ जाया करोगे?’’

जवाब न देने से कैसी छटपटाहट बची रह गयी! उसी वक्त कह देना था, अच्छा मुझे क्या सिर्फ़ शरीर समझा है!? यही बात मैंने कह दी होती तो मेल शॉविनिस्ट और न जाने क्या-क्या उपाधियां मिल गयी होतीं। और कड़कड़ाती ठंड में रात बारह बजे फ़ोन-सेक्स की मांग, सामने कमरे में मां बीमार पड़ी है। ऊपर से हुक्म कि तो क्या हुआ, दरवाज़ा खोलकर घर से बाहर भी तो आया जा सकता है।

कमाल है! कौन है यह? जो समझा था उसका तो कोई चिन्ह कहीं दिखाई देता नहीं! निन्यानवें प्रतिशत हरकतें तो शातिर मर्दों वाली ही हैं। इन्होंने क्या किसीको आज़ादी दिलानी है! इनकी सोच और हरकतें तो बिलकुल उनके जैसी ही हैं जिनसे इन्हें आज़ादी चाहिए।

पर क्या करें, कोई देश, कोई समाज जिस संस्कृति की वजह से Qतियों की जन्नत बन गया हो, उसीपर वार करने के अलावा हर चीज़ पर वार किया जा रहा हो। पाखण्डी संस्कृति के जाल में कसमसाते-छटपटाते समाज में पाखण्डी और Qतियों (वे मेल हों कि फ़ीमेल हों कि बेमेल हों) की मौज ही मौज ही मौज होती है। मौक़ापरस्त हर जगह अपने लिए ऐशो-इशरत का रास्ता खोज लेता है। एक ठग संस्कृति में, जहां हर जगह शीर्ष पर ठग ही ठग बैठे हों, पके-पकाए ठग पहले कपोल-कल्पित कहानियों के ज़रिए समाज को ठगते हैं, फ़िर उन ठगियों से पीछा छुड़ाने के नाम पर भी उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी ही ठगते हैं।

इस ठग-संस्कृति से छुटकारा पाने के अलावा और कोई रास्ता हो सकता है क्या?

जैसे पेट में पथरी के टुकड़े परेशान करते हैं वैसे ही पाखण्डी संस्कृति से उपजे आचरण के बाद ज़हनो-दिल में जाने कितने टुकड़े बचे रह जाते हैं, कुछ अपने कुछ दूसरों के....

पहले जो मर्दो ने मेरे साथ किया अब मैं उनके साथ करुंगी.....

सोचने की बात है, जो कर गए उनके तो मज़े ही मज़े हैं, उनका तो बाल बांका नहीं होगा, भुगतेगा आनेवाला, जो हुआ था उससे कोई लेना-देना भी नहीं है उसका। वह मुफ्त में सूली चढ़ जाएगा।
मगर हवा जो चली है। उसमें यही होता है।

इधर विरोध चलता है एक संपादक का कि स्त्री-विमर्श को देह-विमर्श बना दिया। साथ ही यह भी चलता है कि मैं कितनी भी छोटी स्कर्ट पहनूं, किसीको क्या? दूसरा जुमला सुनाई पड़ता है मैं एक साथ आठ के साथ संबंध रखूं तो तुम्हे क्या? तो यही तो संपादक जी कह रहे थे! थोड़ी-सी अक्ल हो तो समझा जा सकता है कि खेल संपादक जी को बदनाम करके उनके मुद्दे ख़ुद हथिया लेने का रहा। संपादक जी हिम्मतवाले थे, साफ़ शब्दों में कह रहे थे। हथियानेवाले अधकचरे ढंग से ही कहेंगे। शुक्र है कहीं कोई यह नहीं कह रहा कि देखो कितना बदलाव आ गया। देखो छोटे डब्बे पर ब्रहममहूर्त्त में एक लड़की मिनी स्कर्ट पहनकर सती होगी। हर चैनल पर ‘लाइव’ ज़िंदा जलेगी।

ऐसे अधकचरे माहौल में स्कर्ट के साथ करवाचौथ अगर बिलकुल भी परेशान नहीं करता तो बहुत हैरानी की बात नहीं है।

-संजय ग्रोवर






15 सित॰ 2012

बाल को बाल ही रहने दो...


जिस दिन पहली बार लगा कि शेव करने के बाद ज़्यादा आकर्षक लगता हूं उसी दिन से घिस-घिसकर दाढ़ी-मूंछ साफ़ करना शुरु कर दिया। दिल्ली आकर भी नयी मित्र-मंडली और दूसरे लोगों से जो परिचय बना, एक क्लीन-शेवन व्यक्ति का बना। कुछ साल व्यवसाय किया। अच्छे दिन थे। एक दुकानदार के रुप में इतना लोकप्रिय और सफ़ल होऊंगा, कल्पना भी न की थी। फ़िर कुछ हुआ कि दाढ़ी-मूंछ बढ़ने लगी। मन नहीं होता था बनाने का। मेरे लिए इसका ज़्यादा से ज़्यादा यही अर्थ था कि दाढ़ी-मूंछ की वजह से चेहरे का आकर्षण कुछ कम हो गया होगा। यह नहीं सोचा था कि लोग देखने आने लगेंगे और कहानियां तलाशने लगेंगे। संभवतः कुछ को चिंता रही होगी कि किसी परेशानी में तो नहीं है। मगर दो-चार ने ‘दाढ़ी क्यों बढ़ा ली’ इस भाव से पूछा जैसे मैंने अपनी नाक काट ली हो या घुटना जान-बूझकर बुलडोज़र के नीचे दे दिया हो। कुछेक ने इस नज़र से देखा कि मुझे लगा मैं चिड़ियाघर के पिंजरे में बंद कोई ऊदबिलाव हूं।

दाढ़ी-मूंछ हों या सर के बाल हों, मेरे लिए ये महज़ बाल हैं ठीक वैसे ही जैसे शरीर के कई दूसरे हिस्सों में उग आने वाले बाल हैं। या हाथ-पैरों में उगनेवाले नाख़ून हैं। फ़र्क़ यही है कि जो बाल और नाख़ून कपड़ों से बाहर दिखाई पड़ते हैं उन्हें व्यक्ति ज़्यादा स्वच्छ और आकर्षक रखने की कोशिश करता है। अगर कोई किसी मजबूरी के चलते यह सब न कर पाए तो भी कम-अज़-कम मैं तो उसे पागल, सनकी या किसी धर्मविशेष से जुड़ा करार नहीं दे देने वाला। कलको कोई नया धर्म या संप्रदाय, बगल के बालों को अपना प्रतीक बना ले तो उससे मेरा क्या लेना-देना है!? मैं क्यों अपने बगल के बालों को उस प्रतीक के अनुकूल या प्रतिकूल रुप देने लगूं!? व्यक्तिगत रुप से मैंने कभी भी अरतीकों-परतीकों को बहुत ज़्यादा महत्व नहीं दिया।

कई लोग अपने काले बालों को भी हरा-पीला कर लेते हैं। कुछ लोग अच्छे-भले बालों को मुंडाकर टकले हो जाते हैं। लड़कियां ही नहीं कई बार लड़के भी नाख़ून बढ़ाकर उन्हें सजाते-रंगते हैं। ये उनकी अपनी स्वतंत्रता या समस्या है, इसमें मुझे बिन बुलाए ही टांग क्यों घुसेड़नी चाहिए!? बाल और नाख़ून व्यक्ति की अपनी संपत्ति है। अपनी संपत्ति के साथ कोई जो चाहे करे, इसमें किसी दूसरे को या धर्म-संप्रदाय को भी ऊंगली करने का क्या हक़ है!?

मुश्क़िल तब और बढ़ जाती है जब लोग अपने कन्फ्यूजन्स और पूर्वाग्रहों को दूसरों पर लादने लगते हैं। अभी एक आंदोलन सभीने ऐसा देखा जो आंदोलन कम और झण्डों और टोपियों जैसे प्रतीकों का जोड़ ज़्यादा था। पहले ये लोग राष्ट्रीय प्रतीकों की महामहिमा बताकर हीरो बनते रहे। फ़िर यही लोग राष्ट्रीय प्रतीकों पर वार करके हीरो बनने लगे। ‘चित्त भी मेरी, पट भी मेरी, चारों ओर ही भरे पड़े हैं मेरे जैसे’ वाली बात हुई।


इसी तरह मैं कुछेक दफ़ा ऐसे लोगों से भी दो-चार हुआ हूं जो पहले तो किसी प्रतीक के न होने पर संबंधित व्यक्ति को अधार्मिक या असामान्य करार दे देते हैं। आगे चलकर वे किसी डर, किसी परिस्थिति, किसी प्रभाव के चलते ख़ुद ही ‘बदल’ जाते हैं और उस प्रतीक से मुक्ति पा लेते हैं। अब वे उस प्रतीक को धारण करने वाले पर बिना कारण जाने हंसना शुरु कर देते हैं। दरअसल ऐसे लोग बदले होते ही नहीं है। पहले अगर उन्हें कुछ बालों ने बतौर प्रतीक जकड़ रखा होता है तो बाद में बालों का न होना उनके लिए एक प्रतीक बन जाता है और उनके दिमाग़ को एक नए क़ैदखाने में धकेल देता है।

प्रतीकों से आदमी को आंकने की कोशिश कई दूसरे स्तरों पर भी ख़तरनाक या नुकसानदायक हो सकती है। इस आधार पर आंकेंगे तो शेखर कपूर और बिन लादेन को एक ही तराज़ू पर तौला जा सकता है। यानि लादेन अगर अपनी दाढ़ी ट्रिम करा लें तो ‘बैंडिट क्वीन’ जैसी फ़िल्म बना ले! या शेखर अपनी दाढ़ी खुल्ली छोड़ दे तो एक दिन धार्मिक कट्टरपंथी हो जाएंगे !? इसी क्रम में यह भी याद रखना चाहिए कि मुंबई हमले के दोषी दाढ़ी हटाकर वहां तक पहुंचे थे। कुछ दिन पहले नेपाल में एक आतंकवादी कथित हिंदू पहचान के साथ पकड़ा गया है।

तो हे ऊपर-नीचे के कथित ख़ुदाओ और भगवानों, मेरे बाल, बाल हैं और नाख़ून, नाख़ून हैं। तुम अपने बालों को जो समझना चाहो समझो, मगर मुझे और मेरे बालों को अपने हाल पर छोड़ दो।


-संजय ग्रोवर

(सरल का धन्यवाद कि अपने ब्लॉग पर लेख साझा करने दिया)


28 दिस॰ 2010

सिर्फ़ पाले बदल जाएंगे

सरल बताता है कि उसे उस ऐपिसोड का काफ़ी बड़ा हिस्सा मिल गया है देखने को। राखी वहां ग़लत भी नहीं है। लेकिन वे जिस तरह ‘मर्द’, नामर्द’ और ‘नपुंसक’ जैसे शब्दों का प्रयोग करतीं हैं वह दिखाता है कि आधुनिक होती दिखती स्त्री अभी मर्द-मानसिकता बल्कि वर्चस्ववादी मानसिक अनुकूलन से बाहर नहीं निकल पायी है जहां हर तरह की बहादुरी के लिए एक ही शब्द का बार-बार प्रयोग होता है-मर्दानगी। और यह या ऐसे संबोधन औरत में उसके औरत होने को लेकर कमतरी का अहसास कराते हैं। राखी लक्षमण को कायर, डरपोक, अपराधी, घुन्ना या ऐसा ही कुछ और कह सकतीं थीं।
राखी को छोड़िए, सरल ने कई समझदार लोगों को यह कहते पाया कि ‘औरत का तो मैं बहुत सम्मान करता हूं।’
सरल को हैरानी होती है।
क्यों भई, बात-बेबात, बिना सोचे-समझे किसी भी औरत का सम्मान क्यों करने लग पड़ते हो आप !? फिर तो आप उस सास का भी सम्मान करोगे जिसने बहू को जला दिया !? आप उस सरगना औरत का भी सम्मान करोगे जो लड़कियां खरीदती-बेचती है, धंधे में उतारने से पहले उसे भूखा रखती है, गुर्गों से बलात्कार तक करवा डालती है।
सम्मान किसी का भी हो सकता है जिसमें अच्छाई हो, अलग से सिर्फ़ औरत का सम्मान क्यों ?
यह दरअसल बीमारी को ख़त्म करने की बजाय इधर से उधर शिफ्ट कर देने जैसा है।
कलको सारे चुटकले औरत की अतार्किक हंसी उड़ाते थे, अब मर्द की उड़ाने लगेंगे। आज तक जो ज़ुल्म मर्द कर रहा है, औरत करने लगेगी। कर भी रहीं हैं।
शोर उट्ठेगा कि नहीं-नहीं, औरत ऐसा कैसे कर सकती है, वह तो त्याग की मूर्ति है, करुणा की देवी है। औरत, मर्द से कहीं ज़्यादा संवेदनशील होती है।
यही, एक-दूसरे पर श्रेष्ठता के दावे धार्मिक और लैंगिक बीमारियों की जड़ है।
औरत की आंखों की जो बेचारगी हमें करुणा लगती है, ध्यान से देखें तो वही करुणा भूख से मरते किसान और इंसान होने के बोध से नावाकिफ़, गालियां खाते सफ़ाई कर्मचारी की आंखों में भी दिख जाएगी। आदमी जितना ज़्यादा मजबूर होता है उतना ज्यादा करुणाजनक लगता है। जैसे-जैसे समर्थ होता है, उसका असली स्वभाव बाहर आना शुरु होता है। सरल नहीं कहता कि मजबूर को समर्थ नहीं बनना चाहिए। लेकिन करुणा और संवेदना को औरत और मर्द में बांटने से ज़्यादा कुछ निकलने वाला लगता नहीं।
फिर तो ऐसे बेवकूफ़ी भरे आश्चर्यों से छुटकारा पाने की उम्मीद छोड़ ही देनी चाहिए कि ‘हाय ! औरत ही औरत की दुश्मन कैसे हो गयी ?’
इंसान, इंसान से लड़ता है, मर्द, मर्द के खि़लाफ़ षडयंत्र करता है, कुत्ता, कुत्ते पर भौंकता है। इसमें हैरानी नहीं तो औरत से औरत की दुश्मनी पर इतनी हैरानी क्यों !?
कलको एक महिला सिपाही एक महिला जेबकतर को जेल ले जाती दिखेगी तो भी यही कहेंगे क्या कि हाय ! देखो मैं कहता था न औरत ही औरत की दुश्मन है’ !
सीधी बात कि एक इंसान ने ग़लती की और दूसरा इंसान जिसपर व्यवस्था का जिम्मा है, उसे पकड़कर ले जा रहा है।
काहे उलझा रहे हो चीज़ों को, भाई ?
पर हवा ? अंधी पक्षधरता ? उसका क्या करें ?
एक हवा पहले चलती थी कि औरतें तो सब मूर्ख होतीं हैं, उनकी अक़्ल घुटनों में होती है।
एक हवा अब चली है कि मर्द साले, सबके सब सुअर, मेल शॉविनिस्ट !
अरे पहले बीमार मानसिकता को ठीक से समझ तो लो, फिर उसे ख़त्म करने के उपाय सोचो, करो।
उसे उधर से इधर, इधर से उधर शिफ्ट मत करते चले जाओ। कुछ नहीं निकलेगा। सिर्फ़ पाले बदल जाएंगे।

-संजय ग्रोवर

22 दिस॰ 2010

नामर्द और नाइंसान में कौन बेहतर !?

कई दिन से पढ़ रहा है सरल। डेढ़ साल से ज़्यादा हुआ, टी.वी. नहीं देखा। रिकॉर्डिंग मिल जाएगी यूट्यूब पर। देख सकता है। नेट की सुविधा तो है न उसके पास।
अपने शो में राखी ने किसी को नामर्द कह दिया। लक्ष्मण नाम बताते हैं उसका। लक्ष्मण ने आत्महत्या कर ली। क्या दोष था लक्ष्मण का ? और क्या दोष दें राखी को !
नामर्द कहलाने से पुरुष कितना डरता आया है, सरल से बेहतर कौन जानता है ?
वही संस्कार लक्ष्मण के और वही समझ राखी की।
भीड़ और हवा की ग़ुलामी।
कोई अपनी मर्ज़ी से लैंगिक विकलांग नहीं होता। कोई अपनी मर्ज़ी से दलित नहीं होता, स्त्री नहीं होता, पुरुष नहीं होता। तो अपनी मर्ज़ी से नामर्द क्यों होगा !?
शायद ऐसे भी उदाहरण रहे हों कि किसी औरत को ‘ठंडी’, ‘बांझ’, ‘फ्लैटचैस्टेड’(वक्ष विहीन) कहा गया हो और उसने आत्महत्या कर ली हो !
सच पूछो तो 15 से 45 का हो जाने के बाद भी सरल कभी समझ नहीं पाया कि कितना वह मर्द है और कितना नामर्द। एक क़िताब पढ़ता तो उसे लगता कि उससे बड़ा मर्द कोई नहीं दुनिया में। दूसरा लेख पड़ता तो शर्म आती कि वह तो पूरी तरह नामर्द है फिर भी ज़िंदा है।
क्या पैमाना है मर्दानगी का ? औरत की यौन-संतुष्टि !? किस हद तक ? कितनी औरतों की ? वो हरम, वो हज़ारों रानियां-पटरानियां ? किसने जाना होगा कि वहां कौन कितना संतुष्ट था !
फिर ठंडी औरतों का क्या करें ? उन्हें भी ख़ुदकुशी का रास्ता दिखाएं दोबारा ?
सरल तो पढ़ता आ रहा है कि ख़ुद औरतों ने भी अभी जानना शुरु किया है अपनी यौन-संतुष्टि के बारे में !
कितने ही मर्द थे जो तर्क देते थे कि हम वेश्याओं या दूसरी औरतों के पास इसलिए जाते हैं कि पत्नी से संतुष्टि नहीं होती।
क्या राखी हमें लौटाकर वहीं ले जाना चाहतीं हैं !?
क्या शादी से पहले लक्ष्मण ने अपनी होने वाली पत्नी को कोई वचन दिया था यौन-संतुष्टि का ? क्या ससुराल पक्ष ने इस विषय में कोई जानकारी मांगी थी ? क्या हमारे यहां शादियों से पहले ऐसा कुछ आवश्यक समझा गया है ?
राखी को जानना चाहिए कि हमारे यहां इस मुआमले में स्त्री जितनी मजबूर है, उतना ही पुरुष भी। बल्कि शादी न करने पर एक शक पुरुष पर यह भी किया जाता है कि कहीं वह नामर्द तो नहीं ! जिस तरह दहेज  और दूसरे रीति-रिवाजों पर स्त्री का कोई वश नहीं होता उसी तरह शादी के संदर्भ में अपनी मर्दानगी को जानने और बताने को लेकर पुरुष भी कुछ कम मजबूर नहीं होता।
नामर्दी या ‘नाऔरती’ एक व्यक्तिगत मामला है जबतक कि कोई पुरुष या स्त्री दूसरे पक्ष के साथ कोई ऐसा संबंध नहीं बनाता जिसमें यौन-संतुष्टि एक अनिवार्य पक्ष हो। शादी एक ऐसा ही संबंध है मगर अपने यहां शादियों में, विवाह से पहले, यौनसंबंधी तथ्यों के आदान-प्रदान का ऐसा कोई प्रचलन या रिवाज नहीं है इसलिए एक ही पक्ष को दोषी ठहरा देना उचित कैसे कहा जा सकता है !?
नामर्द, समाज का कुछ नहीं ले रहा होता, वह समाज को किसी तरह की हानि नहीं पहुंचा रहा होता। ठीक उसी तरह जैसे एक अविवाहित ‘ठंडी’, ‘बांझ’, वक्ष-विहीन, या स्त्री के लिए सौंदर्य और सेक्स के संदर्भ में तयशुदा मानदण्डों पर खरी न उतरने वाली औरत।
ऐसे ताने मत मारो राखी जिनकी वजह से अब तक ख़ुद औरत का सांस लेना मुश्किल बना हुआ था।
लक्ष्मणों को बख़्शो राखी।
हां, चाहो तो सरल को नामर्द कहो। वह ख़ुदकुशी नहीं करने वाला। आज इतना परिपक्व तो हो ही चुका है कि आपकी मानसिक अपरिपक्वता को समझ सके।

-संजय ग्रोवर

11 दिस॰ 2010

सारांश-2

रोहिनी आज-कल कुछ बदली-बदली लगती है। पूजा-पाठ के अलावा चैट भी करने लगी है। टी.वी. पर सीरियल देखती है। यहां तक कि कई बार जनचेतना जगाने वाली प्रगतिशील पत्रिकाओं के नेट-संस्करण भी पढ़ डालती है। देख रही है कि इंटरनेट एक नयी दुनिया बना रहा है। स्त्री तेज़ी से आज़ाद हो रही है। यहां तक कि हिंदी जैसी भाषा जिसमें प्रगतिशील भी न जाने किस मजबूरी में लिखते और फ़िल्में बनाते थे, अब ब्लॉगरों के ज़रिए एक नया आसमान खोलने को हाथ-पैर मार रही है।
कुल मिलाकर जो आसमान खुल रहा है उसमें सभी के लिए जगह है। स्त्रियां जींस के पॉकेटों में उंगलियां घुसाए-घुसाए जिगोलुओं और दलालों के साथ उड़ रहीं हैं और उड़ते-उड़ते ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे’ के करवाचौथी चांद में जा घुसतीं हैं। कुछ आयटम गल्र्स जिन पर बाबा नाराज़ हो जाते हैं, बाबा के आश्रम में जाकर उनका आर्शीवाद लेने का नया आयटम पेश करके बाबा को मना लेतीं हैं। सारी समस्याएं ख़त्म। आसमान फिर आसमान हो जाता है। दोनों ख़ुश होकर फिर से अपने-अपने कामों में लग जाते हैं। उन्हें किसी तरह आज़ाद होना है। धर्म के अंदर रहकर या धर्म के बाहर जाकर। राष्ट्र  के अंदर रहकर या राष्ट्र के बाहर जाकर। मर्द के साथ रहकर या उससे दूर रहकर। कोई आज़ादी है जो उन्हें चाहिए।
कहानियां आ रहीं हैं जिनमें स्त्रियां गुण्डों और विधायकों पर इसलिए आसक्त हो जातीं हैं कि वे उनके पतियों, भाईयों और पिताओं से ज़्यादा प्रैक्टीकल हैं और घर बैठे उनके काम करवा सकतें हैं।
रोहिनी का मन बदल रहा है।
वह हिम्मत बांधकर घर से निकलती है।
‘‘ऐक्सक्यूज़ मी‘’, आवाज़ को पतला करके वह घर के सामने घेरा बनाए, डेरा डाले, पैरों से टीन की छोटी डिब्बी को लुढ़का-लुढ़काकर खेल रहे गुण्डों के सरदार को संबोधित करती है।
‘जी मैम’, गुण्डा सर नवाकर कहता है।
दुनिया वाकई बदल रही है। रोहिनी के मन में आशाएं और तेज गति से दौड़ने लगतीं हैं। कितनी इज़्ज़त से बात कर रहा है।
‘‘देखिए, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप ही हमारी बेटी की हड्डियां कस्टम से निकलवां दें !?’’ रोहनी डरी हुई है पर बदलने की पूरी कोशिश कर रही है।
‘‘ इस दुनिया में क्या नहीं हो सकता मैम ! पर आप अस्थियों को हड्डियां न कहें।’’
‘‘ ओह !’’ वह एकदम से शर्मिंदा हो जाती है, ‘‘आप तो साहित्यकारों जैसी भाषा बोलते हैं’’, रोहिनी डरी हुई है और प्रभावित होना शुरु हो गयी है।
‘‘साधना पड़ता है, एकदम से तो कुछ होता नहीं’’ गुण्डा शिष्ट भाव से कहता है। लगता है उसने शिष्टता और विनम्रता दोनों को साध लिया है।
‘‘देखिए, मैं आपसे एक बात कहूं, मामला अब बेटी की अस्थियों का है, आप चाहें तो इसे स्त्री-मुक्ति के मसअलों से जोड़ा जा सकता है। तब बहुत-सी नारीवादी और मानवतावादी संस्थाएं भी हमारा साथ देंगीं‘‘
‘कितना टैक्टफुल गुण्डा है’ रोहिनी अब मुग्ध होने की अवस्था के काफ़ी नजदीक है। ‘ऐसा ख़्याल तो अनुपम और सोनी के दिमाग़ में भी नहीं आया।’
‘चलिए, अंदर बैठकर बात करतें हैं’, रोहिनी एक स्टेप और आगे बढ़कर गुण्डे को इनवाइट करती है।       
‘‘ओके! आप निश्चिंत होकर जाईए, वुई आर वेटिंग फॉर यू, वापस आकर बताईएगा क्या बना ?’’
गुण्डे के दोस्त कहते हैं।
‘सब कुछ कितना बदल गया है। ख़ामख्वाह डर रही थी।’ वह सोचती है।
गुण्डा न सिगरेट के छल्ले उड़ाता है न टेबल पर पांव पसारता है।
‘‘देखिए हम लोग भी कतई सोशल और दुनियादार लोग हैं। जिस टीन की डिब्बी को मैं ठोकर मार-मारकर खेल रहा था वह उस कंपनी की डिब्बी है जिसमें सिर से पैर तक सिर्फ़ महिलाएं काम करतीं हैं, हम भी वक्त की नज़ाकत समझते हैं।’’ गुण्डा दार्शनिक भाव से कहता है।
‘वाकई प्रतीकात्मकता कितनी बड़ी चीज़ है, असलियत तो उसके सामने कुछ भी नहीं’, रोहिनी सोच रही है।
तभी अनुपम आंखें मलते हुए ड्राइंग-रुम में प्रवेश करता है।
‘‘गुड मॉर्निंग अंकल’’, गुण्डा आदर-भाव से उठता है।
अनुपम को जैसे करंट लगता है, ‘‘तुम ! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अंदर घुसने की !?’’ अनुपम फैल जाता है।
‘‘बी प्रैक्टीकल अनुपम’’, रोहिनी संभालने की कोशिश करती है।
‘‘देखिए, मैंने पहले ही कहा था, अंकल तो न जाने किस दुनिया में रहते हैं, मैं चलता हूं।’ गुण्डा पांव ऐक्ज़िट की दिशा में घुमाता है।
‘‘नहीं, नहीं, आप बैठिए, ये जाएंगे तो मैं भी चली जाऊंगी, अनुपम !’’ रोहिनी निरंतर बोल्ड हो रही है।
‘‘रोहिनी, तुम्हे हुआ क्या है !?’’
‘‘नहीं, अब मैं और बर्दाश्त नहीं करुंगी।’’
‘‘बर्दाश्त ! रोहिनी, हम दोनों मिलकर इन गुण्डों से लड़ते आए हैं। बर्दाश्त तो तुम इसे कर रही हो घर बुलाकर।’’
‘‘अंकल आपकी तबियत ठीक नहीं। आप आराम कीजिए। मैम, कभी जिम-विम जाते हैं अंकल ? अंकल हर लड़ाई के लिए ख़ुदको अपडेट रखना पड़ता है। देखिए।’’, गुण्डा शर्ट खोलकर सिक्स-पैक-ऐब्स दिखाता है।
‘‘ओफ्फो, अब ये मुझे सिखाएगा कैसे लड़ना है !?’’ अनुपम अपना सर नोंचना चाहता है पर वहां बाल ही नहीं हैं। वह और चिढ़ जाता है।
‘‘देखिए अंकल, बिना मर्दानगी के औरतों की कोई लड़ाई नहीं जीती जा सकती!’’, गुण्डा समझाता है।
‘‘औरतों की लड़ाई !? यह कहां से घुस आयी बीच में ? और उसमें भी बार-बार मर्दानगी का वास्ता !? ओहो ये हरामज़ादा तो पागल कर देगा मुझे।’’ अनुपम गाली-गलौज़ पर उतर आता है।
‘‘देखिए अंकल, स्त्री के सामने अमर्यादित भाषा का प्रयोग! बुरी बात !’’ गुण्डा सधे स्वर में कहता है।
‘‘तुझे तो मैं अभी बताता हूं, कमीने।’’ अनुपम के धैर्य की पटरियां उखड़ चुकीं हैं।
‘‘ठीक ही तो कह रहा है वह, अंकल’’, एकाएक सोनी ड्राइंग-रुम में प्रवेश करती है।
‘‘सोनी, तुम भी!’’ अनुपम के चेहरे पर घबराहट ने डेरा डालना शुरु कर दिया है।
‘‘अंकल आपने मुझे भावनात्मक सहारा दिया होता तो आज ये दिन न देखने पड़ते।’’ 
‘‘ मैंने सहारा नहीं दिया ! तो ये गुण्डे क्यों घेरे खड़े हैं हमारे घर को !?’’
‘‘आप समझे नहीं अंकल ! चीनी कम देखी है आपने ? निशब्द ?’’
‘‘ओह, अच्छा ! सच कहूं बेटा, मेरा मतलब है सोनी, ख़्याल तो आया था ऐसा, मगर यही सोचकर डर गया कि तुम चढ़ दौड़ोगी कि गंजा, बुड्ढा ! मजबूरी का फ़ायदा उठाना चाहता है।’’
‘‘तो यह आपकी कमी है अंकल जो मुझे भुगतनी पड़ी।’’
‘‘मेरी कमी क्यों है ? मुझे क्या सपना आ रहा था तुम ऐसा चाहती हो !? तुम्ही कह देती !’’
‘‘मैं क्यों कह देती ? आपको नहीं थोड़ा सेंसटिव होना चाहिए, अपने-आप समझना चाहिए’’
‘‘मैं यह सब लटके-झटके नहीं जानता। पहले से कोई कैसे जान सकता है कि किसी बुज़ुर्ग के ऐसे प्रस्ताव पर लड़की ख़ुश होगी या चिढ़ जाएगी !?’’
‘‘तो सीखिए अंकल, ख़ुदको अपडेट कीजिए, वरना तो आप...’’
‘‘जाने दीजिए, अंकल की तबियत ठीक नहीं‘‘, गुण्डा अपनी विनम्रता के साथ फिर मुखर होता है।
‘‘ओह, इसको चुप कराओ नहीं तो मैं इसका मुंह नोंच लूंगा।’’ अनुपम को लगता है वह कुछ कर न बैठे। वह लगभग बेकाबू हो चुका है।
‘‘अनुपम! तुम्हारे बस का कुछ नहीं तो चुप तो बैठ सकते हो। या बाहर चले जाओ, और हमें संजीदगी से मामला डिसकस करने दो।’’ रोहिनी फिर से बोलती है।
‘‘मैं बाहर चला जाऊं ! मैं ? और तुम इस गुण्डे के साथ डिसकस करोगी !?’’ बदहवास अनुपम एक साइड स्टूल उठाता है और पूरी ताक़त और ग़ुस्से के साथ बाहर उछाल देता है।
‘‘लगता है इस आदमी को तो पागलखाने भेजना पड़ेगा,‘‘ यह रोहिनी है।
‘‘ठीक कह रहीं हैं आंटीं’’, यह सोनी है।
‘‘क्या आप इनकी कुछ व्यवस्था कर सकते हैं, काफ़ी समय से अत्याचारों पर उतरे हुए हैं।’’ गुण्डे से पूछते वक्त रोहिनी का स्वर भीगा हुआ है।
‘‘हां, आप आदेश तो दीजिए, पागलखाने फ़ोन करुं या थाने ?‘‘ गुण्डा अत्यंत सोफेस्टीकेटेडता से पूछता है।
अनुपम की आंखें बाहर निकलने को हैं। घबराहट, गुस्से और किए-धरे पर पानी फिर जाने की बेबसी ने उसे पगला दिया है। ‘‘यह तुम कर क्या रही हो रोहिनी !?’’, अनुपम ने रोहिनी का गला पकड़ लिया है।
‘‘ऐसे काम नहीं चलेगा,‘‘ गुण्डा उस दम पहली बार सीटी बजाता है। उसके सारे साथी तत्काल अंदर आ जाते हैं। ‘‘अंकल को कसकर पकड़ लो, औरत पर हाथ उठा रहे हैं।’’
‘‘तो नया क्या बॉस! आप और हम तो रोज़्...’’ गुण्डा सही जगह ख़ुदको रोक लेता है। बाहर निकल आ रहे शब्द बबलगम के फूले ग़ुब्बारे की तरह पलक झपकते वापस मुंह में घुस जाते हैं। उम्मीद पूरी बनती है कि कुछ ही दिन में यह गुण्डा भी भाषा और सामाजिकता को पूरी तरह साध लेगा।
‘‘बुलाईए आप पुलिस को, मैं अंकल के खि़लाफ़ गवाही दूंगी।’’, यह फिर से सोनी है।
‘‘मैं भी दूंगा। अंकल स्त्री-विरोधी हैं।’’गुण्डा ग्रेसफुल तरीके से कहता है, ‘‘पागलखाने, थाने और नारी-मुक्ति संस्थाओं को फोन लगाओ।’’
साथी गुण्डा इन सभी संस्थाओं के प्रतिनिधियों से अंग्रेजी में बात करता है।
‘‘अंकल, पहले भाग में आपकी इमेज काफ़ी अच्छी थी इसलिए हम आपको ऑप्शन देते हैं, थाने जाना पसंद करेंगे या पागलखाने ?’’ सर्द आवाज़ में गुण्डा पूछ रहा है ।
गुण्डों के मजबूत हाथों में छटपटा रहा अनुपम अपना सर पीटना चाहता है जो कि संभव नहीं है। ‘‘मुझे पागलखाने ही भेज दो,’’ वह थकी, हारी, मरी, लुटी, पिटी आवाज़ में कहता है और ढह जाता है।
‘‘पागलखाने से गाड़ी आ भी गई’’, देखिए किस तरह होते हैं अपने काम, मैम।’’ गुण्डा निहायत ही अदब के साथ घमंड व्यक्त करता है। रोहिनी आश्वस्त है।
अनुपम को गाड़ी में धकेला जा रहा है।
‘‘अपना ख़्याल रखना, टेक केयर, हां!’’, रोहिनी भावुक हो गयी है।
‘‘अब बस भी करो, अभी जी नहीं भरा क्या, और कितना पागल करोगी ?’’, अनुपम बकरे की तरह कसमसा रहा है।
‘‘अंकल में ज़रा भी मैनर्स नहीं, मैम तो बैस्ट विशेज़ दे रहीं हैं और अंकल...’’, सारे गुण्डे इस मुददे पर एकमत हैं।
गाड़ी स्टार्ट होती है।
‘‘च्चचच’’,
यह विष्णु है, अनुपम का दोस्त। भाभी के लिए फूल लेकर आया है।
बाहर हवा जिस तरफ़ बह रही है, सारे फूल-पत्ते-धूल-धक्कड़ और इंसान उसी दिशा में उड़ रहे हैं।
पड़ोसी जो गुण्डों के चलते रोहिनी से कटे-कटे रहते थे, अब गुण्डों के होते रोहिनी के साथ आ खड़े होते हैं।
रोहिनी और सोनी, गुण्डों के साथ मिलकर नारी-मुक्ति की लड़ाई को आगे बढ़ातीं हैं।
विष्णु आज-कल हर शाम गुण्डों के लिए फूल लाता है।

-संजय ग्रोवर