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15 अग॰ 2013

कौन है जो इस्तेमाल नहीं होता !



‘‘राखी बंधवा ले बेटा, बात माना करते हैं, देख बहिनों का कितना मन है, कितनी उदास हो रहीं हैं ; बंधवा ले बेटा।’’ मां कहती है।

सरल कसमसा रहा है भीतर ही भीतर मगर बोल कुछ भी नहीं पा रहा। वह समझ नहीं पा रहा कि जो कुलबुलाहट उसके भीतर है, वह सही है या ग़लत, कहे कि न कहे, जैसा वह महसूस करता है, ठीक वैसा ही कह भी पाएगा क्या ?

उसकी आंखों के सामने बार-बार वे कलाईयां आ जातीं हैं जिनमें राखियां बांधीं जानी हैं, वह ख़्यालों में भी नहीं देखना चाहता वे कलाईयां-वे पतली और सूखी कलाईयां जिन्हें देखकर ही उसे घबराहट होने लगती है। इन कलाईओं में कई-कई राखियां लटकेंगी, वह झल्लाता रहेगा, फ़िर आधेक घंटे बाद सबको उतार फ़ेकेगा। क्या इन कलाईयों से वह बहिनों की रक्षा करेगा! अपना तो कुछ कर नहीं पाता। कोई भी आता है, ग़ाली दे जाता है, कोई भी आता है, हंसी उड़ा जाता है, कोई भी आता है, सही साइड में साइकिल चलाते सरल को टक्कर मारकर गिराता है, साथ ही दो उपदेश भी सुना जाता है। घृणा और ग़ुस्से से भर जाता है सरल, मगर मुंह से बोल नहीं फूटता।

‘बंधवा ले बेटा, देख बहन ख़ुश हो जाएगी।’

सरल जैसे-तैसे संभालता है ख़ुदको, संभालते-संभालते फट पड़े तो भी कुछ पता नहीं।

‘क्या मेरी ख़ुशी का कोई मतलब नहीं, मुझे राखी बंधवाने से कोई ख़ुशी मिलती है या नहीं, यह जानने की कोशिश कोई क्यों नहीं करता ? मैं क्या कोई खंबा हूं जिसपर आप कुछ भी बांधकर चले जाएंगे? आखि़र ये लोग कभी सोचते क्यों नहीं ?

किसी साल बंधवा लेता है तो कोई साल यूं ही गुज़र जाता है। नहीं बंधवाता तो बहिनों और रिश्तेदारों को उदास और नाराज़ करने के अपराधबोध में जीता है, परंपरा तोड़ने के अपराधबोध में जीता है। बंधवाता है तो बंधवाने के एवज में उनके लिए कर क्या पाएगा के अपराधबोध और हीनभावना के साथ जीता है।

उसे क्या मालूम कि दुनिया एक-दूसरे को इस्तेमाल करने से चलती है। बाद में कभी उसे समझ में आएगा कि यहां तो लोग मोहरों और कठपुतलियों की तरह ही जी रहे हैं। कुछ ताक़तवरों के मोहरे बन गए हैं तो कुछ अपने ही जैसे आदमी की बनाई मान्यताओं और धारणाओं के ग़ुलाम हैं। ग़ुलामी भी इतनी गहरी कि आम आदमी तो क्या बड़े-बड़े लेखक-चिंतक भी इसे ही आज़ादी समझते नज़र आते हैं।

‘‘लड़की के भाई को बुलाओ।’’

जब भी किसी बहिन की शादी होती है, रस्मों-रिवाजों के बीच पंडित का फ़रमान आता है। वह इससे बचने की कोशिश करता है, मगर कब तक बचेगा। कोई न कोई ढूंढ निकालता है। वह थोड़ी-बहुत रसमों में हिस्सा लेता है, हंसी-मज़ाक़ करके किसी तरह उस भीड़ का हिस्सा बनने की कोशिश करता है। हांलांकि भरी भीड़ में अपने-आपको सामने ले आना फिर हंसी-मज़ाक भी कर लेना, यह उसके लिए कुछ आसान काम नहीं है।

‘कन्या का भाई कन्या के साथ पीछे-पीछे चलेगा’, पंडित कहता है। फेरे शुरु हो गए हैं। सरल अब बिदक जाता है।

‘कन्या का भाई’
‘कन्या का भाई’
‘कन्या का भाई’
‘कन्या का भाई’

क्या उसके होने का कुछ भी मतलब नहीं है ? क्यों नहीं उससे कोई पूछता कि तुम्हे ये रीति-रिवाज पसंद हैं या नहीं !! तुम इनमें शामिल होना चाहते हो या नहीं !? ये कैसी दुनिया है!? कैसे लोग हैं !?

‘‘मैं नहीं चलूंगा।’’

धीरे से ही सही, मगर वह बोलता है। जैसे-तैसे बोलता है। और क़रीबी लोग जानते हैं कि अब सरल को चलाने का एक ही तरीक़ा है कि इसको ज़बरदस्ती उठाकर चलाया जाए। बोलेगा नहीं मगर शरीर को अकड़ा लेगा और न चलने की पूरी कोशिश करेगा। हास्यास्पद दृश्य हो जाएगा।

दूसरे किसी भाई का इंतज़ाम किया जाता है।

अब वह कई दिन अपराधबोध में जिएगा।

लेकिन वह भी क्या करे ! कितनी चीज़ें हैं जो होतीं हैं, कुछ तो आए दिन होतीं हैं, कई बार वह भी करता है ; मगर उनका औचित्य उसे समझ में नहीं आता, उनमें कोई ख़ुशी उसे नहीं मिलती।

लड़कीवालों का दास भाव उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता। उसे ख़ुद भी इसका हिस्सा बनना पड़े तो और ज़्यादा तक़लीफ़ होती है। लड़केवाले जब-जब भी बहिनों को देखने आते हैं, उसकी मुसीबत हो जाती है। वह बचना चाहता है मगर.....

‘लड़की का भाई’
‘लड़की का भाई’
‘लड़की का भाई’
‘लड़की का भाई’

वे सब एक बार लड़की के भाई को देखना चाहते हैं। लड़की को पता नहीं उस वक्त कैसा महसूस होता है, मगर सरल को बिलकुल अच्छा नहीं लगता। वह क्या कोई वस्तु है !? लड़की के भाई का क्या करना है तुम्हे!? उसे क्यों अनचाहे ही इस अजीबो-ग़रीब सरकस का हिस्सा बनना पड़ता है बार-बार !? लड़की उसने पैदा भी नहीं की, न उससे पूछकर पैदा की गई है, न समाज की रसमें उसने बनाई, न उसकी ऐसी कभी इच्छा रही कि वह भी कभी ऐसे रीति-रिवाजों के दुष्चक्र में फंसे किन्हीं मजबूरों की मजबूरी का फ़ायदा उठाएगा ; फ़िर क्यों उसे जबरन इन जंजालों में घसीटा जाता है !?

15-08-2013

इन सब लोगों के लिए जैसे फूल है, जैसे माला है, जैसे मंडप है, जैसे कुर्सियां हैं, जैसे हवन-सामग्री है वैसे ही लड़की का भाई है। माला को किसीके गले में भी डाल दो, डल जाएगी, इनकार नहीं करेगी ; कुर्सी उठाकर कहीं भी रखदो, किसीको भी उसपर बिठा दो, मना नहीं करेगी ; मोमबत्ती को घिसकर कहीं भी चिपका दो, जला दो, पिघल जाने तक वहीं खड़ी फड़फड़ाएगी। ऐसे ही लड़की का भाई है।

कितने लोग आए हैं इस समारोह में। अलग़-अलग़ शक्लें, अलग़-अलग़ कपड़े, अलग़-अलग़ पेशे, अलग़-अलग़ ओहदे..........सब हंस रहें हैं, भाग-दौड़ कर रहे हैं, जो बता दिया गया, कर रहे हैं, इनमें लड़केवाले भी हैं, लड़कीवाले भी हैं...........मगर क्या वाक़ई इनमें कुछ फ़र्क है !? क्या इनमें एक भी आदमी ऐसा होगा जो सरल को समझ पाएगा ? सरल जानता है, कोई कहेगा कि ये तो है ही बिगड़ा हुआ, कोई कहेगा अकेला लड़का है, आदतें ख़राब हो ही जातीं हैं, कोई कहेगा, कोई ख़ास बात नहीं, शर्मीला ज़्यादा है.........मगर इनमें शायद एक भी आदमी ऐसा नहीं होगा जिसकी कल्पना में भी यह आ जाए कि यहां एक आदमी ऐसा भी है जिसकी इस सबमें कोई रुचि नहीं है, जो असहमत है, जो उलझन में है, परेशानी में है, खींचतान में है.........

ये तो सब हंस रहे हैं, ठहाके भी लगा रहे हैं........और गंभीर भी हैं। एक बड़ा काम निपट गया। एक आदमी का एक और बोझ सर से उतर गया। उसमें इन्होंने भी सहयोग किया, किसीने काम कराया, किसीने पैसे दिए, लिफ़ाफ़े दिए, किसीने रिश्ता कराया....

लेकिन....वह सोचता है.....इसे बोझ बनाया किसने !? बोझ बनाए रखना कौन चाहता है !? यही लोग। जो बता दिया गया, जो सिखा दिया गया, वही सब करते चले जाने के अभ्यस्त लोग।

आज सोचता है सरल.....ये डरे हुए लोग हैं, एक-दूसरे से भी बुरी तरह डरे हुए लोग......अकेले में भी कोई अलग़, कोई नया ख़्याल मन में आ जाता होगा तो घबरा जाते होंगे, वह ख़्याल किसी तरह चला जाए, मिट जाए ; इसकी कोशिश करते होंगे, गाने चला देते होंगे, टहलने निकल जाते होंगे, कसरत करने लगते होंगे......और सरल भी तो यही करता रहा एक वक्त तक......लेकिन अब वह जानता है कि अपने-आपसे, नये या अलग़ तरह के ख़्यालों से इस तरह भागोगे तो फिर बदलाव का रास्ता किधर से निकलेगा, प्रगतिशीलता क्या कोई पेड़ पर उगनेवाली चीज़ है......

.....और वह देखता है कि लोग बदलते भी नहीं, बदले हुए दिखते ज़रुर हैं। कल हवा जिधर को चल रही थी वे भी उधर चल रहे थे, आज हवा बदली वे भी ‘बदल’ गए। कल लड्डू और हलवे को पकड़कर बैठे थे, उसके बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता था। आज केक को पकड़ लिया। अब केक वक्त पर न आए तो बर्थडे मनानेवाले बर्थडे सेलिब्रेट हुआ ही नहीं मान पाते।

वैसे छोड़ा अभी हलवे को भी नहीं है। सामनेवाले हाथ में केक है, हलवा पीछेवाले हाथ में चला गया है। क्या मालूम कब हलवे की हवा फ़िर चल निकले। तो क्या फ़र्क पड़ता है। फ़िर ‘बदल’ जाएंगे ; सामनेवाले हाथ को पीछे ले जाएंगे, पीछेवाले को आगे ले आएंगे।

इसे प्रगतिशीलता कहें कि पैंतरेबाज़ी !?

मूल मानसिकता वही है।

पकड़कर बैठ जाने की मानसिकता।

(जारी)

16-08-2013


17 फ़र॰ 2013

मिनी स्कर्ट और करवा चौथ


‘मेरे ख़्वाबों में जो आए.....’


फ़िल्म समझ में नहीं आई सरल को। करवा-चौथ देखकर तो मन बिलकुल ही उचाट हो गया था। लेकिन गाना जब भी देखता, अच्छा लगता। यह कोई-पूछने बताने की बात नहीं लगती सरल को कि गाना किस भाव से/किस मक़सद से फ़िल्माया गया होगा।
उसी भाव से देखता भी रहा सरल। मगर तौलिया....मिनी स्कर्ट...दोस्त जैसी मां...अनजाने से प्यार...मां-बाप की अनुमति.....परंपरा.....अंततः करवा-चौथ......

यूं सरल ऐसा नहीं मानता कि स्कर्ट पहनने वाली महिला आधुनिक या हर हाल में तार्किक होगी ही होगी......
लड़के या मर्द तो कबसे नेकर पहन रहे हैं...सब आधुनिक तो नहीं हो सके....

हां, कपड़े अगर अपनी समझ और तर्क से आएं बदन पर तो शायद इनका थोड़ा-बहुत संबंध आधुनिकता से हो सकता है। प्रतिक्रिया आवश्यक रुप से प्रगतिशीलता नहीं हो सकती। हालिया गैंग-रेप के कुछ ही दिन बाद शायद फ़ेसबुक पर ही पढ़ा कि यूपी में कहीं स्त्रियों ने कोई गैंग बनाया है, वे पुरुषों को देखकर मुस्कुरातीं हैं और जब वह पुरुष पास आता है तो पिटाई कर देतीं हैं। हवा चली हो तो ऐसे स्टेटस पर लाइक, सुपरलाइक, सलाम, कमाल...का ढेर लग जाता है। पता नहीं यह ख़बर कितना सच थी मगर मैं सोच रहा था कि कितनी अजीब बात है कि पुरुष अगर बेवजह किसी लड़की को देखकर मुस्कुराएगा तब भी वह पिटेगा और स्त्री मुस्कुराएगी तब भी वह पिटेगा। ग़ज़ब फ़िलॉस्फ़ी है, अजब मानने वाले हैं। मगर हवा चली हो, भीड़ का साथ हो तो अंट-संट सब चलता है। और सलाम-सलाम, जय-जयकार सब मिलता है। मगर इस तरह की तार्किकता और सोच को प्रोत्साहन दिया जाएगा तो कलको हमें लौटकर फिर यह भी मानना पड़ेगा कि लक्षमन ने सूपर्णखां की नाक काटकर ठीक ही किया था।

अभी एक दिन किसी चैनल पर अपनी पसंदीदा फ़िल्म ‘बैंडिट क्वीन’ देखने को मिल गयी। उसके ठीक बाद तब्बू वाली ‘अस्तित्व’ शुरु हो गयी। वह भी दोबारा देख डाली। इस बार एक चीज़ अजीब लगी। पति की अनुपस्थिति में तब्बू और मोहनीश बहल का जो संबंध स्थापित होता है उसमें दोनों की बराबर की सहमति है। मगर बच्चा देखने आए मोहनीश बहल को तब्बू जिस क्रूरता से अपनी ज़िंदग़ी से निकाल फ़ेंकती है वह कहीं से भी न तो मानवीय लगता है न तार्किक। उसके पीछे जो तर्क वह देती है वह और भी बेहूदा और लचर है। वह देवी-देवताओं के ज़मानेवाला पाखण्डी और बेईमान तर्क है कि मैं शरीर से तुम्हारे साथ थी मगर मेरी कल्पना में मेरे पति का ही चेहरा था.....वगैरह। ऐसा ही था कुछ। पूछो, थोड़ी देर को इस थोथे और अविश्वसनीय तर्क को मान भी लिया जाय तो दूसरे आदमी का इस बात से क्या लेना कि क्या करते समय तुम्हारे ज़हन में किसका चेहरा था!? अभी मैं किसीको अपनी कार तले कुचल दूं फ़िर उसके घरवालों से कहूं कि यार जाओ, छोड़ो, उसे कुचलते समय मेरी कल्पना में एक बलात्कारी देवता का चेहरा था!

चलेगा, यहां ऐसे ही चलता है। जब भी ऐसी घटनाएं होतीं हैं, हवाओं में शोर भर जाता है कि एक-एक लड़के को बचपन से स्त्रियों का सम्मान करना सिखाना चाहिए।  अतिरेक, अतिश्योक्ति और बनावटीपन को पुनःस्थापित करने की चाहत से भरी यह मांग उसी भावुक भारतीय संस्कृति का हिस्सा है जिससे बीमारियां पैदा होती हैं। बच्चे को सिखाना यह चाहिए कि हर अच्छे इंसान का आदर करो, स्त्री हो, पुरुष हो, उभयलिंगी/लैंगिक विकलांग हो, कोई हो। किसीमें भेद मत करो, सब इंसान एक जैसे हैं। यह कतई अव्यवहारिक सोच है कि सभी स्त्रियों का सम्मान करो। इससे फिर झूठी संस्कृति पैदा होगी। न कोई सब मर्दों का सम्मान कर सकता है न कभी सब स्त्रियों का कर पाएगा। जलनेवाली बहू और जलानेवाली सास का एक साथ सम्मान कैसे संभव है? ससुर के मुंह पर थूकनेवाले दामाद और ससुर का एक साथ सम्मान संभव नहीं है। नमस्ते, हाय, हलो यानि रोज़ाना का अभिवादन अलग़ बात है, सम्मान दिल और दिमाग़ की गहराई से उठनेवाला भाव है। अगर लड़कों से ज़बरदस्ती सभी स्त्रियों का सम्मान कराया जाएगा तो उन्हें पाखण्ड ही करना पड़ेगा जैसा अब तक स्त्रियों को करना पड़ता था। इधर की बीमारी उधर शिफ्ट हो जाएगी।

‘होना/सोना किसी ख़ूबसूरत दुश्मन के साथ’ प्रसंग की तरह लेख का ग़लत पाठ करके बहसों को भटकानेवाले षड्यंत्रकारी और कमसमझ लोगों को यह भी बता दूं कि किसीका सम्मान न करने का मतलब यह नहीं होता कि उसका अपमान किया जा रहा है।

इस तरह मजबूरी के सम्मान के बाद दिल में रह गयी ख़लिश की किरचें बाद में परेशान करतीं हैं, चैनो-सुक़ून छीन लेतीं हैं।

‘‘जब भी मुझे ज़रुरत होगी आप आ जाया करोगे?’’

जवाब न देने से कैसी छटपटाहट बची रह गयी! उसी वक्त कह देना था, अच्छा मुझे क्या सिर्फ़ शरीर समझा है!? यही बात मैंने कह दी होती तो मेल शॉविनिस्ट और न जाने क्या-क्या उपाधियां मिल गयी होतीं। और कड़कड़ाती ठंड में रात बारह बजे फ़ोन-सेक्स की मांग, सामने कमरे में मां बीमार पड़ी है। ऊपर से हुक्म कि तो क्या हुआ, दरवाज़ा खोलकर घर से बाहर भी तो आया जा सकता है।

कमाल है! कौन है यह? जो समझा था उसका तो कोई चिन्ह कहीं दिखाई देता नहीं! निन्यानवें प्रतिशत हरकतें तो शातिर मर्दों वाली ही हैं। इन्होंने क्या किसीको आज़ादी दिलानी है! इनकी सोच और हरकतें तो बिलकुल उनके जैसी ही हैं जिनसे इन्हें आज़ादी चाहिए।

पर क्या करें, कोई देश, कोई समाज जिस संस्कृति की वजह से Qतियों की जन्नत बन गया हो, उसीपर वार करने के अलावा हर चीज़ पर वार किया जा रहा हो। पाखण्डी संस्कृति के जाल में कसमसाते-छटपटाते समाज में पाखण्डी और Qतियों (वे मेल हों कि फ़ीमेल हों कि बेमेल हों) की मौज ही मौज ही मौज होती है। मौक़ापरस्त हर जगह अपने लिए ऐशो-इशरत का रास्ता खोज लेता है। एक ठग संस्कृति में, जहां हर जगह शीर्ष पर ठग ही ठग बैठे हों, पके-पकाए ठग पहले कपोल-कल्पित कहानियों के ज़रिए समाज को ठगते हैं, फ़िर उन ठगियों से पीछा छुड़ाने के नाम पर भी उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी ही ठगते हैं।

इस ठग-संस्कृति से छुटकारा पाने के अलावा और कोई रास्ता हो सकता है क्या?

जैसे पेट में पथरी के टुकड़े परेशान करते हैं वैसे ही पाखण्डी संस्कृति से उपजे आचरण के बाद ज़हनो-दिल में जाने कितने टुकड़े बचे रह जाते हैं, कुछ अपने कुछ दूसरों के....

पहले जो मर्दो ने मेरे साथ किया अब मैं उनके साथ करुंगी.....

सोचने की बात है, जो कर गए उनके तो मज़े ही मज़े हैं, उनका तो बाल बांका नहीं होगा, भुगतेगा आनेवाला, जो हुआ था उससे कोई लेना-देना भी नहीं है उसका। वह मुफ्त में सूली चढ़ जाएगा।
मगर हवा जो चली है। उसमें यही होता है।

इधर विरोध चलता है एक संपादक का कि स्त्री-विमर्श को देह-विमर्श बना दिया। साथ ही यह भी चलता है कि मैं कितनी भी छोटी स्कर्ट पहनूं, किसीको क्या? दूसरा जुमला सुनाई पड़ता है मैं एक साथ आठ के साथ संबंध रखूं तो तुम्हे क्या? तो यही तो संपादक जी कह रहे थे! थोड़ी-सी अक्ल हो तो समझा जा सकता है कि खेल संपादक जी को बदनाम करके उनके मुद्दे ख़ुद हथिया लेने का रहा। संपादक जी हिम्मतवाले थे, साफ़ शब्दों में कह रहे थे। हथियानेवाले अधकचरे ढंग से ही कहेंगे। शुक्र है कहीं कोई यह नहीं कह रहा कि देखो कितना बदलाव आ गया। देखो छोटे डब्बे पर ब्रहममहूर्त्त में एक लड़की मिनी स्कर्ट पहनकर सती होगी। हर चैनल पर ‘लाइव’ ज़िंदा जलेगी।

ऐसे अधकचरे माहौल में स्कर्ट के साथ करवाचौथ अगर बिलकुल भी परेशान नहीं करता तो बहुत हैरानी की बात नहीं है।

-संजय ग्रोवर