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22 दिस॰ 2019

समाज और न्याय की समझ

हमारे घर की बिजली अकसर ख़राब हो जाती थी।

कई बार तो एक-एक हफ़्ते ख़राब रहती थी।


जबकि पड़ोस के बाक़ी घरों की बिजली आ रही होती थी।


उसका कारण था। 


हमारे पिताजी के संबंध और आना-जाना वैसे तो बहुत लोगों से था मगर न तो किसी दबंग और बदमाश सेे संबंध रखते थे न ख़ुद बदमाशी करते थे और न किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्त्ता थे।


हां, जब दुकान से फ़ुरसत मिलती, तो वे बिजलीवालों से कुछ अनुनय-विनय करके, कुछ पैसे-वैसे देकर बिजली ठीक करवा लेते थे।


मैं इतना भी नहीं करता था।


कई लोग समझते थे कि मैं शरमीला, अव्यवहारिक और भौंदू क़िस्म का आदमी हूं।


और भीड़ और प्रचलित मान्यताओं के प्रभाव और दबाव में मैं भी ख़ुदको ऐसा ही समझ लेता था।


लेकिन सिर्फ़ यही बात नहीं थी।


असल में मैं भीतर से बहुत विद्रोही था और अपना काम करवाने के समाज के इन घटिया और गंदे तरीक़ों से बहुत नफ़रत करता था।

उस समय ज़्यादातर दबंग, बदमाश, रईस आदि एक ही पार्टी का समर्थन करते थे।


जैसे अब एक दूसरी पार्टी का करते हैं।

17 फ़र॰ 2013

मिनी स्कर्ट और करवा चौथ


‘मेरे ख़्वाबों में जो आए.....’


फ़िल्म समझ में नहीं आई सरल को। करवा-चौथ देखकर तो मन बिलकुल ही उचाट हो गया था। लेकिन गाना जब भी देखता, अच्छा लगता। यह कोई-पूछने बताने की बात नहीं लगती सरल को कि गाना किस भाव से/किस मक़सद से फ़िल्माया गया होगा।
उसी भाव से देखता भी रहा सरल। मगर तौलिया....मिनी स्कर्ट...दोस्त जैसी मां...अनजाने से प्यार...मां-बाप की अनुमति.....परंपरा.....अंततः करवा-चौथ......

यूं सरल ऐसा नहीं मानता कि स्कर्ट पहनने वाली महिला आधुनिक या हर हाल में तार्किक होगी ही होगी......
लड़के या मर्द तो कबसे नेकर पहन रहे हैं...सब आधुनिक तो नहीं हो सके....

हां, कपड़े अगर अपनी समझ और तर्क से आएं बदन पर तो शायद इनका थोड़ा-बहुत संबंध आधुनिकता से हो सकता है। प्रतिक्रिया आवश्यक रुप से प्रगतिशीलता नहीं हो सकती। हालिया गैंग-रेप के कुछ ही दिन बाद शायद फ़ेसबुक पर ही पढ़ा कि यूपी में कहीं स्त्रियों ने कोई गैंग बनाया है, वे पुरुषों को देखकर मुस्कुरातीं हैं और जब वह पुरुष पास आता है तो पिटाई कर देतीं हैं। हवा चली हो तो ऐसे स्टेटस पर लाइक, सुपरलाइक, सलाम, कमाल...का ढेर लग जाता है। पता नहीं यह ख़बर कितना सच थी मगर मैं सोच रहा था कि कितनी अजीब बात है कि पुरुष अगर बेवजह किसी लड़की को देखकर मुस्कुराएगा तब भी वह पिटेगा और स्त्री मुस्कुराएगी तब भी वह पिटेगा। ग़ज़ब फ़िलॉस्फ़ी है, अजब मानने वाले हैं। मगर हवा चली हो, भीड़ का साथ हो तो अंट-संट सब चलता है। और सलाम-सलाम, जय-जयकार सब मिलता है। मगर इस तरह की तार्किकता और सोच को प्रोत्साहन दिया जाएगा तो कलको हमें लौटकर फिर यह भी मानना पड़ेगा कि लक्षमन ने सूपर्णखां की नाक काटकर ठीक ही किया था।

अभी एक दिन किसी चैनल पर अपनी पसंदीदा फ़िल्म ‘बैंडिट क्वीन’ देखने को मिल गयी। उसके ठीक बाद तब्बू वाली ‘अस्तित्व’ शुरु हो गयी। वह भी दोबारा देख डाली। इस बार एक चीज़ अजीब लगी। पति की अनुपस्थिति में तब्बू और मोहनीश बहल का जो संबंध स्थापित होता है उसमें दोनों की बराबर की सहमति है। मगर बच्चा देखने आए मोहनीश बहल को तब्बू जिस क्रूरता से अपनी ज़िंदग़ी से निकाल फ़ेंकती है वह कहीं से भी न तो मानवीय लगता है न तार्किक। उसके पीछे जो तर्क वह देती है वह और भी बेहूदा और लचर है। वह देवी-देवताओं के ज़मानेवाला पाखण्डी और बेईमान तर्क है कि मैं शरीर से तुम्हारे साथ थी मगर मेरी कल्पना में मेरे पति का ही चेहरा था.....वगैरह। ऐसा ही था कुछ। पूछो, थोड़ी देर को इस थोथे और अविश्वसनीय तर्क को मान भी लिया जाय तो दूसरे आदमी का इस बात से क्या लेना कि क्या करते समय तुम्हारे ज़हन में किसका चेहरा था!? अभी मैं किसीको अपनी कार तले कुचल दूं फ़िर उसके घरवालों से कहूं कि यार जाओ, छोड़ो, उसे कुचलते समय मेरी कल्पना में एक बलात्कारी देवता का चेहरा था!

चलेगा, यहां ऐसे ही चलता है। जब भी ऐसी घटनाएं होतीं हैं, हवाओं में शोर भर जाता है कि एक-एक लड़के को बचपन से स्त्रियों का सम्मान करना सिखाना चाहिए।  अतिरेक, अतिश्योक्ति और बनावटीपन को पुनःस्थापित करने की चाहत से भरी यह मांग उसी भावुक भारतीय संस्कृति का हिस्सा है जिससे बीमारियां पैदा होती हैं। बच्चे को सिखाना यह चाहिए कि हर अच्छे इंसान का आदर करो, स्त्री हो, पुरुष हो, उभयलिंगी/लैंगिक विकलांग हो, कोई हो। किसीमें भेद मत करो, सब इंसान एक जैसे हैं। यह कतई अव्यवहारिक सोच है कि सभी स्त्रियों का सम्मान करो। इससे फिर झूठी संस्कृति पैदा होगी। न कोई सब मर्दों का सम्मान कर सकता है न कभी सब स्त्रियों का कर पाएगा। जलनेवाली बहू और जलानेवाली सास का एक साथ सम्मान कैसे संभव है? ससुर के मुंह पर थूकनेवाले दामाद और ससुर का एक साथ सम्मान संभव नहीं है। नमस्ते, हाय, हलो यानि रोज़ाना का अभिवादन अलग़ बात है, सम्मान दिल और दिमाग़ की गहराई से उठनेवाला भाव है। अगर लड़कों से ज़बरदस्ती सभी स्त्रियों का सम्मान कराया जाएगा तो उन्हें पाखण्ड ही करना पड़ेगा जैसा अब तक स्त्रियों को करना पड़ता था। इधर की बीमारी उधर शिफ्ट हो जाएगी।

‘होना/सोना किसी ख़ूबसूरत दुश्मन के साथ’ प्रसंग की तरह लेख का ग़लत पाठ करके बहसों को भटकानेवाले षड्यंत्रकारी और कमसमझ लोगों को यह भी बता दूं कि किसीका सम्मान न करने का मतलब यह नहीं होता कि उसका अपमान किया जा रहा है।

इस तरह मजबूरी के सम्मान के बाद दिल में रह गयी ख़लिश की किरचें बाद में परेशान करतीं हैं, चैनो-सुक़ून छीन लेतीं हैं।

‘‘जब भी मुझे ज़रुरत होगी आप आ जाया करोगे?’’

जवाब न देने से कैसी छटपटाहट बची रह गयी! उसी वक्त कह देना था, अच्छा मुझे क्या सिर्फ़ शरीर समझा है!? यही बात मैंने कह दी होती तो मेल शॉविनिस्ट और न जाने क्या-क्या उपाधियां मिल गयी होतीं। और कड़कड़ाती ठंड में रात बारह बजे फ़ोन-सेक्स की मांग, सामने कमरे में मां बीमार पड़ी है। ऊपर से हुक्म कि तो क्या हुआ, दरवाज़ा खोलकर घर से बाहर भी तो आया जा सकता है।

कमाल है! कौन है यह? जो समझा था उसका तो कोई चिन्ह कहीं दिखाई देता नहीं! निन्यानवें प्रतिशत हरकतें तो शातिर मर्दों वाली ही हैं। इन्होंने क्या किसीको आज़ादी दिलानी है! इनकी सोच और हरकतें तो बिलकुल उनके जैसी ही हैं जिनसे इन्हें आज़ादी चाहिए।

पर क्या करें, कोई देश, कोई समाज जिस संस्कृति की वजह से Qतियों की जन्नत बन गया हो, उसीपर वार करने के अलावा हर चीज़ पर वार किया जा रहा हो। पाखण्डी संस्कृति के जाल में कसमसाते-छटपटाते समाज में पाखण्डी और Qतियों (वे मेल हों कि फ़ीमेल हों कि बेमेल हों) की मौज ही मौज ही मौज होती है। मौक़ापरस्त हर जगह अपने लिए ऐशो-इशरत का रास्ता खोज लेता है। एक ठग संस्कृति में, जहां हर जगह शीर्ष पर ठग ही ठग बैठे हों, पके-पकाए ठग पहले कपोल-कल्पित कहानियों के ज़रिए समाज को ठगते हैं, फ़िर उन ठगियों से पीछा छुड़ाने के नाम पर भी उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी ही ठगते हैं।

इस ठग-संस्कृति से छुटकारा पाने के अलावा और कोई रास्ता हो सकता है क्या?

जैसे पेट में पथरी के टुकड़े परेशान करते हैं वैसे ही पाखण्डी संस्कृति से उपजे आचरण के बाद ज़हनो-दिल में जाने कितने टुकड़े बचे रह जाते हैं, कुछ अपने कुछ दूसरों के....

पहले जो मर्दो ने मेरे साथ किया अब मैं उनके साथ करुंगी.....

सोचने की बात है, जो कर गए उनके तो मज़े ही मज़े हैं, उनका तो बाल बांका नहीं होगा, भुगतेगा आनेवाला, जो हुआ था उससे कोई लेना-देना भी नहीं है उसका। वह मुफ्त में सूली चढ़ जाएगा।
मगर हवा जो चली है। उसमें यही होता है।

इधर विरोध चलता है एक संपादक का कि स्त्री-विमर्श को देह-विमर्श बना दिया। साथ ही यह भी चलता है कि मैं कितनी भी छोटी स्कर्ट पहनूं, किसीको क्या? दूसरा जुमला सुनाई पड़ता है मैं एक साथ आठ के साथ संबंध रखूं तो तुम्हे क्या? तो यही तो संपादक जी कह रहे थे! थोड़ी-सी अक्ल हो तो समझा जा सकता है कि खेल संपादक जी को बदनाम करके उनके मुद्दे ख़ुद हथिया लेने का रहा। संपादक जी हिम्मतवाले थे, साफ़ शब्दों में कह रहे थे। हथियानेवाले अधकचरे ढंग से ही कहेंगे। शुक्र है कहीं कोई यह नहीं कह रहा कि देखो कितना बदलाव आ गया। देखो छोटे डब्बे पर ब्रहममहूर्त्त में एक लड़की मिनी स्कर्ट पहनकर सती होगी। हर चैनल पर ‘लाइव’ ज़िंदा जलेगी।

ऐसे अधकचरे माहौल में स्कर्ट के साथ करवाचौथ अगर बिलकुल भी परेशान नहीं करता तो बहुत हैरानी की बात नहीं है।

-संजय ग्रोवर