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3 फ़र॰ 2013

प्रसिद्ध व्यक्ति से एक अनपेक्षित बातचीत




‘हलो! आगे कहां निकले जा रहे हो?’
‘कमाल है! जहां मुझे जाना था वहीं जा रहा हूं।’
‘हाथ क्यों हिलाया था मुझे देखकर ?’
‘किसने हिलाया? चलते वक्त मेरा सारा ध्यान तो अपने शरीर का संतुलन बनाने में ही लगा रहता है! आपको ग़लतफ़हमी हुई है ; मच्छर-वच्छर उड़ाया होगा या अपने बाल ठीक कर रहा होऊंगा।’
‘आपने पहचाना नहीं मुझे!?’
‘पहचानने की बात ही कहां से आई!?’
‘अरे भाई! मशहूर आदमी हूं, हर कोई जानता है।’
‘मैं नहीं जानता।’
‘ओह! चलिए एक-एक कप चाय हो जाए।’
‘देखिए, मुझे दूसरे काम हैं। और साफ़ बता दूं कि चाय पीकर मैं आपकी तारीफ़ करुं, ज़रुरी नहीं....
‘अरे आप बैठिए तो! देखिए सभी लोग मेरी तरफ़ देख रहे हैं।’
‘.............................’
‘वह देखिए, वेटर सारी टेबल छोड़कर हमारी तरफ़ आ रहा है।’
‘ग़लत बात है। जो लोग पहले आए हैं उन्हें पहले अटैंड करना चाहिए।’
‘आप प्रसिद्धि से प्रभावित नहीं होते!?’
‘कितने प्रसिद्ध हैं आप? कितने लोग जानते हैं आपको?’
‘हुम.....।  मुश्क़िल सवाल है.....किसी भी हाल में पचास हज़ार से कम तो नहीं जानते होंगे।’
‘कहां से आया ये आंकड़ा आपके पास? प्रामाणिकता क्या है?’
‘........बस, अंदाज़न......
‘मेरे चाचा एक लाख प्रशंसकों वाले आदमी को प्रसिद्ध मानते हैं।’
‘उनकी कसौटी पर भी मैं पचास प्रतिशत सफ़ल तो हूं ही।’
‘मेरे मामा दो लाख वाले को प्रसिद्ध मानते हैं, उनके हिसाब से आप पच्चीस प्रतिशत हैं। मेरी कज़िन चार लाख वाले को मानती है, उसके हिसाब से आपकी अभी शुरुआत है। मेरा दोस्त आठ लाख वाले को मानता है, उसके हिसाब से आप अभी हो ही नहीं। मेरा.....
‘दिलचस्प आदमी हैं आप! चाय लीजिए। साथ क्या लेंगे?’
‘अब मैं चलूं क्या?’
‘कमाल है! आपको रत्ती-भर दिलचस्पी नहीं!?’
‘थोड़ी बची है; लगता है जल्दी ख़त्म हो जाएगी। वैसे आप प्रसिद्ध क्यों हुए?’
‘मुझे सामान्य आदमी होने से नफ़रत है।’
‘आपके प्रशंसकों में कई सामान्य लोग होंगे। उनसे भी नफ़रत है ?’
‘नहीं! आप समझे नहीं.....
‘आप समझे ?’
‘मतलब मेरे ज़्यादातर काम घर बैठे हो जाते हैं.....’

‘यह असभ्यता, अन्याय और बेईमानी के लक्षण हैं। आपकी वजह से कई लोगों के जायज़ काम रोक दिए जाते होंगे, उन्हें चक्कर लगाने पड़ते होंगे........आप अच्छा नहीं कर रहे.....आप समाज को पीछे ले जा रहे हैं....एक सभ्य समाज और देश में सभी लोगों के काम एक जैसे क़ायदे-क़ानूनों के तहत होने चाहिए, भले वे प्रसिद्ध हों, नाप्रसिद्ध हों या कुछ और हों।’
‘आप ख़ामख़्वाह सबको एक ही डंडे से हांक रहे हैं।’
‘मुझे ज़रुरत नहीं ; ज़्यादातर मशहूर लोग हंके ही होते हैं। रुढ़िवादी समाजों में आप प्रसिद्धि की तरफ़ बढ़ते ही तभी हैं जब ख़ुदको कुछ तयशुदा सामाजिक डंडो से हंकवाना मंज़ूर कर लेते हैं।’
‘मतलब?’
‘जैसे अकसर किसी भी प्रसिद्ध आदमी को आप मीडिया के खि़लाफ़ बोलता नहीं पाएंगे, धर्म के खि़लाफ़ बोलता नहीं पाएंगे...... किसी कुरीति, किसी अंधविश्वास, किसी बेईमानी पर भाषण देता पायेंगे भी तो व्यक्तिगत स्तर पर उनका विरोध करता नहीं पाएंगे बल्कि उन्हें ऐसे अवसरों पर ख़ुशी-ख़ुशी शामिल होता देखेंगे।’
‘आप क्या समझते हैं, सभी नास्तिक होते हैं!?’
‘पहली बात तो यह कि मेरी बात का संबंध नास्तिकता से नहीं, बदलाव से है, प्रगतिशीलता से है। दूसरे, प्रसिद्धि तो एक क़िस्म की ऐसी मिनी भगवत्ता है जिसे पाने को नास्तिक भी लालायित रहते हैं।’
‘आप तो बाल की ख़ाल निकालने में विशेषज्ञ मालूम होते हैं!’
‘थोड़ा तोतारटंत और पूर्वाग्रहों को परे रखें और सोचें कि आदमी आखि़र प्रसिद्ध होना क्यों चाहता है! इसीलिए न कि सब उसे जानें, नमस्कार करें, हाथ हिलाएं, ऑटोग्राफ़ मांगें, कहें कि अरे साहब आज तो चींटी के घर भगवान आ गए! या कहें कि कितने लोग आपको जानते हैं फिर भी आप कितने विनम्र हैं! या कहें कि अरे आपको ख़ुद आने की क्या ज़रुरत थी, बोल भर दिया होता, आपका काम हो जाता। लब्बो-लुआब यह कि आप औरों से कुछ अलग़ हैं, कुछ ऊंचे हैं। यह अहंकार नहीं तो क्या है? आप औरों से अलग़ क्यों दिखना चाहते हैं? आपको कैसे मालूम कि आपके प्रसिद्ध होने से समाज का भी कुछ जायज़ फ़ायदा होता है? यह बात अलग़ है कि आप अपने किसी सोर्स से चार काम उल्टे रास्ते से अपने कुछ दोस्तों-रिश्तेदारों के भी करवा दें पर अंततः तो आप जुगाड़वाद को ही बढ़ावा दे रहे होते हैं। नियम भंग करना ही सिखा रहे होते हैं।’
‘आप लस्सी पीएंगे? यहां की लस्सी मशहूर है।’
‘पी चुका हूं। लस्सी वाक़ई अच्छी बनाते हैं। कोई चीज़ अच्छी है इसलिए मशहूर हो जाए, इसमें मैं कतई बुराई नहीं मानता। मगर कोई चीज़ मशहूर है इसलिए हम उसे अच्छा कहने लगें, इससे पता लगता है कि हमने एक ऐसा समाज बना लिया है जहां लोगों की अपनी व्यक्तिगत राय रखने की हिम्मत ख़त्म हो गयी है या व्यक्तिगत रुचियां विकसित होना या बनाए रखना असंभव हो गया है। यह और भी अजीब है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। एक मशहूर आदमी एक दिन नास्तिकता के गीत सुनाकर महफ़िल लूट लेता है। किसी दूसरे दिन वही आदमी अपनी किसी सामाजिक और आर्थिक सफ़लता की ख़ातिर मजमा लगाकर किसी पूजास्थल में चला जाता है। अगर कोई मीडिया, कोई बुद्धिजीवी, कोई आम आदमी इस दोहरेपन पर सवाल नहीं उठाता तो इसे क्या कहेंगे आप!? मुझे तो यही लगता है कि या तो वह समाज सोचने की क्षमता खो चुका है या सवाल करने का साहस खो चुका है। वह समाज उस व्यक्ति की या तो प्रसिद्धि से आक्रांत है या भक्ति में लीन है। मुझे लगता है ज़्यादातर लोग प्रसिद्ध होना भी इसीलिए चाहते हैं कि वे अपने आस-पास भक्तों की क़तार चाहते हैं जो उनके किसी भी कृत्य पर उंगली न उठाएं, उनके हर किए को भक्तिभाव से ग्रहण करते जाएं।’
‘मगर हमारे समाज में ऐसे लोग कम नहीं हैं जो मशहूर होना चाहते हैं।’
‘निश्चय ही। यहां कोई भी आम आदमी नहीं होना चाहता, सब डरते हैं। कोई भी अपना काम कराने को उस लाइन में नहीं लगना चाहता जहां उसका गांव का पुराना दोस्त भोला भी खड़ा है, जहां उसके घर में काम करनेवाली बाई मुनिया भी खड़ी है। उनके साथ खड़ा होने में उसे इसलिए डर लगता है कि उसे कुछ नीचा न समझ लिया जाए। इससे भी पहले उसे यह डर भी होता है कि उसे लाइन में खड़ा होने की वजह से नीचा न मान लिया जाए। यहां हर आदमी थोड़ा-थोड़ा राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री होना चाहता है मगर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से वह उम्मीद करता है कि वे आम आदमी की तरह व्यवहार करें।’
‘बुरा मत मानिएगा, आपने कभी प्रसिद्ध होना नहीं चाहा!?’
‘बिलकुल चाहा। ख़ूब चाहा। मगर आज मैं ईमानदारी से अपने अंदर झांकू तो साफ़ कह सकता हूं कि जितना ज़्यादा मैं ख़ुदको हीन भावना से ग्रस्त, अपमानित और उपेक्षित पाता था उतनी ज़्यादा मेरे अंदर प्रसिद्धि की चाहत बढ़ती जाती थी। प्रसिद्धि की इस चाहत में कहीं न कहीं उन लोगों से बदला लेने या नीचा दिखाने की मानसिकता भी काम करती थी जिन्होंने मुझे अपमानित और शोषित किया था।’
‘तो ?’ 
‘फ़िर मैंने पाया कि ऐसे लोग कहां नहीं है! जिनके बीच मैं प्रसिद्ध होना चाहता हूं, जिनके सहारे मैं प्रसिद्ध होना चाहता हूं, उनमे से कितने लोग उस मानसिकता से अलग़ हैं!?’
‘....और तब आपके अंदर से मशहूर होने की हसरत ख़त्म हो गयी?’
‘नहीं। मगर अब मैं जानता हूं कि प्रसिद्धि मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि और अहंकार की तुष्टि से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकती। इसे समाज की छाती पर अपने तमग़े की तरह टांकने का कोई अर्थ नहीं। प्रसिद्धि के जो तौर-तरीक़े अपने यहां चलन में हैं उनसे समाज के कुछ नुकसान हों तो हों, फ़ायदे तो ना के बराबर नज़र में आते हैं।’ 
‘आपको कहीं जाने की जल्दी थी! कुछ दूसरा काम करना था?’
‘अब नहीं हैं। सोचता हूं पहले आपका काम ही ठीक से कर लूं।’
‘आप शायद व्यंग्य कर रहे हैं!’
‘हां, कर रहा हूं, मगर किसी बुरी नीयत से नहीं कर रहा। जैसे कि मैं बात कर रहा था हांकने की, हंकवाने की। आप देखिए कि किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि आखि़र तय कैसे होती है, कौन-से पैमाने हैं और तय कौन करता है ? कुछ बड़ेे अख़बार, कुछ मीडिया चैनल, गांव-शहर के कुछ शक्तिशाली गुट......ये मान्यता देते हैं किसी व्यक्ति को कि हां, यह प्रसिद्ध व्यक्ति है या प्रसिद्ध होने लायक व्यक्ति है। और वह प्रसिद्ध या प्रसिद्धि का आकांक्षी व्यक्ति उस मान्यता को स्वीकार करके उसे मान्यता देता है। अगर वह इस मान्यता को अस्वीकार करदे तो उसका आगे का रास्ता मुश्क़िल हो जानेवाला है। क्योंकि अहंकार से जने और सने ऐसे गुट यह बर्दाश्त नहीं कर पाते कि कोई उनके खि़लाफ़ या अलग़ जाकर नाम कर ले। बजाय उसके रास्ते से हट जाने या या उसका सहयोग न करने के ये उसका विरोध शुरु कर देते हैं। कई बार बदनामी करने या अफ़वाहें फ़ैलाने तक पर उतर आते हैं। सवाल यह है कि किसने इन चैनलों को यह मान्यता दी है कि ये किसीको प्रसिद्ध या सफ़ल होने का तमग़ा दें!? क्या इन चैनलों में बैठे लोग आसमान से उतरे हैं? चूंकि एक क़िस्म की सत्ता इनके हाथ लग गयी है इसलिए इनके हर कहे-किए को सर-आंखों पर रखा जाए!? अगर सत्ता को ही सब कुछ मानना है तो फ़िर राजसत्ता को इतनी ग़ालियां देने का क्या अर्थ हुआ? यानि जो सत्ता आपको माफ़िक आती है, मौक़ापरस्ती बरतते हुए उसे ही आप अपना लेते हैं। न हो तो अपनी सत्ता खड़ी कर लेते हैं और ख़ुद भी दूसरों को मान्यता देना शुरु कर देते हैं।’
‘बोलते रहिए’
‘आप सुनते रहिए। सुनिए कि अकसर मशहूर व्यक्ति को किसी दल, किसी वाद, किसी धारा, किसी जाति, किसी वर्ण, किसी गुट से ख़ुदको हंकवाना पड़ता है। जब तक वह ख़ुदको हंकवाता रहता है उसे लगभग बेशर्त्त समर्थन मिलता रहता है। मगर जिस दिन वह ज़रा-सा इधर-उधर होता है, मुश्क़िल में पड़ जाता है। उसका कृतित्व जो कल तक उसे अमर बनाने लायक माना जा रहा था, आज दो कौड़ी का सिद्ध किया जा सकता है।’

(जारी)
-संजय ग्रोवर

28 दिस॰ 2010

सिर्फ़ पाले बदल जाएंगे

सरल बताता है कि उसे उस ऐपिसोड का काफ़ी बड़ा हिस्सा मिल गया है देखने को। राखी वहां ग़लत भी नहीं है। लेकिन वे जिस तरह ‘मर्द’, नामर्द’ और ‘नपुंसक’ जैसे शब्दों का प्रयोग करतीं हैं वह दिखाता है कि आधुनिक होती दिखती स्त्री अभी मर्द-मानसिकता बल्कि वर्चस्ववादी मानसिक अनुकूलन से बाहर नहीं निकल पायी है जहां हर तरह की बहादुरी के लिए एक ही शब्द का बार-बार प्रयोग होता है-मर्दानगी। और यह या ऐसे संबोधन औरत में उसके औरत होने को लेकर कमतरी का अहसास कराते हैं। राखी लक्षमण को कायर, डरपोक, अपराधी, घुन्ना या ऐसा ही कुछ और कह सकतीं थीं।
राखी को छोड़िए, सरल ने कई समझदार लोगों को यह कहते पाया कि ‘औरत का तो मैं बहुत सम्मान करता हूं।’
सरल को हैरानी होती है।
क्यों भई, बात-बेबात, बिना सोचे-समझे किसी भी औरत का सम्मान क्यों करने लग पड़ते हो आप !? फिर तो आप उस सास का भी सम्मान करोगे जिसने बहू को जला दिया !? आप उस सरगना औरत का भी सम्मान करोगे जो लड़कियां खरीदती-बेचती है, धंधे में उतारने से पहले उसे भूखा रखती है, गुर्गों से बलात्कार तक करवा डालती है।
सम्मान किसी का भी हो सकता है जिसमें अच्छाई हो, अलग से सिर्फ़ औरत का सम्मान क्यों ?
यह दरअसल बीमारी को ख़त्म करने की बजाय इधर से उधर शिफ्ट कर देने जैसा है।
कलको सारे चुटकले औरत की अतार्किक हंसी उड़ाते थे, अब मर्द की उड़ाने लगेंगे। आज तक जो ज़ुल्म मर्द कर रहा है, औरत करने लगेगी। कर भी रहीं हैं।
शोर उट्ठेगा कि नहीं-नहीं, औरत ऐसा कैसे कर सकती है, वह तो त्याग की मूर्ति है, करुणा की देवी है। औरत, मर्द से कहीं ज़्यादा संवेदनशील होती है।
यही, एक-दूसरे पर श्रेष्ठता के दावे धार्मिक और लैंगिक बीमारियों की जड़ है।
औरत की आंखों की जो बेचारगी हमें करुणा लगती है, ध्यान से देखें तो वही करुणा भूख से मरते किसान और इंसान होने के बोध से नावाकिफ़, गालियां खाते सफ़ाई कर्मचारी की आंखों में भी दिख जाएगी। आदमी जितना ज़्यादा मजबूर होता है उतना ज्यादा करुणाजनक लगता है। जैसे-जैसे समर्थ होता है, उसका असली स्वभाव बाहर आना शुरु होता है। सरल नहीं कहता कि मजबूर को समर्थ नहीं बनना चाहिए। लेकिन करुणा और संवेदना को औरत और मर्द में बांटने से ज़्यादा कुछ निकलने वाला लगता नहीं।
फिर तो ऐसे बेवकूफ़ी भरे आश्चर्यों से छुटकारा पाने की उम्मीद छोड़ ही देनी चाहिए कि ‘हाय ! औरत ही औरत की दुश्मन कैसे हो गयी ?’
इंसान, इंसान से लड़ता है, मर्द, मर्द के खि़लाफ़ षडयंत्र करता है, कुत्ता, कुत्ते पर भौंकता है। इसमें हैरानी नहीं तो औरत से औरत की दुश्मनी पर इतनी हैरानी क्यों !?
कलको एक महिला सिपाही एक महिला जेबकतर को जेल ले जाती दिखेगी तो भी यही कहेंगे क्या कि हाय ! देखो मैं कहता था न औरत ही औरत की दुश्मन है’ !
सीधी बात कि एक इंसान ने ग़लती की और दूसरा इंसान जिसपर व्यवस्था का जिम्मा है, उसे पकड़कर ले जा रहा है।
काहे उलझा रहे हो चीज़ों को, भाई ?
पर हवा ? अंधी पक्षधरता ? उसका क्या करें ?
एक हवा पहले चलती थी कि औरतें तो सब मूर्ख होतीं हैं, उनकी अक़्ल घुटनों में होती है।
एक हवा अब चली है कि मर्द साले, सबके सब सुअर, मेल शॉविनिस्ट !
अरे पहले बीमार मानसिकता को ठीक से समझ तो लो, फिर उसे ख़त्म करने के उपाय सोचो, करो।
उसे उधर से इधर, इधर से उधर शिफ्ट मत करते चले जाओ। कुछ नहीं निकलेगा। सिर्फ़ पाले बदल जाएंगे।

-संजय ग्रोवर

22 दिस॰ 2010

नामर्द और नाइंसान में कौन बेहतर !?

कई दिन से पढ़ रहा है सरल। डेढ़ साल से ज़्यादा हुआ, टी.वी. नहीं देखा। रिकॉर्डिंग मिल जाएगी यूट्यूब पर। देख सकता है। नेट की सुविधा तो है न उसके पास।
अपने शो में राखी ने किसी को नामर्द कह दिया। लक्ष्मण नाम बताते हैं उसका। लक्ष्मण ने आत्महत्या कर ली। क्या दोष था लक्ष्मण का ? और क्या दोष दें राखी को !
नामर्द कहलाने से पुरुष कितना डरता आया है, सरल से बेहतर कौन जानता है ?
वही संस्कार लक्ष्मण के और वही समझ राखी की।
भीड़ और हवा की ग़ुलामी।
कोई अपनी मर्ज़ी से लैंगिक विकलांग नहीं होता। कोई अपनी मर्ज़ी से दलित नहीं होता, स्त्री नहीं होता, पुरुष नहीं होता। तो अपनी मर्ज़ी से नामर्द क्यों होगा !?
शायद ऐसे भी उदाहरण रहे हों कि किसी औरत को ‘ठंडी’, ‘बांझ’, ‘फ्लैटचैस्टेड’(वक्ष विहीन) कहा गया हो और उसने आत्महत्या कर ली हो !
सच पूछो तो 15 से 45 का हो जाने के बाद भी सरल कभी समझ नहीं पाया कि कितना वह मर्द है और कितना नामर्द। एक क़िताब पढ़ता तो उसे लगता कि उससे बड़ा मर्द कोई नहीं दुनिया में। दूसरा लेख पड़ता तो शर्म आती कि वह तो पूरी तरह नामर्द है फिर भी ज़िंदा है।
क्या पैमाना है मर्दानगी का ? औरत की यौन-संतुष्टि !? किस हद तक ? कितनी औरतों की ? वो हरम, वो हज़ारों रानियां-पटरानियां ? किसने जाना होगा कि वहां कौन कितना संतुष्ट था !
फिर ठंडी औरतों का क्या करें ? उन्हें भी ख़ुदकुशी का रास्ता दिखाएं दोबारा ?
सरल तो पढ़ता आ रहा है कि ख़ुद औरतों ने भी अभी जानना शुरु किया है अपनी यौन-संतुष्टि के बारे में !
कितने ही मर्द थे जो तर्क देते थे कि हम वेश्याओं या दूसरी औरतों के पास इसलिए जाते हैं कि पत्नी से संतुष्टि नहीं होती।
क्या राखी हमें लौटाकर वहीं ले जाना चाहतीं हैं !?
क्या शादी से पहले लक्ष्मण ने अपनी होने वाली पत्नी को कोई वचन दिया था यौन-संतुष्टि का ? क्या ससुराल पक्ष ने इस विषय में कोई जानकारी मांगी थी ? क्या हमारे यहां शादियों से पहले ऐसा कुछ आवश्यक समझा गया है ?
राखी को जानना चाहिए कि हमारे यहां इस मुआमले में स्त्री जितनी मजबूर है, उतना ही पुरुष भी। बल्कि शादी न करने पर एक शक पुरुष पर यह भी किया जाता है कि कहीं वह नामर्द तो नहीं ! जिस तरह दहेज  और दूसरे रीति-रिवाजों पर स्त्री का कोई वश नहीं होता उसी तरह शादी के संदर्भ में अपनी मर्दानगी को जानने और बताने को लेकर पुरुष भी कुछ कम मजबूर नहीं होता।
नामर्दी या ‘नाऔरती’ एक व्यक्तिगत मामला है जबतक कि कोई पुरुष या स्त्री दूसरे पक्ष के साथ कोई ऐसा संबंध नहीं बनाता जिसमें यौन-संतुष्टि एक अनिवार्य पक्ष हो। शादी एक ऐसा ही संबंध है मगर अपने यहां शादियों में, विवाह से पहले, यौनसंबंधी तथ्यों के आदान-प्रदान का ऐसा कोई प्रचलन या रिवाज नहीं है इसलिए एक ही पक्ष को दोषी ठहरा देना उचित कैसे कहा जा सकता है !?
नामर्द, समाज का कुछ नहीं ले रहा होता, वह समाज को किसी तरह की हानि नहीं पहुंचा रहा होता। ठीक उसी तरह जैसे एक अविवाहित ‘ठंडी’, ‘बांझ’, वक्ष-विहीन, या स्त्री के लिए सौंदर्य और सेक्स के संदर्भ में तयशुदा मानदण्डों पर खरी न उतरने वाली औरत।
ऐसे ताने मत मारो राखी जिनकी वजह से अब तक ख़ुद औरत का सांस लेना मुश्किल बना हुआ था।
लक्ष्मणों को बख़्शो राखी।
हां, चाहो तो सरल को नामर्द कहो। वह ख़ुदकुशी नहीं करने वाला। आज इतना परिपक्व तो हो ही चुका है कि आपकी मानसिक अपरिपक्वता को समझ सके।

-संजय ग्रोवर