24 सित॰ 2015

सदियों की ख़ता, लम्हों को सज़ा-10

(पिछला भाग)

क्या लोग आधुनिक हो गए हैं ! ख़ासकर स्त्रियां !?

वह किसी काम से लाइन में लगा होता है और कई बार एक घटना घट जाती है। हवा में कोई ऐसी गंध अपनी जगह, थोड़ी देर के लिए ही सही, बना लेती है कि बड़े-बड़े सहनशील अपनी सहनशीलता भूलने लगते हैं। बोलता कोई कुछ नहीं हैं मगर किसीका हाथ अपनी नाक पर चला जाता है, कोई अपनी सांस रोक लेता है, कोई अपना चेहरा आसमान की तरफ़ कर लेता है........

कोई कितना भी छुपाए पर जो चीज़ इंसान बर्दाश्त नहीं कर पाता उसके प्रति नाराज़गी के, अरुचि के, चिढ़ के भाव उसके चेहरे पर, उसकी भाषा में, उसकी भाव-भंगिमाओं/बॉडी-लैंग्वेज में कहीं न कहीं प्रकट हो ही जाते हैं।

फ़िर यह कैसे होता है किसी शादी में, सगाई में, लेन-देन की अन्य अजीबो-ग़रीब रस्मों में मौजूद लोगों में से किसीको भी वहां चल रहे कारोबार पर कोई ऐतराज़ नहीं होता, उन्हें कुछ भी अजीब और कष्टप्रद नहीं लगता। वे घर से पूरे उत्साह के साथ हंसते-गाते इन समारोहों में जाते हैं, हंसते-गाते सारी गतिविधियों का हिस्सा बनते हैं, हंसते-गाते लौट आते हैं।

इतनी सारी औरतें वहां मौजूद होती हैं, वीडियो रिकॉर्डिंग चल रही होती है, वे सब मिलकर इस सबका बहिष्कार क्यों नहीं कर देतीं !? वीडियो रिकॉर्डिंग इस बात का पक्का सबूत होगी कि यहां क्या चल रहा था।

लौटकर इनमें से कुछ लोग सेमिनार में जाएंगे, स्टेटस लिखेंगे, लेख लिखेंगे, भाषण देंगे, फ़िल्म बनाएंगे यानि कि हर तरह से ख़ुदको प्रगतिशील और किन्हीं दूसरों को (जो इनकी ऑडिएंस/पाठकों में मौजूद नहीं है) कट्टरपंथी बताएंगे। इनमें स्त्री-पुरुष, यह धर्म, वह धर्म, फ़लां जाति, ढिकां जाति सब पाए जाते हैं, कोई कम पड़ता नहीं दिखता....

दरअस्ल लालच किसीमें भी हो सकता है-मर्द में भी, औरत में भी ; ब्लैक-मनी यानि हराम का पैसा लेने में हमारी विशेष रुचि रहती है; फ़िर भले वह दहेज़ से मिलता हो चाहे पुलों की सीमेंट में ज़्यादा से ज़्यादा रेत मिलाकर, चाहे खाने के सामानों में ज़हरीला रॉ-मॅटीरियल मिलाकर। ये सब चीज़ें मर्दों और औरतों की आंखों की वोल्टेज समान मात्रा में बढ़ा देतीं हैं। टीए/डीए बनाने से लेकर स्टेशनरी कब्ज़ाने और रॉयल्टी मारने से लेकर पब्लिशर का ‘दोस्त’ बनकर नये लोगों का शोषण करने में स्त्री और पुरुष में क्या-क्या भेद हैं, हो सकता है इसपर भी कोई सर्वे हो जाए।

जहां तक रीति-रिवाजों और लेन-देन की बात है, इसमें क़तई संदेह की गुंजाइश नहीं है कि स्त्रियां इसमें बराबर की भागीदार हैं।

हिस्सेदार कितनी हैं, यह तो वही जानते होंगे जो उनके साथ हिस्सा बांटते हैं।

सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ तब होती है जब ऐसे लोग ख़ुदको प्रगतिशील और इस गंदगी में हिस्सा न बंटानेवालों को ऑर्थोडॉक्स या आउटडेटेड घोषित करने लगते हैं !!

ख़ुदके ही बस का कुछ नहीं है तो दूसरों पर दोष डालना तो छोड़ो! कुछ तो शर्म करो!

क्या इस तरह से कुछ ठीक हो सकता है ?

इससे तो यही समझ में आता है कि अंग्रेज न आए होते तो सतीप्रथा जारी रहती, क्योंकि हम तो दहेज भी ले-दे रहे हैं, ऐसी प्रथाओं में दांत फाड़-फाड़कर शामिल भी हो रहे हैं और साथ में प्रगतिशीलता और मुक्ति पर भाषण भी झाड़ रहे हैं।

24-09-2015

(जारी)


6 अग॰ 2015

सदियों की ख़ता, लम्हों को सज़ा-9

(पिछला भाग)

स्त्रियां आज़ाद हो रहीं हैं, होंगी।

मगर उसके लिए न सिर्फ़ उन्हें अपनी पारंपरिक भूमिका को छोड़ना होगा बल्कि पुरुष को भी उसकी पारंपरिक भूमिका से मुक्त करके देखना होगा, जो कि अभी तक कम ही होता दिखाई दिया है।

कितनी स्त्रियां हैं जो अपने पतियों, भाईयों, पिताओं से भारी सामान उठाने की उम्मीद न करतीं हों ?

यूं कोई भी कमज़ोर, थका, बीमार व्यक्ति किसीसे भी मदद मांग सकता है, इंसानियत के नाते कोई भी किसीकी सहायता कर सकता है, मगर किसी लैंगिक भेदभाव या पारंपरिक रिश्तों के आधार पर स्त्री या पुरुष की भूमिकाएं फ़िक्स कर देना समानता नहीं हो सकती।

कितनी स्त्रियां हैं जो पुरुष द्वारा कार का दरवाज़ा खोले जाने और फ़िल्मी अंदाज़ में ‘लेडीज़ फ़र्स्ट’ का उच्चारण सुन कर या सुनने के इस ख़्याल पर ख़ुश न होतीं हों। ‘लेडीज़ फ़र्स्ट’ कभी भी समानता का उद्घोष नहीं हो सकता। इसके दो-तीन ही मतलब समझ में आते हैं, एक-स्त्रियों का वर्चस्व, दो-स्त्रियों की ख़ुशामद और तीन स्त्रियों की निरीहता। उक्त में से किसी में भी समानता जैसी कोई बात नज़र नहीं आती।

कितनी स्त्रियां हैं जो ‘मैं तो हर स्त्री का सम्मान करता हूं’ जैसे जुमले सुनकर ख़ुश न होतीं हों ? उसे याद आता है जब वह बहुत छोटा, अबोध और कमज़ोर-सा बच्चा था कि एक दिन किसी खेल के दौरान एक दादा टाइप लड़के ने बेकार की कोई तीन-पांच निकाली और उसे दो-तीन झापड़ रसीद कर दिए। वह अभी इन झापड़ों का रहस्य समझने की कोशिश ही कर रहा था कि दादा ने सामने किसी दरवाज़े पर खड़ी किसी लड़की का वास्ता देते हुए कहा कि ‘फ़लां’ की ‘इज़्ज़त’ करता हूं, इसलिए तुझे छोड़ रहा हूं वरना.......

बाद में उसे स्त्रियों के इस ‘आदर’ का रहस्य समझ में आया और उसके भी बाद उसने इस आदर के कई-कई रुप देखे। अब तो वह भली-भांति जानता है कि स्त्रियों का ‘आदर’ करनेवालों में भी बड़ी ‘वैराइटी’ है, इनमें लड़की पटानेवालों से लेकर भीड़ पटानेवाले यानि लोकप्रियतावादियों तक सब तरह की क़िस्में पाई जातीं हैं।

वैसे भी बिना किसी वजह का आदर पाकर कोई भी ढंग का आदमी कैसे ख़ुश हो सकता है!?

कितनी स्त्रियां है जो लड़का न ढूंढने, अपनी शादी न हो पाने या शादी के बाद ससुरालियों की अच्छी देखभाल, रखरखाव(संबंधों की मेंटीनेंस) न हो पाने का दोष अपने भाईयों को न देतीं हों ?

लड़कियों की शादी न हो पाने का दोष माता-पिता को दिया जाए यहां तक बात समझ में आती है क्योंकि माता-पिता ने अपने होशो-हवास में बच्चों को पैदा किया होता है और वे जानते रहे होते हैं कि इस समाज में लड़कियों की शादी किस तरह से होती है। मगर भाई-बहिन पर परस्पर इस तरह की कोई भूमिकाएं आरोपित करना लगभग शर्मनाक़ ही माना जाना चाहिए। ख़ासकर तब तो और भी जब ये लोग ख़ुदको प्रगतिवादी और समानतावादी मानते हों। भाई-बहिन एक ही घर में संयोग से पैदा होते हैं। किसी बहिन पर भाई की देखभाल की ज़िम्मेदारी डालना या किसी भाई पर बहिन की शादी वगैरह की ज़िम्मेदारी डालना समान रुप से अतार्किक और अनैतिक है। इंसानियत के नाते कोई किसीके लिए अपनी जान भी दे सकता है मगर स्त्री या पुरुष के नाते, एक तयशुदा पारिवारिक ढांचे के तले, इस तरह के रोल फ़िक्स करना कहीं से भी समानता में नहीं आता। और स्त्री के विवाह की कोशिशों, विवाह के दौरान और बाद में हमारे समाज में जिन गंदे, अमानवीय, भेदभावयुक्त और कई बार अश्लील रीति-रिवाज़ों, मानसिकताओं और व्यवहार से गुज़रना पड़ता है उसे जानते हुए भी कोई प्रगतिशील(!) व्यक्ति इसे महानता, सामाजिकता, ज़िम्मेदारी, उपलब्धि वग़ैरह मान सकता है, सोचकर भी हैरानी होती है!!

कितनी स्त्रियां हैं जो पुरुष से, यूंही, ख़ामख़्वाह, आर्थिक मदद, वाहन में लिफ़्ट आदि की उम्मीद नहीं रखतीं ?

ऐसे बहुत-से सवाल हैं।

समानता के लिए एक सुझाव समझ में आता है-

जब कोई स्त्री और पुरुष, किसी समझौते, किसी व्यवस्था जैसे विवाह, लिव-इन या अन्य कोई जीवन-शैली, के तहत साथ-साथ रहना चाहें तो दोनों के परिवार वाले उन्हें एक तीसरी जगह बसाकर दें, दोनों ही उसमें बराबर या अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार सहयोग करें, दोनों अपनी-अपनी प्रॉपर्टी से हिस्सा दें। या लड़कियां अभी भी पुरुष के साथ उसके घर जानेवाली व्यवस्था से ख़ुश हैं तो वह तो जारी है ही। कोई पुरुष भी अगर स्त्री के साथ जाकर उसके परिवार के साथ रहना चाहे तो उसे भी हिक़ारत की नज़र से क्यों देखना चाहिए !?

समानता तो समानता है।

06-08-2015
(जारी)

(अगला भाग)