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22 जून 2017

एक चुटकी ुतियापा-2

एक चुटकी  ुतियापा-1

स्त्रियों का मैं बहुत सम्मान करता हूं।
मैं हर स्त्री का सम्मान करता हूं।

आजकल ऐसे नारे घर-घर में चल निकले हैं। हो सकता है कई लोग करते भी हों। सुबह उठकर मां-बहिनों-पत्नियों का सम्मान करते हों-अरे, तुम अभी तक उठी नहीं ? बताओ, पहले ही इतनी देर हो चुकी है, सम्मान कब करुंगा ? मेरे सम्मान की ख़ातिर थोड़ा जल्दी नहीं उठ सकतीं ? एक तो मैं सुबह-सुबह सम्मान कर रहा हूं और ये हैं कि पड़ी हुई हैं, अपनेआप उठोगी या खींचकर उठाऊं....अभी पिताजी का भी करना है, रोज़ लेट हो जाता हूं। 

फिर सामने दरवाज़े पर कामवाली महिला खड़ी है, उसका भी सम्मान करना है (क्या आप मानते हैं कि ये लोग कामवाली बाईयों को भी ‘हर स्त्री’ में गिनते होंगे और उनका भी समान रुप से सम्मान करते होंगे!? मुझे तो नहीं लगता कि सभी ‘मालकिन’ स्त्रियां सभी चौका-बरतन-पोचा वाली स्त्रियों को ‘हर स्त्री’ मानकर सम्मान करतीं होंगीं )। रास्ते पर निकलेंगे तो रास्ते भर औरतें मिलेंगी-गली में, सड़क पर, बस में, मेट्रो में, पुल पर, दफ़्तर में, दुकान में......हर औरत का सम्मान.....!? कैसे करते होंगे ? पैर-वैर छूते होंगे, किसीसे हाथ मिलाते होंगे, किसीको हग करते होंगे, फिर दो मिनट बात भी तो करते होंगे, हाल-चाल पूछते होंगे....दफ़्तर कब पहुंचते होंगे ? हर औरत के सम्मान के लिए तो अच्छा-ख़ासा वक़्त चाहिए। हमारे कई तथाकथित प्रगतिशील मित्र तो जब तक होली पर हिंदू के घर गुझिया और ईद पर मुस्लिम के घर सेवईयां खाते हुए फ़ोटो न खिंचा लें तब तक न तो ख़ुदको और न दूसरे को धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील मान पाते हैं। अब आपको भी हर औरत के सम्मान का प्रमाण देना पड़ेगा। मोबाइल हाथ में लेकर रास्ते-भर सेल्फ़ी खींचते चलिए।

चलो यह तो हुआ थोड़ा हास्य-व्यंग्य, लेकिन क्या दुनिया में ऐसा कोई एक आदमी भी होगा जो हर मर्द का या हर औरत का या चलिए इन्हें भी छोड़िए, हर बच्चे का भी सम्मान करता होगा ? क्या यह संभव है ? यह बिलकुल अव्यवहारिक बात है। मुझे तो हैरानी होती है कि ये किस तरह के लोग होते हैं जो बेवजह हर किसीसे सम्मान चाहते हैं। जान न पहचान, फिर भी सम्मान !? मुझे तो ऐसे लोग अहंकारी और तानाशाह ही समझ में आते हैं फिर चाहे वे मर्द हों, औरतें हों, माता-पिता हों या कोई और हों। ध्यान रखना कि हिटलर, मुसोलिनी, चंगेज़ आदि इसी चाह से पैदा होते हैं, विश्वगुरु होने की चाहत का आधार भी हर किसीको झुकाने और ख़ुदको श्रेष्ठ घोषित करने की हवस ही होती है। मुझे तो याद आता है बचपन में जब माता-पिता ज़बरदस्ती किसीसे नमस्कार कराते थे तो उस शख़्स के प्रति एक अनादर या ग़ुस्से का भाव ही पैदा होता था....। कई लोग तो लगता है शादी और बच्चे करते हीं इसलिए हैं कि और कुछ नही तो कम से कम अपने बच्चों से तो सम्मान करा ही लेंगे।

‘हर स्त्री का सम्मान’ की हक़ीक़त देखनी हो तो टीवी पर सबसे ज़्यादा हिट बताए जा रहे कॉमेडी शो देखिए। वहां स्त्री के ओंठ हंसने की चीज़ हैं, स्त्री का बाप हंसने की चीज़ है, स्त्री का भाई हंसने की चीज़ है, स्त्री का पुराना परिवार हंसने की चीज़ है, स्त्री का बोलना, चलना, आना, जाना, हंसना सब हंसने की चीज़ है। हर स्त्री की हर बात हंसने की चीज़ है। और तो और अगर अपने प्रिय लड़के भी लड़कियों के कपड़े पहनकर आ जाएं तो वो भी हंसने की चीज़ हैं। हमें क्या मालूम था कि उपहास का ही दूसरा नाम सम्मान है। सम्मान करने-कराने वालों की बात ही कुछ और है। 

इंटरनेट पर सम्मान कराते हुए थोड़ी ज़्यादा सावधानी बरतनी होती है। पट्ठे दायें नाम से ट्रॉल करेंगे, बाएं नाम से सम्मान करने आ जाएंगे। एक नाम से आपको उपहास का पात्र बनाएंगे, दूसरे से लाड़ लड़ाने लगेंगे। 

और जब ऐसी बातें ऐसे लोग करते हैं जिन्होंने वर्णव्यवस्थाएं बनाईं, हिंदू-मुस्लिम बनाए....जिन्होंने ‘बड़ा आदमी’ बनने के लिए हर तरह के फ़ॉर्मूले आज़माए, वे हर किसीका सम्मान कर सकेंगे !? जिन्हें अपना सम्मान हर किसीसे कराने की इतनी जल्दी थी कि सम्मान का सही मतलब भी भूल गए.......।

हर स्त्री का सम्मान ? मायावती पर कितने लेख लिखे गए, कितने व्यक्तिचित्र, रेखाचित्र, वृतचित्र(डॉक्यूमेंट्रीज़) उनपर हर स्त्री का सम्मान करनेवालों ने बनाए ? कितने लोग उनके ऑटोग्राफ़ लेते हैं ? कितने उनके साथ फ़ोटो खिंचाते हैं ? वैसे जाली डिग्री के मामले में स्मृति ईरानी और बाबरी मामले में साध्वियों उमा भारती, रितंभरा आदि का, विदेशी मूल के मामले में सोनिया गांधी का भी काफ़ी ज़ोरदार सम्मान किया गया था तथाकथित विपक्षियों द्वारा।

पहले हमने हर मर्द का सम्मान किया, फिर हर ब्राह्मण का सम्मान किया, फिर हर जीजाजी का सम्मान किया, अब हर स्त्री की बारी है। पहला फंदा छूटता नहीं कि नया तैयार हो जाता है।

अत्याचार अगर परंपरा में शामिल हों तो लोग उनका भी सम्मान करने लगते हैं। भारत में जीजा-साला और सास-बहू संबंध इसका स्पष्ट उदाहरण हैं। 

वैसे ‘हर स्त्री का सम्मान’ में नया कुछ भी नहीं है- अष्टमी पर लड़कियों के पैर धोना, रक्षाबंधन पर धागा बंधाकर असली पैसों के साथ रक्षा का नक़ली वायदा देना, स्त्री को देवी बताना, तरह-तरह की देवियों की पूजा करना....ये सब हम कबसे देखते आ रहे हैं। इससे स्त्रियों को मिला क्या, वह समझने की बात है।

हमारी तो आदत ही है कि जो भी काम हमें ठीक से समझ में नहीं आता या असल में उसे करने की नीयत या हिम्मत नहीं होती, उसके लिए कुछ कर्मकांड बना लेते हैं, चौपाईयां लिखकर दीवार पर टांग देते हैं, कोई न कोई नाटक खड़ा कर लेते हैं।

(त्यागी, संतोषी, ममतामयी तो स्त्री को पहले ही कहा जाता था, अब इस संदर्भ में ‘सम्मान’ का एक नया अध्याय और जुड़ गया है, इस बारे में और जानना चाहें तो यहां ‘5.पुरुष की मुट्ठी में बंद है नारीमुक्ति की उक्ति’ को भी पढ़ सकते हैं)


-संजय ग्रोवर

22-06-2017


6 अग॰ 2015

सदियों की ख़ता, लम्हों को सज़ा-9

(पिछला भाग)

स्त्रियां आज़ाद हो रहीं हैं, होंगी।

मगर उसके लिए न सिर्फ़ उन्हें अपनी पारंपरिक भूमिका को छोड़ना होगा बल्कि पुरुष को भी उसकी पारंपरिक भूमिका से मुक्त करके देखना होगा, जो कि अभी तक कम ही होता दिखाई दिया है।

कितनी स्त्रियां हैं जो अपने पतियों, भाईयों, पिताओं से भारी सामान उठाने की उम्मीद न करतीं हों ?

यूं कोई भी कमज़ोर, थका, बीमार व्यक्ति किसीसे भी मदद मांग सकता है, इंसानियत के नाते कोई भी किसीकी सहायता कर सकता है, मगर किसी लैंगिक भेदभाव या पारंपरिक रिश्तों के आधार पर स्त्री या पुरुष की भूमिकाएं फ़िक्स कर देना समानता नहीं हो सकती।

कितनी स्त्रियां हैं जो पुरुष द्वारा कार का दरवाज़ा खोले जाने और फ़िल्मी अंदाज़ में ‘लेडीज़ फ़र्स्ट’ का उच्चारण सुन कर या सुनने के इस ख़्याल पर ख़ुश न होतीं हों। ‘लेडीज़ फ़र्स्ट’ कभी भी समानता का उद्घोष नहीं हो सकता। इसके दो-तीन ही मतलब समझ में आते हैं, एक-स्त्रियों का वर्चस्व, दो-स्त्रियों की ख़ुशामद और तीन स्त्रियों की निरीहता। उक्त में से किसी में भी समानता जैसी कोई बात नज़र नहीं आती।

कितनी स्त्रियां हैं जो ‘मैं तो हर स्त्री का सम्मान करता हूं’ जैसे जुमले सुनकर ख़ुश न होतीं हों ? उसे याद आता है जब वह बहुत छोटा, अबोध और कमज़ोर-सा बच्चा था कि एक दिन किसी खेल के दौरान एक दादा टाइप लड़के ने बेकार की कोई तीन-पांच निकाली और उसे दो-तीन झापड़ रसीद कर दिए। वह अभी इन झापड़ों का रहस्य समझने की कोशिश ही कर रहा था कि दादा ने सामने किसी दरवाज़े पर खड़ी किसी लड़की का वास्ता देते हुए कहा कि ‘फ़लां’ की ‘इज़्ज़त’ करता हूं, इसलिए तुझे छोड़ रहा हूं वरना.......

बाद में उसे स्त्रियों के इस ‘आदर’ का रहस्य समझ में आया और उसके भी बाद उसने इस आदर के कई-कई रुप देखे। अब तो वह भली-भांति जानता है कि स्त्रियों का ‘आदर’ करनेवालों में भी बड़ी ‘वैराइटी’ है, इनमें लड़की पटानेवालों से लेकर भीड़ पटानेवाले यानि लोकप्रियतावादियों तक सब तरह की क़िस्में पाई जातीं हैं।

वैसे भी बिना किसी वजह का आदर पाकर कोई भी ढंग का आदमी कैसे ख़ुश हो सकता है!?

कितनी स्त्रियां है जो लड़का न ढूंढने, अपनी शादी न हो पाने या शादी के बाद ससुरालियों की अच्छी देखभाल, रखरखाव(संबंधों की मेंटीनेंस) न हो पाने का दोष अपने भाईयों को न देतीं हों ?

लड़कियों की शादी न हो पाने का दोष माता-पिता को दिया जाए यहां तक बात समझ में आती है क्योंकि माता-पिता ने अपने होशो-हवास में बच्चों को पैदा किया होता है और वे जानते रहे होते हैं कि इस समाज में लड़कियों की शादी किस तरह से होती है। मगर भाई-बहिन पर परस्पर इस तरह की कोई भूमिकाएं आरोपित करना लगभग शर्मनाक़ ही माना जाना चाहिए। ख़ासकर तब तो और भी जब ये लोग ख़ुदको प्रगतिवादी और समानतावादी मानते हों। भाई-बहिन एक ही घर में संयोग से पैदा होते हैं। किसी बहिन पर भाई की देखभाल की ज़िम्मेदारी डालना या किसी भाई पर बहिन की शादी वगैरह की ज़िम्मेदारी डालना समान रुप से अतार्किक और अनैतिक है। इंसानियत के नाते कोई किसीके लिए अपनी जान भी दे सकता है मगर स्त्री या पुरुष के नाते, एक तयशुदा पारिवारिक ढांचे के तले, इस तरह के रोल फ़िक्स करना कहीं से भी समानता में नहीं आता। और स्त्री के विवाह की कोशिशों, विवाह के दौरान और बाद में हमारे समाज में जिन गंदे, अमानवीय, भेदभावयुक्त और कई बार अश्लील रीति-रिवाज़ों, मानसिकताओं और व्यवहार से गुज़रना पड़ता है उसे जानते हुए भी कोई प्रगतिशील(!) व्यक्ति इसे महानता, सामाजिकता, ज़िम्मेदारी, उपलब्धि वग़ैरह मान सकता है, सोचकर भी हैरानी होती है!!

कितनी स्त्रियां हैं जो पुरुष से, यूंही, ख़ामख़्वाह, आर्थिक मदद, वाहन में लिफ़्ट आदि की उम्मीद नहीं रखतीं ?

ऐसे बहुत-से सवाल हैं।

समानता के लिए एक सुझाव समझ में आता है-

जब कोई स्त्री और पुरुष, किसी समझौते, किसी व्यवस्था जैसे विवाह, लिव-इन या अन्य कोई जीवन-शैली, के तहत साथ-साथ रहना चाहें तो दोनों के परिवार वाले उन्हें एक तीसरी जगह बसाकर दें, दोनों ही उसमें बराबर या अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार सहयोग करें, दोनों अपनी-अपनी प्रॉपर्टी से हिस्सा दें। या लड़कियां अभी भी पुरुष के साथ उसके घर जानेवाली व्यवस्था से ख़ुश हैं तो वह तो जारी है ही। कोई पुरुष भी अगर स्त्री के साथ जाकर उसके परिवार के साथ रहना चाहे तो उसे भी हिक़ारत की नज़र से क्यों देखना चाहिए !?

समानता तो समानता है।

06-08-2015
(जारी)

(अगला भाग)


8 जुल॰ 2015

सदियों की ख़ता और लम्हों को सज़ा-8

(पिछला भाग)

भारतीय एक ही सांस में, एक ही वक़्त में कितनी सारी विरोधाभासी बातें एक साथ सोच और कर सकते हैं, इसका एक और उदाहरण अभी-अभी देखा। ‘तनु वेड्स् मनु रिटर्न्स्’ की शुरुआत में ही नायिका/पत्नी नायक/पति के लिए कहती है-‘यह आदमी अदरक की तरह कहीं से भी बढ़ता जा रहा है‘....। यह डायलॉग मशहूर हुआ, महिलाओं ने इसे काफ़ी पसंद किया। ऐसी ही एक दूसरी, लगभग नारीवादी (सुविधा के लिए एक शब्द) फ़िल्म को देखकर बहुत-सी महिलाएं ठीक इसके विपरीत एक स्थिति को भी उतना ही पसंद कर रहीं हैं। यह फ़िल्म है-‘दम लगाके हईशा’। इसमें एक ऐसी स्त्री जिसे कि अब तक प्रचलित भाषा में ‘मोटी’ संबोधन दिया जाता रहा है, से एक आम स्वास्थ्य वाले युवक की शादी हो जाती है और धीरे-धीरे वह उसे स्वीकार कर लेता है।

अजीब बात है कि इन दोनों बिलकुल विपरीत स्थितियों पर एक साथ ख़ुश कैसे हुआ जा सकता है !? एक स्त्री मोटे पुरुष को छोड़ रही है तो दूसरी तरफ़ एक पुरुष मोटी स्त्री को अपना रहा है। (हालांकि माधवन अदरक तो कहीं से भी नहीं लगते, उसके लिए यह रोल परेश रावल या बोमन ईरानी वगैरह को दिया जा सकता था)

आज की तारीख़ में हर कोई नारीवादी है, हर कोई प्रगतिशील है, हर कोई अपने हक़ मांग रहा है, हर कोई बदलाव चाहता है !

तो फिर वो कौन है जो लोगों को हक़ लेने से रोक रहा है !?

स्त्री जहां भी लड़ रही है, किसी समकालीन/आजकल की पीढ़ी के किसी पुरुष से लड़ रही है, वह उसका पति हो सकता है, उसका भाई हो सकता है, पिता हो सकता है, पड़ोसी हो सकता है, दोस्त हो सकता है, कुलीग़ हो सकता है, बॉस हो सकता है, और कोई हो सकता है.....।

यह लड़ाई लड़नी पड़ेगी, यह ज़रुरी है।

मगर यह भी समझना होगा कि करवाचौथ, दहेज, सती, बलात्कार, छेड़ख़ानी.....आज के पुरुषों ने नहीं बनाए....... जिस तरह स्त्री की सारी मानसिकता पुरानी परंपराओं, संस्कारों आदि से बनी, ठीक वैसे ही पुरुष की भी बनी। ठीक जैसे ‘इज़्ज़त’ नाम की अजीबो-ग़रीब शय ने स्त्री का जीना हराम कर दिया, वैसे ही ‘मर्दानगी’ नाम के हव्वे ने मर्दों की नाक में दम किए रखा। सुहागरात के यानि पहले ही दिन स्त्री/पत्नी पर विजय पा लेने के निर्देशों/सलाहों से भरे, डरे हुए पुरुष बहुत लोगों ने देखे होंगे।

08-07-2015
(जारी)

(अगला भाग)